आकाश कुशवाहा जी के लिखल भोजपुरी कहानी मदारी

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आकाश कुशवाहा जी
आकाश कुशवाहा जी

आज कचहरी के दिन रहल, सबेरे के निकलल साँझ के घरे अइला के अब त आदत बन गइल रहल इंजीनियर रामबाबू के।
दुआरी पर उनकर मेहरारु जानकी उनके देखते खाट बिछा दिहली।

….का भइल जी वकील साहब कुछ बतवल ह..?

ना…. उहे रोज के बात तारीख पर आवल करीं बहुत जल्द इ समस्या के निपटारा हो जाई…. रामबाबू माथा खुजीलावत कहलें…।

रामबाबू लोक निर्माण विभाग में इन्जीनियर रहलन, साल भर पहिले दु नम्बर के सामान सीमेंट बालू ईटा के प्रयोग कइला से पुल गिर गइल आ कई
आदमी घायल भइल आ कइ आदमी मरियो गइल रहलन।

मरे वाला के परिवार के लोग रामबाबू के विरुध केस कर देहल लो… जवना चलते रामबाबू के डिपार्टमेंट से अलग क दिहल गइल।

अइसे त रामबाबू के छवि काम के प्रति बेदाग रहल, काहे सब के मुँह से इहे निकले की इंजीनियर साहब त बहुत ईमानदार साहेब हऊवन कइसे उनका से एतना भारी गलती हो गइल।

एगो खुशहाल परिवार दुगो औलाद अऊर मेहरारु संगे रामबाबू सड़क पर आ गइलन। केहू तरे दिन के गुजारा हो चलत रहल…
एक दिन जानकी कहली… देखीं… एगो साधु जी बहुत जानकर बाड़न सुने मे आवत बा उनकर आशीर्वाद से हर समस्या दुर हो जात
बा… हम त कहत हईं एक बार…. अरे…. जानकी तूहूँ कहाँ एह सब चक्कर मे पड़ के लोग के बात सुने लगलू, इ सब बेकार के बात बा…

हमके अपना करम अऊर ईमानदारी पर भरोसा बा एक दिन हमार जीत जरूर होई.. ‘अरे कब होई जीत अच्छा खासा ईमानदारी के जिनगी त मदारी बन के रह गइल बा.. रउरा संगे के दोस्त लोग कई मंजिल घर पीटा लिहल लोग हर शहर मे जमीन भी.. आ अऊर एगो रउरा ईमानदारी के पढ़ाई पढ़ले बानी… जमाना बदल गइल बा… बाकिर रउरा त……. अरे अब छोड़ऽ ना बात के….?

ना बस एक बार हमरा कहला से दिन दशा देखा आईं….।

अच्छा ठीक बा काल्ह सवेरे साधु बाबा के इहाँ जाइब…।

होत सबेरे रामबाबू अपना साइकिल से चल दिहलन….।

आखिरकार साधुबाबा के मठिया दुर से ही दिखाई दिहलस… हरिहर पेंड़ के डाल झूमत धरती के छूवे के कोशिश…मे प्रकृति के ई दृश्य दुर से ही बहुत सु ंदर लागल रामबाबू के…. लगे

पहुँचलन गेट पर त लिखल रहल….बाबा रघुनन्दन जी महराज मठ….।

अंदर बहुत लोग के भीड़ रहल श्रद्धा भक्ति वाला लोग बहुत रहे लो….लगहीं से गुजरत एगो आदमी से रामबाबू कहलें…
हमके साधु बाबा के दर्शन करे के ह…. ?

