बहुमुखी प्रतिभा के धनी: एंथोनी दीपक

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पर्वतराज हिमालय के गोद में बसी हुयी चंपारण की धरती सौन्दर्य वैभव से परिपूर्ण और स्वर्ग से भी सुन्दर कही गयी है। चंपारण की धरती अपनी सांस्कृतिक धरोधर, प्राकृतिक वैभव, गौरवमयी अतीत, साहित्यिक गरिमा, राजनीतिक चेतना एवं ऐतिहासिक सम्पदा से भरपूरा है। आदिकवि बाल्मीकि की भूमि, चन्द्रगुप्त-अशोक की कर्मशाला, विदेह राजा जनक का वैभव, बुद्ध की चरणधूलि से पवित्र राजतंत्र व प्रजातंत्र का संगम, सरहपा व वाणी के डिक्टेटर की वाणियों से निःस्तृत काव्य की सहज लोक धरा की भूमि, गान्धी की कर्मभूमि है – चंपारण।

यहाँ साहित्य की लोकधारा व शास्त्रीय धारा समानान्तर चलती है। भारतेंदुयुगीन साहित्यकार पंडित चद्रशेखरधर मिश्र, गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली के गीतों पर हर चंपारणवासी गर्व करता है। कवियों में एक समृद्ध श्रृंखला यहाँ शुरू से देखी जा सकती है। सरयू सिंह सुन्दर, बृज बिहारी चूर, बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव ढ़िबरीलाल, विमल राजस्थानी, अखिलेशवर प्रसाद सिन्हा, पाण्डेय आशुतोष, दिनेश भ्रमर, व्रतराज दूबे विकल, किशोरी लाल अंशुमाली, अरविन्द कुमार वर्मा अरविन्द, अश्विनी कुमार आंसू, कवि प्रदीप सिंह, डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, ऐसे अनेको नाम हैं जिन्होंने अपनी सहज लेकिन सशक्त रचनाओं के द्वारा हिंदी- भोजपुरी काव्य संसार को अत्यंत समृद्ध व व्यापक बनाया है।

कवि एंथोनी दीपक भोजपुरी- हिंदी दोनों के स्वनामधन्य हस्ताक्षर कवि है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि दीपक काव्य कर्म के अलावा एक पारंगत संगीतज्ञ, गीतकार थेे। ये एक कुशल शिक्षक के रूप में दीप शिशु केंद्र नामक प्रथम पब्लिक स्कूल के स्थापना रामनगर में की। दीपक संगीत वाद्ययंत्रो को स्वर देने में भी माहिर थे।

दीपक का जन्म 15 मार्च 1933 में पश्चिम चम्पारण के चुहड़ी नामक गाँव में हुआ था। बहुत कम उम्र से संगीत साहित्य व काव्य सृजन के प्रति उन्मुख हो गए। प्रारंभिक शिक्षा बेतिया में के. आर. हाई स्कूल में हुयी थी तथा उच्च शिक्षा मुन्शी सिंह कालेज मोतिहारी में हुयी थी। सोलोमन एंथोनी इनके पिता थे और जोहना सोलोमन इनकी माँ का नाम था। दीपक ने प्रयाग संगीत इलाहाबाद संगीत में प्रभाकर किया। दीपक की शादी ट्रीजा एन्थोनी से हुयी थी।

कवि दीपक चम्पारण के सुप्रसिद्ध गीतकार नेपाली की तरह एक बहुत अच्छे फुटबॉलर भी थे। 9 मार्च, 1953 में महज बीस वर्ष की उम्र में ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें ‘द वेस्ट आलराउंडर’ का आवार्ड दिया था। वर्ष 1995 में उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने साहित्य संवर्धन पुरस्कार से सम्मानित किया था।

दीपक सुप्रसिद्ध गीतकार, कोकिल कंठ गायक, सिद्धहस्त लेखक, नाटककार, कुशल रंगकर्मी, संगीतज्ञ, फुटबॉलर और कुशल निशानेबाज थे। रामनगर व अन्य स्थानों पर उनके द्वारा प्रस्तुत भोजपुरी नाटक ‘डंसले बिया नगिनिया’ में उनके बांसुरी वादन को आज भी लोग याद् कर रोमांचित हो जाते है। दीपक ने अपना पहली गीत संकलन ‘परिचय’ में प्रकाशित हुआ जिसकी भूमिका में आचार्य सुप्रसिद्ध साहित्यकार जानकी वल्लभ शास्त्री ने लिखा जब ‘मैं एकांत के क्षणों में होता हूँ तो दीपक के गीतों को गुनगुनाता हूँ। अपनी गजलों में दीपक सीधे सादे शब्दों में उम्दा बातें कह जाया करते थे’।

