एह पागल मन के गहराई…

एह पागल मन के गहराई…

जे दूर रहे, उ पास रहल
हर दम ओकरे,एहसास रहल

दू जिस्म रहे, एक साँस रहल
होठवा पे अइसन,प्यास रहल

जे पास बा, उ खास ना
ओकरा खातिर,एहसास ना

उ प्यार करे, फिर भी बात ना
ओकर बोली, बरदास ना

उ चली जाई, फिर याद आई
अंखिया फिर, आशु छलकाई

बितल बतिया, फिर दोहराई
के समझत बा, के समझाई

एह पागल मन के गहराई…

‘प्रवीण’

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