अच्छा अभी त भक्त लोग के भीड़ बा तनी इंतजार करीं.. नाहि त रउरो एही भीड़ मे शामिल हो र्जाइं रउरो नम्बर आ जाई…।

रामबाबू मन ही मन सोचलें की ना इंतजार कइल बढ़िया बात बा… आराम से सुनिश्चित होके आपन परेशानी बताईब त बाबा ठीक से सोच के बतइहन…।

कई घंटा के बाद भीड़ इक्का-दुक्का रह गइल…।

धीरे धीरे साधु बाबा के लगे जाके उनकर गोड़ छू के बइठ गइलन….। तब तक मोबाइल के रिंग बाजल, बाबा अपना लगे राखल मोबाइल उठा के कान से सटा लिहलें…।

हेलो…. हाँ, जी जयराम बाबू…। बाबा के चरण मे जयराम के प्रणाम बा…। खुश रहो बाबू…. आखिर मंत्री बन गये आप..।

सब आप ही के कृपा बरसल ह बाबा… रउरा कृपा दृष्टि के हमके फल मिल गइल… बाबा। राउर दर्शन अऊर प्रसाद खातिर जल्दीये आवत बानी।

जय जय… बाबू खुश रहिये…। ओकरा बाद बाबा फोन रख दिहलन। थोड़े देर मे बाबा के कृपा दृष्टि हमरा तरफ आइल। का परेशानी है बा बाबू, साधु बाबा कहले…। …बाबा हमार दुई साल से दिन दशा एकदम खराब हो गइल बा सड़क पर आ गइल बानी हम…। रामबाबू भावूक हो गइलन…।

घबराओ ना बाबू खूब शांति से बतावऽ…. कहाँ से कवन गाँव से आइल बाड़ऽ…। बाबा मदनपूरा से आइल बानी। जगदीश प्रसाद जी के इकलौता
लड़िका हईं हम। रामबाबू बाबू नाम ह…. अऊर रामबाबू सब कहानी बता दिहलें…।

रामबाबू के समस्या सुनला के बाद बाबा कहलें…। अच्छा बतावऽ तोंहके बचपन से का चीज खाये के मन करेला…। बाबा अब त ना लेकिन बचपन मे

हमार एगो दोस्त रहलन नंदू हम दूनो के जब भी मन करे त खरबूजा दोसरा के खेत से चोरा के र्खाइं जा… फेर बगइचा से आम जामुन बहुत चोरा के
तुड़ के खइले बानी…।

बाकिर बाबा के ऊ सब चोरीये के पाप ह का हमार ई दिन दशा….। अरे… ना ना…. फेर बतावऽ.. तोहार दोस्त अब कहाँ हवे…।

पता ना बाबा हम दस साल के रहनी त शहर पढ़ाई खातिर चल गइनी। बाकिर दोस्त नंदू के पढ़ाई मे मन ना लागे… दिन भर गाँव मे आइल मदारी वाला के पीछे पीछे घूमत रहत रहलन…। ऊ हमार लंगोटीया इयार रहलन…। हमनी मे बहुत प्यार रहल। त.. आज भी बहुत प्यार करत होखब दोस्त से अपना….।

….बाकिर बाबा रउरा हमार हाथ देखीं ना संझा हो चलल घरे भी जाये के बा…।

बाबा रामबाबू के हाथ पकड़ के दशा देखे लगलन… अचानक बाबा के आँख से आँसू रामबाबू के हाथ पर गिर गइल…। बाबा रउआ…. का भइल बाबा, रउरा काहे रो रहल बानी…।

ऊपर वाला के लीला पर रो रहल बानी बाबू…। अच्छा तोहरा दोस्त नंदू के बाबूजी के का नाम ह…। रघुनाथ… नाम रहल…बाकिर उनकर माई बाबूजी त बचपने मे ई दुनिया से उनके छोड़ के चल बसल लो… चाचा चाची..उनके सब कुछ रहलन…।

अबकी बार बाबा के दुनो आँख से आँसू के धारा बह चलल अऊर रामबाबू के हाथ पर टपके लागल….। रामबाबू देख के अचम्भित हो गइलन।
बाबा…. का भइल… रउरा रोवत काहे बानी..। हमसे कवनो गलती हो गइल का…।

अचानक बाबा खुद के रोक ना पवलन, अऊर उनका मुँह से निकल गइल… राम…राम.. हम तोहार दोस्त नंदू हईं….। का….?

