शशि रंजन मिसिर जी के लिखल देवठान के कहनी

0
49

कार्तिक के महिना में हमार आजी रोज भिनसारे दुआर पर शिवाला के कुआं पे नहास, ओहिजे तुलसी जी के दीया बारस आ साथे गीतो गावस-

जगा द राम तुलसी के भइले बिहान हो…
जे मोरा तुलसी से नेह लगयिहें रामा
जनम जनम अहिवात मिलि जइहें हो राम…
जगा द राम तुलसी के

हमरा बड़ा जबून बुझाए कि हेतना फजिराहे इ पूजा कइला के का काम बा ? बाकिर एतना मालुम रहे कि एही दिनवें ऊख चुसेके बरत आवेला ।

आजी पूजा करिहें… तुलसी महारानी के । बियाह करवयिहें शालिग्राम से… ऊख के माड़ो गड़ाई… तुलसी के गाछ के मेहरारू लेखा सजावल जाई । चूड़ी, टिकुली, सेनुर सभे टिकाई… लाल चुनरी ओढा के नवकि कन्या बना दिहल जाई । मजगर खेल रहे हमरा खातिर… ।

फेर घर भर के लोग गीत गाई-

कवना घरे तुलसी जी लिहली जनमवा
कवना घरे भइली अहवात…
जगा द राम तुलसी के… भइले बिहान

ओही घरी हमनी के उ माड़ो के ऊख पे आपन हक जताइब जा ।

– हई जरी (जड़) देने से चार पोर ऊख हमार… हई ऊख में सियार पदले बा… हम ना खाइब । ( ऊख जब पाक जाला त कवनो कवनो पोर से फाट जाला, ओही जगह पे सब रस इकठ्ठा हो के , सुख के लाल हो जाला… हमनी के उहे कहीं जा कि इ सियार के पादल ह,एही से फाट गइल बा )

होत बिहान, हमनी के ओह माड़ो में से ऊख निकाल निकाल चूसब जा ।

हमार बाबा, बड़हन कर्मकांडी… उनके श्रीमुख से सुनल कथा के एहिजा अपना से मगज से लबरत बानी –
इ कथा ब्रह्मा जी कहले… देवता लोग के कहला पे…

ए हो देवता लोग, जानते बाड़… बुढा गईनी हो । दोसरकन के जिनगी के रूप गढ़े में थाक गइल रहीं त अन्घी लाग गइल । एह सुतला में हमार मुंह खुला रह गइल रहे ।
ओह घरी एगो राक्षस … नांव ओकर शंखासुर … बड़ा बदेल रहे… भयंकर उत्पाती ।

हमार मुंहवा त खुला रहले रहे… उ हमार मुंह में खेलत सभे वेद लोग के उठा ले गइल… वेद लोग हमार लईका… ।

अब हम बुढा से उ राकस धराये के मान के रहे !!?? उ त लेके समुन्दर के तली में समा गइल ।

हमरा कुछो बुझाइल ना त बिसनु भगवान भी गइनी । अब रउरे आसरा बा… सब बेद लोग के हमरा के लौटाईं ।

तब बिसनु भगवान मछली बन के समुन्दर में गइले… ओह राक्षस से घनघोर लड़ाई कइलन… शंखासुर के मार के वेद के अपना साथे लइले ।

बाकी एह लड़ाई में बिसनु भगवान थाक गइल रहन । सुस्ताये खातिर शेषनाग के शैया पे लेटले त नींद लाग गइल ।

नींद अस कि टूटले टूटे ना… अब सभके चिंता भइल कि भगवाने सुत जयिहें त संसार के पालन के करी ?

बिसनु भगवान के तुलसी से बड़ा प्रेम… सभे देवता कहले कि जब ले भगवान नइखन जागत तब ले तुलसी माई संसार में कल्याण करिहें ।

तुलसी जी बैकुंठ से धरती पे आ गइली । चार महीना बाद बिसनु भगवान के देह हिलल त देवता लोग लगले मंगल गावे –

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।
त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

अब बिसनु भगवान के नींद टूटल त तुलसी के खोजले….
सभे कहल उ त राउरे कार करत बाड़ी संसार में, अब जब रउरा जाग गइनी त उनका के ले आयीं । बिसनु भगवान उनका के लावे एह संसार में अइले त तुलसी नवकी दुलहिन बनके उनका लगे गइली । दुनो जाना के बिरह दूर भइलफेर तुलसी बैकुंठ पधरली । आ बिसनु भगवान आपन डिउटी… अरे संसार के पालनकरता वाला…. संभरलन ।

अब एह दिन के संसार के लोगन तुलसी आ बिसनु के बियाह के रूप में मनावेला । आ एही दिन बिसनु भगवान नींद से उठले त एकरा के देवठान (देव- उठान) कहल जाला ।
नवका पौधा ऊख के… मीठ – रसदार … आ पानिफल सिंघाड़ा इहे कुल्ही पूजा में चढ़ावल जाला ।

कहे के त बिसनु भगवान के जागे के परब ह , बाकी देखल जाओ त इ अपना भीतर के देवत्व जगावे के परब ह ।

त परेम पूर्वक बिसनु-तुलसी के गीत गाईं, मीठ- मीठ ऊख चूसीं आ दुनिया में अपना के मीठ बनायीं ।

तुलसी लहरिया लाल, ए रामा मोरे अंगनवा
मोरे अंगनवा तुलसी जी के गछिया
ब्याह ले जयिहें शालिग्राम , ए रामा मोरे अंगनवा….

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

Please enter your comment!
Please enter your name here

fifteen + six =