ढेर दिन हो गइल

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अनिमेष कुमार वर्मा
अनिमेष कुमार वर्मा

ढेर दिन हो गइल
बिना एलार्म के नींद खोलाइल
सबेरे उठ के दुअरा बइठ के
चाह पिअल, अखबार पढ़ाईल
ढेर दिन हो गइल,

बिना बतावले केहु के, घरे जाईल
बिना काम के घंटो बइठ के
गप्प छानल, सिंघारा खाइल
ढेर दिन हो गइल,

केहु के हाथे लिखल, चिट्ठी भेटाइल
कोनो लिफाफा कोनो पोस्टकार्ड
मन से खोलल, पढ़त मुस्काइल
ढेर दिन हो गइल,

कोनो फिलिम ना आइल
बइठ संगतिअन संगे तीन घंटा ले
गाना पे नाचल, सीटी बजाइल
ढेर दिन हो गइल

अकेले रहsल दिन बिताइल
देश दुनिआ के चिंता छोड़ के
अकेले बइठल, सुत के मताइल
ढेर दिन हो गइल,

गेना आ बल्ला उठाइल
सबेरे से लेके अन्हार होखे ले
जम के खेलल, थाक के आइल
ढेर दिन हो गईल,

नया कैसेट किनाइल
रील फसला पे पेन्सिल घुसा के
गोल घुमावल, गाना बजाइल
ढेर दिन हो गईल,

बुनी में कागज़ के नाव बनाइल
बरसाती कीन के बिना काम के
बहरी घुमल, भूंजा खाइल
ढेर दिन हो गईल,

जाड़ा के राति में अंगना बईठ
सब के साथे गोइंठा ज़रा के
आगि तापल लिट्टी सेकाइल
ढेर दिन हो गईल,

नया किताब किनाइल
नया गाना के लाइन हो जेमे
बइठ राति, के सुर सधाइल
ढेर दिन हो गईल,

सेब के साथे बीया खाइल
रात भर फेनु जाग के काटल
पेड़ ना उगो, बइठ डेराइल
ढेर दिन हो गईल,

आँखि बंद करके चलल
भीड़ से अलग बाकिर सबके साथे
बिना डरल, बिना टकराइल
ढेर दिन हो गईल,

-अनिमेष कुमार वर्मा (आखर के फेसबुक पेज से)

1 COMMENT

  1. बहुत बढिया लागल आपके रचना अनिमेष जी। इ लाइनन के कहही के नईखे
    केहु के हाथे लिखल, चिट्ठी भेटाइल
    कोनो लिफाफा कोनो पोस्टकार्ड
    मन से खोलल, पढ़त मुस्काइल
    ढेर दिन हो गइल,
    राजीव उपाध्याय के दूगो कबिता

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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