जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के लिखल भोजपुरी गीत कवन नजीर देहलु गोरिया

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

हहरे मोरे हियरा के पीर
करेजवा चीर देहलु गोरिया ।
काँपे लागल सभके जमीर
कवन नजीर देहलु गोरिया ।

गउवाँ के घरवा न लगे मनसायन
ढ़ोल मजीरा भूलल, भूलल गायन
बनि गइल कइसन तसवीर
कवन नजीर देहलु गोरिया ।

आँख मुलुकावेले ललकी किरिनियाँ
भोरहीं जगावेले कांची बाटे निनियाँ
भइल तन मन दूनहूँ अधीर
कवन नजीर देहलु गोरिया।

नन्हका बेटहना कहवाँ पराइल
घरवाँ से सनमति अनही हेराइल
फूटि गइल काहें तकदीर
कवन नजीर देहलु गोरिया।

झपकल आँख बाटे बंसखट बिछवना
नन्हका रहल भर घरे के खेलवना
बनि गइलू ओकरो वजीर
कवन नजीर देहलु गोरिया।

चिकरेली माई बहिनियों चिकरेले
थथमल बाप भाई असगुन उकरेले
थम्हे नाही नयना से नीर
कवन नजीर देहलु गोरिया।

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