भोजपुरी ई पत्रिका आखर मार्च अप्रैल २०१७ (संयुक्तांक)

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भोजपुरिया समाज के मन मिजाज में संगीत बसेला। जीवन के हर पक्ष में संगीत के जबरदस्त दखल देखे के मिलेला। अपना सांस्कृतिक नायकन के साथे भोजपुरिया मानस जवना स्तर तक जड़ुेला, ओकर दोसर उदाहरण शायदे मिली। एकरा बावजदू समाज के एह विरासत पर संकट मँड़रा रहल बा। संगीत दूषित हो रहल बा। दिन पर दिन सांगितिक पाकिजगी पर कीचड़ उछालेवाला लिखवैया, गवैया आ बढ़वैया के संख्या बढ़ल जा रहल बा। बाहरी समाज भोजपुरिया संगीत के एह अधःपतन पर स्तब्ध बा बाकिर भोजपुरिया समाज पर कवनो खास असर नइखे। वजह स्पष्ट बा। भोजपुरिया समाज अपना पहचान छुपावे लागल बा। संस्कृति के लेके कवनो आग्रह नइखे ओकरा लगे। जे गंदगी कर रहल बा ओकर विरोध नइखे हो पावत। आखिर कइसे होखे? जेकरा गंदगी नइखे रुचत उ आँख आ नाक दबा के किनारे निकल जाता । घड़ी भर खातिर भी उ अपना भीतर नइखे झाँकत। अगर झाँकित त अपना आत्मा के उपेक्षा शायदे कर पाइत।

आखिर भोजपुरी संगीत के ई दुर्दशा भइल कइसे? जिम्मेदार के बा? भोजपुरी संगीत त गंगा जी के निर्मल, कलकल धार रहे। एह पवित्र धार में नहइले बिना कवनो संस्कार पूरा ना मानल जाव।

कृषि प्रधान भोजपुरिया समाज हाड़तोड़ पररश्रम करत घरी भी आनंद में रहे। समाज के रचना के आधार रहे संगीत। सम्बन्धन के जीवंतता के घोषणा रहे संगीत। मूल्यन के पवित्र पूंजी रहे संगीत।

देशभक्ति के हुंकार रहे संगीत। वेदना के स्वर रहे संगीत। सौन्दर्य के मादकता रहे संगीत। साँच कहीं त भोजपुरिया समाज संगीत से ही जानल पहचानल जाव। आज भी भोजपुरिया समाज संगीत के वजह से ही जानल जा रहल बा। अतंर इहे बा तक काल्ह जहाँ अपना संगीत पर गौरव के भाव रहे आज ओकर स्थान लज्जा आ घृणा ले लेले बा।

ई बदलाव अचानक नइखे भइल। धीरे-धीरे भइल बा बाकिर, सबकुछ आँतख के सोझा भइल बा। बाजार के आपन वसलू होला। ओकरा मूल्य आ संस्कृति से कवनो मतलब ना होखे। ओकर एकमात्र उदेश्य होला अधिक से अधिक मुनाफा कमाइल। जवना समाज में ओकरा आपन प्रोडक्ट बेचे के रहेला ओकर बढ़िया से अध्ययन क के उ व्यापार करे उतरेला। शरुुआत में कइ तरह के प्रलोभन देला। एह दौरान उ अपना क्षेत्र के विस्तार करेला। अन्य सहायक शक्तियन के साथे समझौता करेला। जे प्रतिरोध कर सके ला ओकर काट खोजेला। चारो ओर से आश्वस्त भइला के बाद उतर जाला मैदान में। बटोरे लागेला रुपिया।

बिना चिंता कइले कि रुपिया के स्रोत का बा? भोजपुरी संगीत के बाजार ग्रस लेले बा। एकरा से मुक्ति खातिर एकरे हथियार से एकरा के काटे के पड़ी। निमन लिखवैया, निमन गवैया आ निमन बढ़वैया आगे आवस। बदलाव लउके लागी।

जब भी भोजपुरी संगीत के बात आवेला, दूगो नाम जेहन मेंउतरेला। महदेंर मिसिर आ भिखारी ठाकुर । परम्परागत जातिगत समाजिक ढाँचा में दुनू नाम दूगो ध्रवु पर खड़ा रहे। दुनू के लेखनी चलल। सबसे आश्चर्य के विषय ई बा कि हद दर्जा के सामंती ढाँचा में रमल-जमल भोजपुरिया समाज के ई दुनू लिखवैया जवन भी लिखलन ओ में कवनो जातिगत भा वर्गगत विमर्श नइखे। भखारी ठाकुर अपना रचना सन में बरे बेर अपना जाति के उल्लेख कइले बाड़न बाकिर कहीं हीनता के भाव नइखे। ओजगुे महेंदर मिसिर भी अपना गीतन में अपना नाम के प्रयोग कइले बाड़न बाकिर कहीं जातिगत अभिमान नइखे। भोजपुरिया समाज के इहे तासीर हऽ। गीत संगीत समाज के व्यापक रूप से दखेला। महदेंर मिसिर आ भखारी ठाकुर भोजपुरी संगीत के एह व्यापकता के आउर विस्तार देबे वाला नाम हऽ लो। बिरहिन, प्रयेसी, किसान, गृहणी, हास्य चरित्र, दार्शनिक आ खल चरित्रन के अद्भुत विविधता देखे के मिलेला एह लो के रचनावली में वर्तमान दौर में संगीत में फइलल अश्लीलता आ फूहड़पन के करारा जवाब देबे खातिर हमनी के एहि द्वय के शरण में जाये के पड़ी। उ हुनर सिखे के पड़ी जवना से ई दुनू सांस्कृतिक योद्धा लगभग पूरा पुरबिया समाज के आपन दीवाना बना लेले रहलन। गेंहू के बाली अनाज से लद चुकल बा। छठ पजूा आ नवरातन के उमंग सिर चढ़ के बोल रहल बा ।

सभे आध्यात्म आ भक्ति के खुमारी में डूबल बा। आम के मंजर आ महुआ के कोंच ए खशुी में शुमार हो के मदमस्त हो रहल बाड़न। पूरबी बयार के लगे खमुारी बा। कुल मिला के भोजपुरिया समाज आनदं आ उत्सव के अतिरेक में बा। अइसन समय में आखर आपन संयुक्तांक ले के रउआ सोझा बा । साहित्य के उहे विविधता एह अकं में बा जवना विविधता आ आकर्षण खातिर भोजपुरी मिजाज जानल जाला। विश्वास बा हमेशा खानी राउर आशीर्वाद प्राप्त होई।

आखर

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आखर के पुरनका अंक पढ़े खातिर रउवा आखर के वेबसाइट www.aakhar.com पऽ पढ़ आ डाउनलोड कर सकत बानी

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