हम बुझिले

Aditya prakash anokha
Aditya prakash anokha

हम देखिले
हम सुनीले
हम बुझिले
हम समझिले,
आपन गउँआ, आपन नगरिया
लोगवा काहे छोड़$ता,
सहर से नाता जोड़त जोड़त
अंगना काहे भोरऽता।

हम सहिले
हम भोगील
हम जीहिले
हम मरीले,
समय बेचके पइसा खातिर
घर छोड़के रोये खातिर
सारी उमरिया सहर में जागीके
गऊंआ में एक दिन सुते खातिर

हम पाइले
हम खोईले
हम हंसीले
हम रोइले
हाँथ में दू चार ढेबुआ लेके
डेरा पंहुची-ला हम जब,
सहर के छत निहारत निहारत
इयाद अंगना के आवे जब

हम चलीले
हम दउड़िले
हम भागिले
हम रुकीले
गरमी, जाड़ा आउर बरसात
भीड़ बढ़ावत लोगन के साथ
सहर के GDP बढ़ावे खातीर
पाथर तुरऽता एगो आउर हाथ।

लेखक: आदित्य प्रकाश अनोखा
जिला छपरा
गांव मनोहर बसंत
बिहार 841202

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