भोजपुरी हंसी त जग अंजोर

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भोजपुरी गीतकार पं. हरिराम द्विवेदी(हरि भइया) को साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान से 24 अप्रैल को सम्मानित किया गया। इससे पूर्व भोजपुरी भाषा में योगदान के लिए यह सम्मान धरीक्षण मिश्र (बरियारपुर तमकुहीराज कुशीनगर) तथा मोती बीए (बरहज, देवरिया) को मिला था ।

पराड़कर स्मृति भवन , वाराणसी में आयोजित सम्मान समारोह में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने उन्हे यह पुरस्कार प्रदान किया। भाषा सम्मान में ताम्र फलक और एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी गई।

हरि भइया की खासियत है कि वे विशुद्ध कवि हैं, केवल कविता लिखते हैं। उन्होंने कई रचनाएं कीं जिनमें ‘नदियो गइल दुबराय’ और ‘अंगनइया’ उल्लेखनीय हैं। कहते है – “भले देर भएल, लेकिन भोर जरूर भएल …भोजपुरी खातिर लरत रहम जिनगी भर , आज एह लड़ाई में आखिर जीत गईल भोजपुरी…और खुशी के मारे उनके भरभरा गए शब्द, आंखों में भर आए लोर ।

12 मार्च 1936 को शेरवा ग्राम, जिला मिर्ज़ापुर मे जन्मे पं.हरिराम द्विवेदी बनारस आए तो यहीं के होकर रह गए। श्री द्विवेदी ने आकाशवाणी की सरकारी सेवा में भी अपने क‌र्त्तव्य का केन्द्र भोजपुरी को ही बनाया और हरि भइया के नाम से लोकप्रिय हुए। हरी भैया के रचे भोजपुरी गीत कई नामी गिरामी कलाकारों ने गाये हैं ।
कहते है – “ भोजपुरी हमार माई हs , अउर अपन माई के माई कहे में तनिक भी संकोच नाहीं लागे के चाही , तमाम चैनलन के जरिए भोजपुरी भाषा व आपन संस्कृति के खतम करे के कुचक्र रचल जा रहल बा…….. अगर लोग आवै वाली पीढ़ी के अपने भाषा के प्रति संस्कारित न करिहें त आवै वाले समय में भोजपुरी भाषा हमनन से दूर हो जाई……. भोजपुरी गांव कs बोली ह और आपन बोली बोलै कs संस्कार लोगन के आपने बच्चन के अंदर भी डालै के चाही, नाहिं त आवै वाले समय में यह भाषा लुप्त हो जाई……. हमनन के आपन मूल भाषा के कभी भी नाहिं छोड़े के चाही। भोजपुरी भाषा के संरक्षण के खातिर हमे आवै वाली पीढ़ी को भाषा व संस्कृति के प्रति संस्कारित करै के होई……………!”

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