विमल कुमार जी के लिखल कहाँ गइल आँगन अंगनईया

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सभे चाहे एकल परिवार
संयुक्त परिवार दिल में दरार
दुआरा के भइल बंटाधार
देख के हमरा होखला मलाल
सुनर दुआरा केहु ना खिवैया
कहाँ गइल आँगन अंगनईया ।

खेत बधार परिवार बँटि गइल
दिल से दिल के तार कटि गइल
माई बाप के पेआर बँटि गइल
बेटी छछने बेटा पेआर से हटा गइल
दिल के सभ दरवाजा सटि गइल
एह दिल में अब दिल ना बसे
बसेला अनजान अनगईंया
कहाँ गइल आँगन अंगनईया ।।

कहाँ गइल चिरईं के खोंता
ना लउके फूदुकत घरवइया
कौआ मैनी अउर कबूतर
खोजत बा फेंड़ के छईंया
सभे शहर में जा बसल
अब बा कहाँ उ कवनो गईंआ
पेआर मोहबत जहाँ बसत रहे
उ कहाँ गइल आँगन अंगनईया ।।

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रचना-विमल कुमार
ग्राम+पोस्ट-जमुआँव

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