एक उचक्के की दर्दभरी व्यथा

एक उचक्के की दर्दभरी व्यथा-

साला! काश बचपन में अम्मा की बात मानी होती यार! काश बापू की चप्पल का असर हो गया होता! जो अपुन भी पढ़ाई कर लिया होता तो साला ये काम क्यों करता? छोटा-मोटा अफसर बन करकुर्सी पर बैठे-बैठे आराम से बड़े से बड़ा हाथ मार लेता। अक्खा डिपार्टमेन्ट में अपुन का इज़्ज़त होता। पुलिस का भी कोई पँगा नहीं, उल्टे सलाम ठोकती।

एक आफीसर की दर्दभरी व्यथा :
काश! बचपन में थोड़ा बिगड़ गया होता!मम्मी- पापा की बात ना मानता… इतनी पढाई ना की होती… थोड़ा यूनीवर्सिटी में दँगे-फ़साद वगेरहकर लिया होता! तो कम-से-कम आज यूँ झख तो ना मार रहा होता! नेता-वेता बन कर हर जगह राज़ कर रहा होता! ये कबूतर के बीट जैसी रिश्वत के बजायस्विस-बैँक में अरबों का एकाँट होता!

एक नेता की दर्दभरी व्यथा (सीधे जेल से) :
हाय भगवान! अब तो नेतागिरी से भी सस्पेण्ड हो गया। पूरी इज़्ज़त का फ़ालूदा हो गया यार! जिसको देखो, साले सब गालियाँ दे रहे हैं! काश बचपन में माँ की बात ना मानी होती!काश बापू की चप्पल का असर ना हुआ होता! ये जो थोड़ी पढाई की, वो भी नाकिया होता! साला, सीधे चोर- उचक्काही बन जाता तो आज इज़्ज़त की ऐसी वाटना लगती!

एडमिन की व्यथा :
अपन तो साला एँवैई ही रह गये यार! साला… ना चोरी सीखी, ना अफ़सरी, ना नेतागिरी! खाली सब पर बैठा व्यँग्य लिखता हूँ, उसपर भी आजतक बुकर या पुलित्ज़र तो छोड़ो, लाईक्सया कमेंट्स तक नहीं मिलते! कोई छोरी भी घास नहीं डालती! जिन्दगी झन्ड बा भैय्या, फ़िर भी घमन्ड बा! खी… खी… खी..

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