कुमार विनय पांडेय जी के लिखल माई के करजा

0
204

नान्ह-नान्ह हाथ-गोड नान्हही देहिया,
दिन-दिन बढल जाला तोहरो उमीरिया।
घर भर करे तोहसे बहुत सनेहिया,
नजर ना लागो माई-बाबूजी के कीरिया।।

बाटे ना सहुर तहरा उठे-बैठे, बोले के,
तवनो पर माई संगे दिन-रात जुझेली।
हवS अडभंगी, रूप हउव बाबा भोले के,
धन बाड़ी माई तोहार हर बात बुझेली।।

भोरही से भर दिन घर-बासन करेली,
सबके सम्हारे, राखे तोहरो उ ध्यान।
छने-छने छतिया के अमरित पीयावेली,
का चाही, कब चाही, बाटे सब ज्ञान।।

दिनवा के थाकल जब नीनवा सतावे उनके,
सुध-बुध खोई गिर जाली उ बिछवना पर।
तनिको तु रोअ चाहे, अचिको हिलाव उनके,
जागेली चिहाई खोजे तोहके बिछवना पर।।

रह जाली दिनो-रात तोहरे में अझुराई के,
आपन सुखवा के ना बाटे उनका फिकिर
धन्य बाडी माई, धन्य महिमा बा माई के,
तबो पापी पूतवा ना करे उनकर जिकिर।।

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

Please enter your comment!
Please enter your name here

20 − three =