हवा दुनू चली बाबा

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मोहब्बत आ नफरत के हवा दुनू चली बाबा
तब नू ओह गली में दाल हमनी के गली बाबा

उ तहरा के मुआई फेर हमरो जान ली बाबा
चटक फूल से कहलस इहे नाजुक कली बाबा

गजन उल्टा भईल बा ई सियासत के गली बाबा
जहाना बस चोर एके गो आ चालीस गो अली बाबा

बिदाई में अगर स्टोव दे देहनी त ठीके बा,
कि बेटी के संगे ससुरार में इहो जली बाबा

गरीबी अपना खातिर बर तलाशे में भईल बुढ़िया
उमिर बइठल रही कतहूँ कि एकहेक दिन ताली बाबा

जवानी के जे ना बुझल बुढ़ापा ओके का बुझी,
बइठ के अपना दुआरा पर उ हाथ आपन माली बाबा

चढ़ावे के बली मंदिर में जे भखले रहे बकरा
पता कहवाँ रहे ओकरा चढ़ी ओकरे बली बाबा

धरम के, जात के सउदा सियासत के दोकानी पर,
इ दिल्ली में आ पटना में कहीं कबले चली बाबा

इ दुनिया हs इहाँ कुछो अचम्भा लागते नइखे
कि कि केकरा के कब कईसे कहाँ केतना छली बाबा

समुन्दर पार छोड़ीं, पड़ोसी हो गईल बिषधर,
पता केकरा रहे जे आस्तीने में पली बाबा

पियासल बा सभे कुइंया के पानी बा इहाँ जमकल,
खबर आईल बा दिल्ली से कानो बोरिंग हाली बाबा

तिंताई अब बुझाता तंग साहेब चाट से खा गइनी
कुनैन अंदर से ऊपर से इ मिसरी के डली बाबा

– तंग इनायत पुरी

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