राम नंदू के आवाक होके देखत रह गइलें। नंदू तू… हमार दोस्त…. ह…राम.. हम तोहार… नंदू…। राम के भी आँख से आँसू बह चलल…।
दुनो जाना गले लग गइल लो। नंदू बाकिर इ सब…। नंदू… उर्फ बाबा रघुनन्दन महराज बतावत चल गइलें कहानी.. बीस साल के इहे कहानी बा राम
जब तू शहर चल गइलऽ त हमार मन गाँव मे ना लागल…।

गाँव भर से हमार शिकायत सुने के मिले चाचा चाची के…। एक दिन खुद घर से भाग गइनी… अऊर दिल्ली आ गइनी…. एक दु दिन प्लेटफॉर्म पर गुजरल, फिर एगो होटल मे काम मिल गइल….। बाकिर ई सब गुलामी त तोंहके मालूम बा पसंद शुरू से ना रहल। धीरे धीरे बचपन बीते लागल…

एक जगह कही ना टिक पवनी, दस साल मे दस शहर घूम के दुनियादारी समाज सब समझ मे आ गइल….। दिल दिमाग तेजी से चले लागल…।

एक दिन एगो साधु बाबा से भेट हो गइल, कुछ दिन उनकर चेला बनके रहनी अऊर धीरे धीरे… साधु संगत के गतिविधि समझ मे आ गइल। दिल
दिमाग दुनो एके जवाब दिहलस की नंदू साधुबाबा बन जाये मे भलाई बा। एक ही जगह बइठल सब कुछ हासिल…। फिर वोही जगह साधु बन गईंनी…।

दिल दिमाग घर के भी याद दिलावे लागल… दिल कहलस की गाँव से दस कोस दुर आपन डेरा जमाये के…। फिर एक दिन एगो गाँव के बहरी
सीवान मे एगो बरगद के पेड़ मिल गइल।

अऊर फिर जमल हमार मौन समाधि, मन ही मन तय कर लिहनी की आज से हम नंदू ना.. बाबा रघुनन्दन महराज के नाम से जानल जाइब।
फिर एक दो दिन के बाद पता बा का भइल..राम…हूँ….का भइल फिर…राम कहले ?

जहाँ हम बरगद के पेड़ के नीचे आइल रहनी ओही दिन कुछ पइसा दु तीन खेत में गाड़ दिहले रहनी….।

दु तीन दिन बितल सुबह-सुबह खेत वाला गुजरल, हमके देख के… प्रणाम कइलस…।

ऊ हमसे कुछ पूछित ओह से पहिले हम कहनी की एनिहें से गुजरत रहनी ह त छाया देख कुछ दिन इहाँ ध्यान लीन लगावें के सोच लिहनी ह…।

ऊ आपन परिचय दिहलस की हम गाँव के जमींदार हईं…बात बात मे कहनी की एगो गुप्त बात बा अगर तू केहू से ना कहब त हम बताएब…ऊ जमींदार वादा कइलस..त बता दिहनी की तोहरा खेत मे एक जगह पइसा बा… फेर ऊ जिद पकड़ लिहलस… अऊर हम बता दिहनी… ऊ खुश होके अपना घरे चल गइल…अऊर हम अपना चाल पर कामयाब हो गइनी।

अच्छा कईसन चाल…. राम कहलंे…, इहे बात की ई बात ऊ अपना मेहरारु से जरूर बताई…. आ मेहरारू भर गाँव के मेहरारुअन से…. धीरे धीरे भीड़ होखे लागल…. का पता हमार झूठ हर बात लोग के सच कइसे होखे लागल…। विश्वास दु तीन गाँव के जम गइल..अऊर गाँव वाला सब मिलके हमरा के जमीन अऊर रहे के बंदोबस्त कर दिहल लो। फेर ऊँहा से हमार रघुनन्दन बाबा के नाम से चर्चा फइल गइल…गाँव के प्रधान, विधायक लो आशीर्वाद लेंवे खातिर आवे लगल लो..।

