भोजपुरी मेँ सामाजिक समरसता आ आज के जातिवादी सोच-एगो साँच घटना

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बात हमरा रिविलगंज थाना से जुड़ल बा,जवन सरयू नदी के किनरवाहीँ पर बा।
12 बरिस पहिले बधार के लईकी सऽ,जवनc”करमा-धरमा” के व्रत(भाई-बहिन के व्रत हऽ) कईले रही सऽ आ पारन करे खातिर गीत गावत जात रही सऽ।गीत के बोल रहे-“बजाव भईया चमरा, बजाव डुगडुगी रे–।” ओह थनवा मेँ एगो उपाध्याय जी-वायरलेस ऑपरेटर रहस,जेकर पाँच साल के बेटा राजू, ओह गीतवा के ईयाद कऽ लेलख। छोटहन लईका,मीठ बोली आ मीठ आवाज-थाना के केहू भी एगो सिक्का धरावे आ ओकरा से कहे-राजू गावऽ आ ऊ लईका जात,गावे लागे।

जब मामला तूल धईलख तब,जब सहायक दारोगा के पद पर ड्यूटी करे वाला अधिकारी-राजवंशी राम-एक दिन राजू के दू झापर दे देलेँ।भईल हाला आ तब उपाध्याय जी के दू गो जवान बेटा दरोगा जी के कस के थूर दे ले सऽ,कपारो फाटल दरोगा जी के,केसा केसी भईल।दरोगा जी के कहनाम रहे-राजू जानबूझ कर हमको देख कर इस गीत को गाता है,चुकि हम चमार हैँ,मुझे अपमानित करता है।जाँच टीम आईल,जवना मेँ डी एस पी स्तर के अधिकारी-सुनील जी, जे हमार मित्र रहीँ,अईले। थाना के माहौल गरमाईले रहे। बात गीत पर आ के अँटकल।

सुनील जी के इयाद पड़ल कि हमार घर इहँवे बा,ऊँहा के हमरा के बोलवईनीँ आ पूरा घटनाक्रम बतवनीँ।अब जजमेँट करे के जिम्मेदारी हमार रहे।हम राजवंशी राम से कहनीँ कि गीत के बोल बोलीँ,ऊ बतवलेँ-बजाव भईया चमरा,बजाव डुगडुगी। हम पूछनीँ-राऊर तकलीफ कहाँ बा?ऊहाँ के कहनीँ-ई बार बार हमको चमार बोलता है।हम जवाब देनीँ-अगर वो चमार बोलता है तो दूसरी तरफ संबोधन मेँ”भैया चमार”भी तो बोलता है।वह “रे चमार”तो नहीँ बोलता? वह तो आप को भाई बना कर ,खुद भाई बनते हुए डुगडुगी बजाने को कहता है।

ई व्याख्या सुनला के देर रहे कि डी एस पी साहेब खुदे राजवंशी राम के गरिआवे के शुरु कईले आ लगलेँ कहे-ई साला सब!जानबूझ कर ऐसे सामाजिक सौहार्द्र को बरबाद करने पर तूले हैँ।हम डी एस पी साहेब के बतईनीँ कि ई गीत के इतिहास दू सौ बरिस से पुरान हऽ।केस खारिज हो गईल आ तब हमहुँ जननीँ कि हमनीँ के पारंपरिक गीतन मेँ सामाजिक समरसता के गुन कतना कूट-कूट के भरल बा!

भोजपुरी मेँ सामाजिक समरसता आ आज के जातिवादी सोच-एगो साँच घटना
-उदय नारायन सिंह जी
“जय भोजपुरी”

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