कन्हैया प्रसाद तिवारी जी के लिखल बुझात नइखे हमरा कि का लिखीं

0
232

क से लिखीं कइसन हाल बा जमाना के
ख से लिखीं खुशी के पैमाना के
ग से लिखीं गवनई प्यार के
घ से लिखीं घर में स्वागत बा यार के
च से चमकत रहे सभके चेहरा
छ से छछने ना कबहुँ छुछबेहरा
ज से जंग ना होखे जमाना में
झ से झंझट न हो मनमाना में
ट से टन टन बाजे स्कूल के घंटी
ठ से ठोकर ना खाये बबलु आ बंटी
ड से डभकत रहे घर में पतीला में चावल
ढ़ से ढ़रके ढ़र ढ़र लोर खुशी में गावल
त से तरकश तीरे से खाली रहे
थ से थप्पड़ के जगह ताली रहे
द से दामन पो कवनो दाग ना हो
ध से धरती पो कबहुँ खूनी फाग ना हो
न से नमन में सिर झुकावल जाये
रसिक से दिल के बात बतावल जाये
प से पसीना बहे खून ना
फ से फूल छिडकीं नून ना
ब से बात कभी से आघात ना हो
भ से भरल खलिहान में बरसात ना हो
म से माँ के ममता परवान चढ़े
य से यारी में सभके सम्मान बढ़े
र से रस चूवे लोगन के बोली में
व से वक्त कटे हँसी ठिठोली में
श से शरबती लगे सुन्दरी के काया
स से सुमन बरसायें प्रभु के माया
ह से हल हो जाये सारे जीवन का प्रश्न
पथ प्रकाशित हो मनाये जोश में जश्न

कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

Please enter your comment!
Please enter your name here

twenty − seven =