पतोह का निबाही

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का ए बूढा
काहें चिचियात बाडू
हाली काहे ना
ओरात बाडू
तोहार सेवा कईल
पहाड़ भईल
कवनो काम काज करहीं के नइखे
भर दिन नाट फार के गोहरावा
केहू ना सुनी /तोहर बोली
मांगत रहा भलही
खइका / पानी /बीड़ी /सुरती /सलाई |

हम तोहार टहल बजाई
कि आपन नोकरी
बुझाते नईखे
भर आंखी किचर
भिनभिनात माछी
बसात देह
हमरो अब देखात नईखे |

के करी कुल्हि तोहार
तोहरे लग्गे अब का बा
रुपिया /घन / दउलत / सोना
पहिलहीं बेंच कीन के
खलिहा हो गइलू
तब बतावा काहें करी
तोहार पतोह / तोहार सेवा
एकाधो थान रहत
त कुल्हि करत
धोवे से पोंछे तक |

समाज के देखे के बा
नाही त आश्रम में छोड़ आइत
उहवाँ कुछ त हो जात
साफ़ सफाई
भर पेट न सही
कुछ त मिल जात खाए के
नाही सहाला हमसे
केहू क कुछहू बोलल
का करी हम
तोही न खोजलू
गोर गार पतोह |

नन्हकी लइकिया जाले
तोहरे लग्गे कबों चोरी से
धरा जाले / पिटा जाले
ओकर माई धिरावेले
बाकि आपन आवे वाला दिन
भुला जाले
एक दिन सभ केहू बूढ होई
चिल्लाई / दिमाग खाई
तब ओकर पतोह इहे न निबाही

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पतोह का निबाही के लेखक का परिचय:
जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
इंजीनियरिंग स्नातक ;
व्यवसाय: कम्पुटर सर्विस सेवा
सी -39 , सेक्टर – 3;
चिरंजीव विहार, गाजियाबाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
ईमेल : [email protected]
फ़ेसबुक : https://www.facebook.com/jp.dwivedi.5
ब्लॉग: http:// dwivedijaishankar.blogspot.in

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