शशि रंजन मिसिर जी के लिखल देवठान के कहनी

देवठान के कहनी
देवठान के कहनी

कार्तिक के महिना में हमार आजी रोज भिनसारे दुआर पर शिवाला के कुआं पे नहास, ओहिजे तुलसी जी के दीया बारस आ साथे गीतो गावस-

जगा द राम तुलसी के भइले बिहान हो…
जे मोरा तुलसी से नेह लगयिहें रामा
जनम जनम अहिवात मिलि जइहें हो राम…
जगा द राम तुलसी के

हमरा बड़ा जबून बुझाए कि हेतना फजिराहे इ पूजा कइला के का काम बा ? बाकिर एतना मालुम रहे कि एही दिनवें ऊख चुसेके बरत आवेला ।

आजी पूजा करिहें… तुलसी महारानी के । बियाह करवयिहें शालिग्राम से… ऊख के माड़ो गड़ाई… तुलसी के गाछ के मेहरारू लेखा सजावल जाई । चूड़ी, टिकुली, सेनुर सभे टिकाई… लाल चुनरी ओढा के नवकि कन्या बना दिहल जाई । मजगर खेल रहे हमरा खातिर… ।

फेर घर भर के लोग गीत गाई-

कवना घरे तुलसी जी लिहली जनमवा
कवना घरे भइली अहवात…
जगा द राम तुलसी के… भइले बिहान

ओही घरी हमनी के उ माड़ो के ऊख पे आपन हक जताइब जा ।

– हई जरी (जड़) देने से चार पोर ऊख हमार… हई ऊख में सियार पदले बा… हम ना खाइब । ( ऊख जब पाक जाला त कवनो कवनो पोर से फाट जाला, ओही जगह पे सब रस इकठ्ठा हो के , सुख के लाल हो जाला… हमनी के उहे कहीं जा कि इ सियार के पादल ह,एही से फाट गइल बा )

होत बिहान, हमनी के ओह माड़ो में से ऊख निकाल निकाल चूसब जा ।

हमार बाबा, बड़हन कर्मकांडी… उनके श्रीमुख से सुनल कथा के एहिजा अपना से मगज से लबरत बानी –
इ कथा ब्रह्मा जी कहले… देवता लोग के कहला पे…

ए हो देवता लोग, जानते बाड़… बुढा गईनी हो । दोसरकन के जिनगी के रूप गढ़े में थाक गइल रहीं त अन्घी लाग गइल । एह सुतला में हमार मुंह खुला रह गइल रहे ।
ओह घरी एगो राक्षस … नांव ओकर शंखासुर … बड़ा बदेल रहे… भयंकर उत्पाती ।

हमार मुंहवा त खुला रहले रहे… उ हमार मुंह में खेलत सभे वेद लोग के उठा ले गइल… वेद लोग हमार लईका… ।

अब हम बुढा से उ राकस धराये के मान के रहे !!?? उ त लेके समुन्दर के तली में समा गइल ।

हमरा कुछो बुझाइल ना त बिसनु भगवान भी गइनी । अब रउरे आसरा बा… सब बेद लोग के हमरा के लौटाईं ।

तब बिसनु भगवान मछली बन के समुन्दर में गइले… ओह राक्षस से घनघोर लड़ाई कइलन… शंखासुर के मार के वेद के अपना साथे लइले ।

बाकी एह लड़ाई में बिसनु भगवान थाक गइल रहन । सुस्ताये खातिर शेषनाग के शैया पे लेटले त नींद लाग गइल ।

नींद अस कि टूटले टूटे ना… अब सभके चिंता भइल कि भगवाने सुत जयिहें त संसार के पालन के करी ?

बिसनु भगवान के तुलसी से बड़ा प्रेम… सभे देवता कहले कि जब ले भगवान नइखन जागत तब ले तुलसी माई संसार में कल्याण करिहें ।

तुलसी जी बैकुंठ से धरती पे आ गइली । चार महीना बाद बिसनु भगवान के देह हिलल त देवता लोग लगले मंगल गावे –

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।
त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

अब बिसनु भगवान के नींद टूटल त तुलसी के खोजले….
सभे कहल उ त राउरे कार करत बाड़ी संसार में, अब जब रउरा जाग गइनी त उनका के ले आयीं । बिसनु भगवान उनका के लावे एह संसार में अइले त तुलसी नवकी दुलहिन बनके उनका लगे गइली । दुनो जाना के बिरह दूर भइलफेर तुलसी बैकुंठ पधरली । आ बिसनु भगवान आपन डिउटी… अरे संसार के पालनकरता वाला…. संभरलन ।

अब एह दिन के संसार के लोगन तुलसी आ बिसनु के बियाह के रूप में मनावेला । आ एही दिन बिसनु भगवान नींद से उठले त एकरा के देवठान (देव- उठान) कहल जाला ।
नवका पौधा ऊख के… मीठ – रसदार … आ पानिफल सिंघाड़ा इहे कुल्ही पूजा में चढ़ावल जाला ।

कहे के त बिसनु भगवान के जागे के परब ह , बाकी देखल जाओ त इ अपना भीतर के देवत्व जगावे के परब ह ।

त परेम पूर्वक बिसनु-तुलसी के गीत गाईं, मीठ- मीठ ऊख चूसीं आ दुनिया में अपना के मीठ बनायीं ।

तुलसी लहरिया लाल, ए रामा मोरे अंगनवा
मोरे अंगनवा तुलसी जी के गछिया
ब्याह ले जयिहें शालिग्राम , ए रामा मोरे अंगनवा….

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