एकमुश्त समाधान: भोजपुरी में अनूदित लघुकथा

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एकमुश्त समाधान: भोजपुरी में अनूदित लघुकथा

डाॅ0 रामनिवास ‘मानव’ हिन्दी भाषा के जानल-मानल कवि, सरस बालगीतकार, सम्मानित लघुकथाकार, हरियाणा में रचाइल हिन्दी-साहित्य के पहिल शोधार्थी आ अधिकारी विद्वान का साथे एगो सफल हिन्दी-प्राध्यापक आ मंजल शोध-निर्देशक हउवे। उनका प्रतिभा का अंजोर से उनकर लिखल हर विधा के
रचना जगमगा गइल बा। एकर सबूत बा ओह विधन पर लिखल रचनन के अधिकारी विद्वानन का ओर से मिलल व्यापक स्वीकृति आ अनेक राष्ट्रीय संस्थन
से उनका मिलल पुरस्कार आ सम्मान। उनका कई हिन्दी-पुस्तकन के अनुवाद अनेक भारतीय भाषा का अलावा विदेशी भाषा में भी हो के देश-विदेश में पढ़ल जा रहल बा।

हमरा डाॅ0 ‘मानव’ के हिन्दी-लघुकथन© के पत्रा-पत्रिकन का माध्यम से पढ़त रहे के सुजोग पिछिला दस-बारह बरिस से मिलत रहल बा, आ तबसे हम
उनका लघुकथन से प्रभावित रहल बानी। सन् 2004 में छपल उनकर दूगो लघुकथा-संग्रह ‘घर लौटते क़दम’ आ ‘इतिहास गवाह है’ के जब पढ़े के अवसर मिलल, त पढ़के हम कुछ आउर ज्यादा प्रभावित भइलीं। हमरा ई समझे में देर ना लागल कि काहे उनका हिन्दी-रचनन के हिन्दीतर लोग अपना भाषा में अनुवाद क के अपना भाषा-भाषियन तक पहुंचावे खातिर लालायित बाड़े।

भोजपुरी बोलेवाला इलाका में हमार जनम भइला आ ओह भाषा में लिखे-पढ़े का प्रति लगाव रहला से, हम पिछिला चालीस साल से, भोजपुरी-साहित्य
से जुड़ल बानी। भोजपुरी-साहित्य के विकास पिछिला पचास बरिस में बहुत तेजी से भइल बा, जवना में कविता का अलावा गद्यो में बहुत काम भइल बा। कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध आदि का साथे लघुकथा भी भोजपुरी में खूब लिखा रहल बा। भोजपुरी के प्रायः सभ कहानीकार लघुकथा लिख रहल बाड़े, जवन पुस्तक के रूप में कम, बाकिर पत्रा-पत्रिकन का माध्यम से भोजपुरी के पाठकन तक पहुंच रहल बा।

