नृत्य प्रधान भूमिका करने की लालसा पूरी न हो पायी – बंदिनी मिश्रा

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इस दौर की भोजपुरी फिल्मों में मां के रूप में सर्वाधिक व्यस्त बंदिनी मिश्रा का अतीत भी बड़ा रोचक और इंद्रधनुषी रहा है। चार दर्जन से अधिक फिल्मों में मां की भूमिका निभा चुकी नृत्य प्रवीणा अभिनेत्री बंदिनी दो दर्जन भोजपुरी फिल्मों की नायिका रह चुकी हैं। इतना ही नहीं पूरे तीन दर्जन हिन्दी फिल्में भी इनके खाते में हैं। कत्थक विशारद बंदिनी मिश्रा से हाल ही में उनके पूरे फिल्मी कैरियर को लेकर एक लम्बी बातचीत हुई। प्रस्तुत है, उसी वार्तालाप के संक्षिप्त और संपादित अंशः

भोजपुरी फिल्मों की मां की चर्चा होती है, तो बंदिनी मिश्रा की चर्चा अवश्य होती है। अभी कौन-कौन सी फिल्में आ रही हैं आपकी?
भोजपुरी में मां के रूप में मैं पचास फिल्में कर चुकी हूं, इसलिए चर्चा तो स्वाभाविक है। अभी मेरी तीन फिल्में प्रदर्शित होने जा रही हैं। अभय सिन्हा की “खिलाड़ी” तो बिहार में रिलीज हो भी गयी, यूपी और बाॅम्बे में बस होने वाली है। बाली की “जिद्दी” और राजकुमार पांडेय की “ट्रक डाईवर-2” भी रिलीज हो रही है।

तीनों में बस ममता की मूरत जैसी मां हैं या फिर कुछ अलग भी शेड है?
नहीं, अलग-अलग है। ममता तो मां का ही दूसरा नाम है, मगर इन फिल्मों में थोड़ी अलग-अलग भूमिकाएं हैं। “खिलाड़ी” में पति की मौत का बदला लेने वाली ठकुराईन हूं, तो “जिद्दी” में थोड़ा काॅमिक टच है। “ट्रक ड्राईवर” में बस सामान्य भूमिका है।

काम तो आपने सभी के साथ किया है। मगर, आपने किस निर्देशक के साथ अधिक फिल्में की हैं?
अधिकाशं निर्माता-निर्देशकों ने रिपीट किया मु-हजये। लेकिन, राजकुमार पांडेय को धन्यवाद दूंगी कि उन्होंने अपनी (लगभग) हर फिल्म में याद रखा। मां के रूप में मैंने पचास फिल्में की हैं, जिसमें 20 फिल्में राजकुमार जी की हैं। इसलिए मैं उनको धन्यवाद देती हूं।

ये तो मां की बातें हुईं। अब आप नायिका बंदिनी मिश्रा की याद ताजा करें?
नायिका बंदिनी को भी खूब काम मिला, खूब प्यार मिला। सुजीत कुमार जी के साथ भोजपुरी फिल्म की नायिका बनी। “पान खाये सईंया हमार” में मैं पानवाली ही बनी हूं। इसमें रणजीत खलनायक थे। अमिताभ बच्चन और रेखा जी ने अतिथि कलाकार के रूप में काम किया था। इस तरह मेरी एंट्री शानदार रही। लेकिन, मुझे सबसे पहले साईन किया अशोक चंद जैन ने, जो कुणाल जी के साथ मुझे हीरोइन बनाना चाहते थे।

फिर ये बदलाव कैसे आया?
एस.एन. त्रिपाठी के यहां सुजीत कुमार मिले। बातें चल रही थीं, तभी उन्होंने अपनी फिल्म की भी बात चलायी और मुझे अपने आॅफिस बुलाया। कहानी मुझे पसंद आयी और मैंने हां कह दी।

अब हिन्दी फिल्मों की भी चर्चा कर लें?
हिन्दी में राजश्री प्रोडक्शन की ‘पायल की -हजयंकार’ मेरी पहली फिल्म थी। कोमल महुआकर के साथ मैं सेकण्ड लीड में थी। उसके बाद शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी के साथ “फांसी के बाद” की। इसमें शक्ति कपूर की बहन थी। गोविन्दा-मंदाकिनी के साथ “प्यार मोहब्बत” की। “आगे की सोच” और “खोल दे मेरी जुबान” में दादा कोंडके की नायिका थी। हिन्दी में तीन दर्जन फिल्में की।

लेकिन, प्रशिक्षित नृत्यांगना होने का लाभ नहीं मिला?
लाभ तो मिला ही। “सेनुर” में मैंने सिर्फ नृत्य किया है। उसे देखकर ही मुझे कई फिल्मों के आॅफर आये।

आप कत्थक में विशाद कर चुकी हैं। कभी ऐसी इच्छा जगी कि आपको भी कोई “उमराव जान” “किनारा” या “साधना” सरीखी फिल्में मिले?
इच्छा तो जगी ही रही। मगर, ऐसा नहीं होना था, सो नहीं हुआ और नृत्य प्रधान भूमिका करने को लालसा पूरी न हो पायी।

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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