दीपक की आवाज में जादू था। कंठ के सरस्वती बसती थी। स्वर में सुर ताल ले का सुन्दर संयोग था। उनकें गीतों में दर्द था, जलन थी, तड़प थी। उनके गीतों को मर्मस्पर्शी मानने वाले मुरलीधर सारस्वत उर्फ चाचा राजस्थानी का मानना है कि कविवर दीपक के गीतों में भावपक्ष व कलापक्ष दोनों का एक सुंघठित रूप इसमें देखने को मिलता है ।

होली में मस्त हो कर अपनी गीत गाते दीपक को देखना सुखद अनुभूति थी-

‘मोहे रंग अबीर न भाए सखी
मोरे सजन तो हरिद्वार गए’

दीपक की प्रकाशित रचनाएँ हैं – परिचय (1956), हिंदुस्तान जागा है (1962), साथी आओ, नाचो, गाओ (1967), दीपक के गीत (1967)। इसके अलावा आर्यावर्त में उनकी रचनाएँ छपती थी और आकाशवाणी पटना से भी प्रसारित होती रहीं हैं।

दीपक के अप्रकाशित रचनाएँ हैं मिटटी के पुतले, सवेरा, मुसाफिरखाना, बाप और सवाल (सभी नाटक), आंसू की छीटें, (कथा संकलन), गुनाहगार (उपन्यास), मानव, माया और ज्ञान (रूपक), अंजोरिया (भोजपुरी नाटक), एक गिलास पानी (प्रहसन), ताज (खंड काव्य) 1956 से 1963 तक मोतिहारी के ललित मिड़िल स्कूल के प्रधानाध्यापक रहे फिर रामनगर आ कर सदा के लिए यही के हो कर रह गये।

भोजपुरी भाषा की कवि दीपक ने खूब सेवा की है। भोजपूरी के अनेक विधाओं में खूब लिखा, खूब गया, लेकिन अश्लीलता से हमेशा परहेज किया। उनकी भोजपुरी गीत ‘उमड घुमड़ घन गिरल बदरिया ….. सनकल सोन मछरिया रे’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था।

दीपक ने भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति विश्व भोजपुरी सम्मलेन द्वारा आयोगित राष्ट्रीय अधिवेशन, पटना में दी थी। आकाशवाणी पटना से इनकी गीत गजलों की प्रस्तुति 1967-1990 तक निरंतर होती रही। रोटरी क्लब, लखनऊ द्वारा ‘सबरस’ कार्यक्रम में भोजपुरी गीत संध्या में भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति कर इस क्लब में पहली बार 1991 में भोजपुरी भाषा के गीतों का सूत्रपात हुआ।

कवि दीपक को महात्मा गाँधी सद्भावना समिति, रामनगर द्वारा ‘रामनगर रत्न’ की उपाधि मिली थी। कवि का जीवन बचपन से उथल पुथल से भरा रहा। दीपक के जीवन का यही दर्द था कि उनसे जीवन भर साहित्य और कला के क्षेत्र में उजाला फैलाया। खुद को जलाकर रौशनी दी लेकिन उनकी जिन्दगी अंधेरों से भर गई। 3 अप्रैल 2008 को कवि एंथोनी का देह्वसान हो गया और उनके कमरें में पडी सभी वाद्य यंत्र सहसा मौन हो गयी क्यांेकि उनकांे स्वर देने वाला अब कोई नहीं रहा।

आर्यावर्त के संपादक को दीपक के गीतों में लोक को उनके गीतों में जीवन की गहरी समझ दिखाई देती है। सचमुच, कवि दीपक हिंदी-भोजपुरी के सशक्त व सिद्धहस्त कवि थे उनकी कल्पना निस्तीम व्योंम में विचरण करती थी। वही उनकी कविताओं में वास्विकता की धरती पर शैली मधुर हैं। उनकी कविता की दो पंक्तियाँ से यह आलेख समाप्त करना उचित है –

‘तुम्हारी गोद में जन्मा-पला हूँ
तुम्हारा हूँ, बुरा हूँ या भला हूँ’।

लेखक – संतोष पटेल
भोजपुरी ज़िन्दगी पत्रिका के संपादक हैं
ईमेल – [email protected]

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