सन् 1964 में, जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य-परिषद् का ओर से,चन्द्रभूषण सिन्हा का सम्पादन में पनरहगो लघुकथाकारन के एक इसगो लघुकथन के पहिलका संकलन ‘छोटी-मुटी गाजी मियां’ नाम से प्रकाशित भइल। अइसे त संकलित लघुकथा भोजपुरी का प्रारम्भिक दौर के लघुकथा कहइहें स, तबो सभ लघुकथा जिनगी का वास्तविकता से कवनो-ना-कवनो रूप में जुड़ के आपन पहचान बनावे में सफल रहल बाड़ी स। भोजपुरी-लघुकथा के दूसरकी पुस्तक आमुख ‘जमीन जोहत गोड़’ सन् 1982 में छपल रामनारायण उपाध्याय के चालीस लघुकथन के एकल संग्रह ह। एकर सभ लघुकथा कथ्य आ शिल्प, दूनू स्तर पर सफल बाड़ी स। तिसरका लघुकथा-संकलन ‘टुकी-टुकी जिनगी’ ब्रजकिशोर आ भगवतीप्रसाद द्विवेदी का संयुक्त सम्पादन में सन् 1990 में छपल, जवना में बारह गो लघुकथाकारन के उनसठ गो लघुकथा संकलित बाड़ी स। पुस्तक के सम्पादक ब्रजकिशोर के अनुसार, ”टुकी-टुकी जिनगी’ में समय का सत्य के कथाकार लोग बड़ा ईमानदारी से उरहले बा। शिल्प, कसाव, भाषा, कवनो दृष्टि से ई लघुकथा उनइस नइखी सन।“ भोजपुरी-लघुकथा के चउथका संकलन एह पांतियन के लेखक का सम्पादन में सन् 1994 में ‘तिरमिरी’ नाम से छपल, जवना में नवासी
गो लघुकथाकारन के एकहे गो लघुकथा दिहल गइल बा। एह संकलन के प्रकाशन से भोजपुरी-लघुकथा के विकास आ लघुकथाकारन के एह विधा के प्रति रुझान के अन्दाजा लागत बा। सन् 1997 में पांडेय कपिल आ कृष्णानन्द ‘कृष्ण’ का सम्पादन में ‘एक मुट्टी लाई’ नाम से एकसठ गो लघुकथाकारन के एकहेगो लघुकथा के संकलन प्रकाशित हो के पांचवी कड़ी का रूप में जुड़ल। भगवतीप्रसाद द्विवेदी के पचपन लघुकथन के एगो संग्रह ‘थाती’ नाम से सन् 1999 में प्रकाशित भइल, जवना के पांडुलिपि सन् 1990 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य-सम्मेलन का तरफ से ‘पांडेय जगन्नाथप्रसाद सिंह पुरस्कार’ से पुरस्कृत हो चुकल रहे। सन् 2001 में, गंगाप्रसाद ‘अरुण’ का सम्पादन में, अनेक लघुकथाकारन के लघुकथन के मिला के एगो संकलन ‘अगुआ’, सन् 2005 में, जयबहादुर सिंह के लघुकथा-संग्रह ‘सपना के सांच’, जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य-परिषद् का ओर से प्रकाशित होके आ मनोकामनासिंह ‘अजय’ के ‘खरजिउतिया’ भोजपुरी-लघुकथा का विकास के सहयात्राी बनल। हमरा जानकारी में इहे नवगो लघुकथा के पुस्तक भोजपुरी में लउकत बाड़ी
स। अगर कुछ छूटल पुस्तकनो के जोड़ दिहल जाय, तबो भोजपुरी में प्रकाशित लघुकथा-पुस्तकन के संख्या दस-बारह से ज्यादा ना होई।

भोजपुरी में छपल लघुकथा-संग्रहन आ पत्रा-पत्रिकन में छपेवाली लघुकथन के देख के अइसन लागत बा कि भोजपुरी-लघुकथा का भंडार के समृद्ध करे खातिर दोसरो भाषा के श्रेष्ठ लघुकथाकारन का लघुकथन के अनुवाद भोजपुरी-पाठकन का सामने आवे के चाहीं, जवनन के पढ़ के भोजपुरी-लघुकथाकारन के कुछ नया दृष्टि मिले आ पाठकन के नया स्वाद के लघुकथा से परिचित होरवे के अवसर मिले।

सन् 1990 में, हमरा सम्पादन में प्रकाशित भोजपुरी तिमाही ‘बिगुल’ में, हिन्दी के वरिष्ठ लघुकथाकार डाॅ0 सतीशराज पुष्करणा के कुछ हिन्दी-लघुकथन के भोजपुरी में अनुवाद प्रकाशित भइल रहे, जवनन के पाठक पसन्द कइले रहले। लघुकथा के क्षेत्रा में हरियाणा के खास पहचान दिलवावेवाला घुकथाकारन
में डाॅ0 रामनिवास ‘मानव’ के विशेष स्थान बा। जीवन आ जगत् के विभिन्न पहलुअन पर तेज नजर आ ओकरा के लघुकथा का शिल्प में ढाले के जइसन क्षमता डाॅ0 ‘मानव’ में लउकत बा, ओइसन बहुत कम लघुकथाकारन में देखे के मिलेला।

