चहेटना चलल ससुरारी भाग – १

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अजीत कुमार तिवारी
अजीत कुमार तिवारी
एक बार भईयवा हमार( सगा त केहु नईखे बाकि केहु भी ए जगहा पर अपना के हमार भाई समझ सकेला) ससुरारी चलल, माघ के महीना, भीतरी ले हिलावे वाला जाड़ आ सांथ मे मेहरारु ना । हिलत-डोलत संझलउका मे पहुंचल, पाहुन अईनी पाहुन अईनी, भइल हाला । आ सभे जे जहें रहे तहें से खातिरदारी मे जुट गईल । नास्ता पानी भईल हाल समाचार भइल एही मे रात हो गईल । भोजन-पानी भईला के बाद पाहुन के सुते के तईयारी शुरु हो गईल । पुरकस जाड़ परत रहे आ ओढे के मिलल एगो पातर-छीतर कम्बल ।
सास पुछली बबुआ हो जाई कि कुछ आउरी दिहीं ?
ससुरारी के बात रहे भईयवा कईसे कहो कि भीतर के गरमी झर गईल बा कुछ आउरी दिहीतिं त साटि के ओढ लेतीं !
बरीयारी देह टाईट कर के कह देहलस – ना जी ईहे ढेर बा रात भर हम घरहुं उघारहीं सुतीले ।
सास बेचारो जा के आपन सुत गईली ।
जब जे रात के कुछ पहर बीतल, जाड़े भईयवा के दांत आ ठेहुन से तीरताल बाजे के शुरु भईल! एकर त हालते खराब । कुछ देर बरदाश करे के कोशीश कइलस आ जब एकदमे ना अड़ाईल त ई सोंच के कि कुछु त अंगनवा मे होई हिलत-डोलत, धीरे-धीरे गोड़ घुसकावत आंगन मे पहुंच गईल ! घोर अन्हरीया छपले रहे, कवन चीज केने बा बुझईबे ना करे तबो थाह-थाह के गोड़ बढ़ावे लागल कि केहु के कुछ सुनाव मत ! बाकि भईयवा के संयोग खराब !!!! आंगन मे जुठ बरतन के ढेर लागल रहे ओही से नु टकरा गईल !! अब चीरले खुन ना ! उल्टे गोड़े घर मे भागल आ देह टाईट कर के सुत गईल ।
एने सास के अंघी टुट गईल बुझली कि बबुआ के पिआस लागल बा का दुन? पानी खोजे आईल रहले हन ।
उठली एगो बरीयारे पितरीया लोटा मे पानी भरली आ पहुंच गइली पाहुन लगे !!
कहली- ए बबुआ लीं ना ले आईल बानी !!
भईयवा भीतरे बहुते गच्च भईल कि ई नु कहाला सास आ ससुरारी देखीं त बिना कहलहीं आमा जी के बुझा गईल हा ।अबकी जरुर बरीयार ओढ़ना लीयाईल होखेम ।
भईयवा सुतले-सुतले कहलस कि देहीए पर डाल दीं ।
सास के बुझाईल कि बबुआ के घरे उघारे सुते के आदत बा से कमबलवा मे गरमा गईल बानी एही से तनी ठंढई खोजत बानी, आ बेटा दामाद मे का फरक होला तनी फुहारा मार के ठंढाईए देवे मे का हरज बा ?आ भर लोटा के पाला पानी डाल दीहली ओकरा गोड़ से ले के मुड़ी तक ।

“जीयs हो सास आ जय हो ससुरारी”

-अजीत कुमार तिवारी (आखर के फेसबुक पेज से)

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