धीरे धीरे…. आज दस गाँव के लोग हमरा के आदर करे लागल….। फेर रघुनन्दन बाबा दिमाग लगवलें….की वोट आवे वाला ह… जरूर कोई नेता मिले आई…।

फिर एक दिन एगो मंत्री प्रत्याशी जी आ गइलें आशीर्वाद खातिर….। बात चलल… हम कहनी.. एह बेर तोहार जीत पक्की बा हमार दिल कह रहल बा…मगर…बाकिर का बाबा….ई बाबा के कुटी बड़ा करे खातिर जमीन चाही…. कुछ पेड़ पौधा दु चार चेला रखल चाहत बानी….।

बाबा सब हो जाई रउरा बस कृपा दृष्टि क दीं हमरा पर…। तब जा तोहार जीत पक्की बा…। एने हर गाँव से आवे वाला लोग से
हम कहे लगनी फलां आदमी बहुत बढ़िया हवे..। उनकरा के वोट दिहऽ।

सब कोई के पूरा एकतरफा वोट परल अऊर जीत भइल.. वादा के मुताबिक जमीन अऊर आश्रम बन गइल….। आज देखऽ तीन से चार बीघा जमीन मे आश्रम फइल गइल बा। दो तीन सौ चेला बाड़न, केहू सब्जी ऊगावेला, केहू आम के देखभाल त केहू गाय भइंस के देखभाल…।

नंदू अब हमार परिवार राह तकत होइहंे। अब हमके जाये के पड़ी। अच्छा एक मिनट… तनी वो वकील के मोबाइल नम्बर दे द राम… काल्ह से
तोहार कचहरी गइल बन्द… तोहार फिर ज्वाइन होई ओही नौकरी में। नंदू ऊर्फ रघुनन्दन बाबा एगो कॉल कइलन त तुरंत चार पहिया के गाड़ी आश्रम के गेट पर आ गइल…।

राम साइकिल गाड़ी मे रखऽ। ड्राइवर के तरफ इशारा कके कहलन..इनका के घर तक छोड़ द। बाकिर जाये से पहिले नंदू वादा कइलें राम से की ई राज हम दुनो दोस्तन के बीच ही रही…।

राम भी पक्का वादा कइले की ई बात तोहरा हमरा अलावा केहू ना जानी।

राम रास्ता भर सोचत रहलें की ई वक्त कब केकरा पर कइसे मेहरबान हो जाला आज हम पढ़ लिख के जमाना ना पढ़ पवनी अऊर नंदू निपढ़ होके जमाना पढ़ लिहलस। का गलत बात बा तनिका झूठ ही पर आपन नींव खड़ा कइले बा मगर ओकर झूठ केतना लोग के जीआवत बा… एगो झूठा आसरा ही सही मगर कुछ दिन खातिर मुस्कान लोग के चेहरा पर देत त बा। वक्त के जवन फैसला….।

आज ओकरा लगे कुछ के कमी नइखे…. अऊर एगो हम…। राम मन ही मन बचपन इयाद करके मुस्कुरा देत बाड़न की एगो ऊ
दिन रहल की मदारी देखावेवाला के भी नंदू उल्लू बना देवे….पूरा गाँव के अपना शैतानी हरकत से परेशान कर देत रहलन…बाकिर उनकर साथ हमके
बहुत अच्छा लागे…।

आखिर राम के घर आ गइल…। हप्ता दस दिन बितत कहीं की फिर रामबाबू के बहाली हो गइल… एक दिन रामबाबू के मेहरारू कहीये दिहली..
देखनी बाबा के ही एह सब आशीर्वाद के चमत्कार ह…।

दुनो हाथ जोड़ के कहली धन्य हो बाबा रउरा। रामबाबू बिना मुस्करइले ना रह पवलें।

उनकर मुँह से निकल गइल….धन्य हो मदारी…मेरे दोस्त।


लेखक: आकाश कुशवाहा जी

ध्यान दीं: ई भोजपुरी कहानी “हैलो भोजपुरी पत्रिका” से लिहल गइल बा।

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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