व्यक्ति, समाज, देश, दुनिया, घर, परिवार, नेता, मजदूर, आपसी द्वेष, दाम्पत्त्य सम्बन्ध में बिखराव, नारी-शोषण, बुढ़ापा के बेबसी, युवा पीढ़ी का मानसिकता में आइल बदलाव आ शिक्षा, शोध, साहित्य आदि से जुड़ल विषयन के लघुकथा में ढाल के एकरा आयाम के विस्तार देबे में डाॅ0 ‘मानव’ के प्रतिभा अपना पूरा क्षमता का साथे सामने आइल बा। उनका लघुकथन के सभ पात्रा आदमी के मनोवृत्तियन के प्रतीक का रूप में उरेहल बाड़े। एह पात्रान का माध्यम से युग के एगो पूरा तस्वीर देखल जा सकत बा।

डाॅ0 ‘मानव’ का लघुकथन के शैलीगत विशेषतो अपना ओर ध्यान खींचे वाला बा, जइसे-‘बिना लवटल राम’ (वर्णन), ‘चैकअप’ (विवरण), ‘शो-पीस’
(उत्तम पुरुष), ‘बीजारोपण’ (संवाद), ‘पत्नी बनाम नारी’ (पत्रा), ‘मैरिड आदमी’ (डायरी), ‘लाश’ (समाचार), ‘आ कवि के जनम’ (काव्य)। आकार का दृष्टि से डाॅ0 ‘मानव’ के लघुकथा चार पांतियन से लेके डेढ़ पन्ना तक के आकार में देखल जा सकेले। एह से ई बात बिना हिचकिचाहट के कहल जा सकेला कि लघुकथा के क्षेत्रा में जतना सफल शैलीगत प्रयोग डाॅ0 ‘मानव’ कइले बाड़े, ओतना शायदे केहू लघुकथाकार कइले बा।

