सुनील कुमार तंग जी के लिखल भोजपुरी ग़ज़ल

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केकर – केकर नांव गिनाईं, केकर नांव धरीं
अस मन करे कि कतहूॅ जाके कुआं में कूद परीं ।।

आपन लाश उठवले बानी अपने कान्हा हम
जीयत होखीं तब नू जा के कतहूॅ डूब मरीं ।।

जिनगी सगरी रात अन्हरिया कटले कहाॅ कटे
भगजोगनी अइसन बोलीं हम कब ले मरीं – जरीं ।।

रउरे हाकिम, रउरे मुजरिम, रउरे बनी गवाह
दोष बताईं राउर साबित कइसे कहाॅ करीं ।।

घामा में हमनी के चूरन बेंच रहल बानी
एसी में बइठल रउरा हमनी के भाव करीं ।।

सुख में साथी, दुख में दुश्मन, नया बात नइखे
जइसन करनी कइनी ओइसन भरनी चलीं भरीं ।।

हमनी के चमचई करते सउंसे उमिर बितल
जिनगी के बह कहिया ले हम बोलीं इहाॅ भरीं ।।

डर अइसन कि कांपत – कांपत सत्तर साल गइल
रउरा बोलीं अब कहिया ले केतना रोज डरीं ।।

सुनील कुमार तंग जी के फेसबुक पेज से

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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