कवने ओरियाँ

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पीरितिया के कइसे जोगाईं जोगी जी ।
कवने ओरियाँ मुहवाँ छिपाईं जोगी जी ॥

बयरी बनल बाटें पुलिस दरोगवा
अचके मे बढ़ल जाता प्रेम रोगवा
घरी घरी देवता के मनाईं जोगी जी ॥ कवने ओरियाँ……………..

घरवाँ दुवरवाँ बा पहिले से पहरा
अब दुसवार भईल निकसल बहरा
कब प्रेम के सेजरिया सजाईं जोगी जी ॥ कवने ओरियाँ…………….

कूल्हि कोतवलिया मे जमघट लागल
बचवा क हाल सुनी घर भइल पागल
जम के सगरों होता ठोकाई जोगी जी ॥ कवने ओरियाँ…………..

खुस होत चंहकत भाई भतीजवा
सइयाँ बदे मोर करकत करेजवा
अपने रोमियो के कहाँ ढुकाईं जोगी जी ॥ कवने ओरियाँ…………..

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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