डाॅ0 ‘मानव’ के दूनू लघुकथा-संग्रह ‘घर लौटते क़दम’ आ ‘इतिहास गवाह है’ में कथ्य के विविधता देखते बनत बा। ‘टाॅलरेन्स’, ‘निरापद’, ‘समझदारी’, ‘संस्कार’, ‘स्टेटस’, ‘मुक्ति’ आदि कुछ महत्त्वपूर्ण लघुकथा बाड़ी स, जवन जिनगी का समग्रता के रूपायित करत बाड़ी स। ‘घर लौटते क़दम’ लघुकथा में महानगरीय जिनगी में आदमी के पहचान गुम होरवे के पीड़ा के बहुत सटीक चित्राण कइल गइल बा। अहसहीं ‘शो-पीस’ में अपना जीयत बाप के उपेक्षा करे वाला बेटा सतीश द्वारा उनका मरला का बाद उनकर बड़हन फोटो सुनहरा फ्रेम में मढ़वा के टांगल आदमी का व्यवहार के विसंगति के उजागर करता बा। ‘व्यवस्था’ लघुकथा में भ्रष्टाचार, दमन, अन्याय आ आतंक का बुनियाद पर टिकल वर्तमान समाज का गठन पर चोट कइल बा। अइसहीं ‘दूरदर्शिता’ में भारतीय राजनीतिज्ञन का ओह पाखंड भरल मानसिकता के उजागर कइल बा, जे ऊपर से नैतिकता आ सदाचार के दुहाई देत बाड़े, बाकिर भीतरे-भीतर भ्रष्टाचार के समर्थक बाड़े। डाॅ0 ‘मानव’ के लघुकथा-संग्रह ‘इतिहास गवाह है’ के लघुकथा भी बहुत मर्मस्पर्शी आ पाठकन का मन पर अमिट छाप छोड़ेवाली बाड़ी स। ‘जड़ कटल गाछ’ में लेखक जमीन से कटला के व्यथा उजागर करत बाड़े। माई के ममता कइसे दोसरो पीड़ित परिवार तक पहुंच जाला, एकर चित्रा ‘माई’ लघुकथा में उकेरल बा। ‘जीवन-रेखा’ में बाप-बेटा का बिछोह के हृदयस्पर्शी चित्राण बा। ‘दोसरकी औरत’ में पराई औरत के प्रति आकर्षित होखेवाली पुरुष-मानसिकता के चित्रा देखे लायक बा। ‘शान्ति के द्वीप’ के मानवीय करुणा आ साम्प्रदायिक सद्भाव से सराबोर लघुकथा कहल जा सकेला।
डाॅ0 ‘मानव’ चूंकि शिक्षा, शोध, साहित्य आ पत्राकारिता से जुड़ल बाड़े, एह से कुछ लघुकथन का माध्यम से, ओहू क्षेत्रान में व्याप्त विसंगतियन के चित्रित करे में सफलता पवले बाड़े। ‘शोध-सन्दर्भ’ में अपना शोधछात्रा के शोधपत्रा संशोधन करे के बहाने कुछ दिन ले अपना लगे रोक के निर्देशक द्वारा बाद में अपना नाम से छपवा लिहल, ‘मोर्चाबन्दी’ आ ‘तटस्थ लोग’ में महाविद्यालय प्रबन्ध-समितियन में होखेवाली मनमानी, ‘निर्णय’ में विभागाध्यक्ष द्वारा ‘जूनियर’ पर अकारण धौंस जमावे के प्रवृत्ति, ‘चेतावनी’ में प्रिन्सिपल द्वारा अपना ‘जूनियर’ पर गलत आरोप लगा के प्रताड़ित कइल आ ‘चोट’ में अपना व्यक्तिगत फायदा खातिर समारोह के मुख्य अतिथि बना के केहू के उपकृत करे का प्रयास के उजागर कइल बा। ‘पहिल प्रति’, ‘दृष्टिकोण’, ‘मान-अपमान’, ‘डाॅ0 अश्वमुख कुटिल’, ‘दुमदार’ आदि में साहित्य आ पत्राकारिता-जगत् का विसंगतियन के अपना अनुभव का आंच में पका के
डाॅ0 ‘मानव’ यादगार लघुकथा बना देले बाड़े। डाॅ0 ‘मानव’ का लघुकथन में व्यक्ति, समाज, राजनीति, शिक्षा का साथे आउर अनेक सन्दर्भन का कुरूप सच्चाई के साक्षात्कार बहुत संवेदनशीलता का साथे भइल बा।

कुछ लघुकथन के शीर्षक खातिर अंगरेजी शब्दन के प्रयोग कइल बा, जवन विषयवस्तु का दृष्टि से सटीक लागत बा। एह से हम ओकर अनुवाद ना क
के ओहनी के जस-के-तस छोड़ देले बानी। हिन्दी के कारक-चिह्न लागल शीर्षकन में आइल हिन्दी-शब्दन के बदल के ओकरा जगह पर भोजपुरी-शब्दन
के प्रयोग कइल गइल बा। अनुवाद के क्रम में हमार प्रयास रहल बा कि हिन्दी के प्रचलित तत्सम शब्दन के भोजपुरीकरण करे खातिर ज्यादा तोड़-मरोड़ ना कइल जाय। भोजपुरी के हिन्दी से बहुत दूर ना रखके ओकर सहयोगी आ सहचर का रूप में साथे आगे बढ़े दिहल जाय।

डाॅ0 रामनिवास ‘मानव’ के उपर्युक्त दूनू लघुकथा-संग्रहन के अनूदित लघुकथन से भोजपुरी-लेखकन के नया ऊर्जा मिली आ भोजपुरी का पाठकन का
हिन्दी-लघुकथा के विकसित रूप आ ओकरा ऊंचाई के अन्दाजा लाग सकी। साथ ही, हिन्दीतर भाषा में लिखल जायेवाली लघुकथन के भोजपुरी में अनूदित क के पाठकन तक पहुंचावे का प्रवृत्ति के बलो मिली। उमेद बा, हमरा एह प्रयास के भोजपुरी-जगत् में स्वागत होई। इत्यलम्।

एकमुश्त समाधान: भोजपुरी लघुकथा संग्रह
अनुवादक: सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

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