वीर के मिजाज

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रहे मिजाज वीर के अइसन जहर के प्याला पी गइल
तवनो पर कवनो मलाल ना, मरते-मरते जी गइल।

शिवशंकर सुकरात बनीं त, इल्म जीए के आ जाई
जीए खातिर मरल सीखीं त अपने जिनगी भा जाई।

आपन-आपन राह पकड़ के चलीं सभे त ठीक रही
ना त धक्का-मुक्की होई कुछुओ तब ना नीक रही।

मीत बनवलीं जग में जेकरा उहे कइलस घात
भेद बता के बैरी के दिहलस हमके मात।

कहे के आपन सब केहू बा बाकि केहू ना आपन
आपन खोजत जिनगी बीतल भइल पराया आपन।

चलीं राह में सीधे बाकि नजर के राखीं ऊंच
ना त राह कहां ले जाई कइसे होई पहूंच।

नाव बना के कागज के मत जादे इतराईं
ढेर दूर ई जाई ना रस्ते में गली जाई।

ब्लॉग पूरब के लाल पे @

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