देवेन्द्र कुमार राय जी के लिखल भोजपुरी कविता बेटा ह कि मेटा

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चालीस बरीस प अईसन भईल
जमले बेटा बुढ़ के अंगनाई,
थरीया ढोल मजीरा बाजल
बाजल सोहर में खुब शहनाई ।

गोतीया गोतीनी सभे आईल
बबुआ जी के देवे आशीर्वादी,
बबुआ के किलकारी सुन के
चाकर भईल बुढ़ के छाती।

ठुनुकत बबुआ अंगना में खेलत
मईया रहसु हमेशा साथे,
करीआ फुदेना हाथ में बन्हली
सोचली केहु के नजर ना लागे।

बेटा के रुप निरेख बुढ़ सोचले
भईल बुढा़पा के एगो लाठी,
गंगा माई बाबु के उमीर लमहर
तोहरा घाटे जरुर चढा़ईब पाठी।

करजा काढि़ के गाय कीनाईल
पीए खातीर बबुआ के दूध,
माई बाबू कबहीं ना कईले
बबुआ खातीर धन के सुध।

कवनो देवता अईसन ना रहले
जिन्हिकर मनौती ना मानल रहे,
मईहर काली कामाख्या माई तक
कवनो धाम ना बांचल रहे।

जब बचवा भईले जवान
काम एक से बढ़के एक कईले,
कजरी गाय के दूध छोड़ के
शैम्पेन के बोतल धईले।

संस्कार के भईल कबाडा़
बुढ़ के ना देखल गईल,
पहिला हप्ता में खटिया धईले
दोसरा हप्ता में मरघट गईल।

नौ महीना गरभ में राखि के
मरत दुख कबहीं ना सहीतीं,
जनीती कि कुल डुबावन होईब
सऊरी में नीमक चटवले रहीतीं।

बाप दादा के मिलल संस्कार में
बबुआ कबहीं ना आग लगईह,
कवि देवेन्दर आस लगावसु
बेटा तु मेटा ना होईह।

देवेन्द्र कुमार राय
(ग्राम+पो०-जमुआँव, पीरो, भोजपुर, बिहार )

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