मातृभासा के कब्रगाह पर होई हिंदी के विकास ? : संतोष पटेल

0
126

हिंदी के साम्राज्यवादी नीति-

केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत सरकार द्वारा ओकर साइट पर हिंदी भाषा में लोक भाषा बाड़ी सन. ओहि में क्रम संख्या 22 पर हिंदी के भी राखल बा।
हिंदी में हिंदी एगो लोक भाषा ह ? ई का घाल मेल ह ?
1.अवधी
2. बघेली
3. बागड़ी (राजस्थानी)
4. बंजारी
5. मेवाड़ी
6. मेवानी
7. बाड़मौड़ी/गद्दी
8. भोजपुरी
9. ब्रजभाषा
10. बुन्देली
11. नागपुरिया
12. निमाड़ी
13. चम्बेली
14. छत्तीसगढ़ी
15. छुडा़ही
16. ढूंढाड़ी
17.पहाड़ी
18. पंचपरगनिया
19. गढ़वाली
20. हाड़ौती
21. हरियाणी
22. हिंदी
23. पंगवाली
24. पवारी
25. जौनसारी
26. कांगड़ी
27 खैरारी
28. खोरठा /खोट्टा
29.राजस्थानी
30. सदान/सादरी
31. कुलवी
32. कुमायूँनी
33. कुर्माली ठार
34. लबानी
35. सानोरी
36. सिरमौरी
37. लमानी/लबांड़ी
38. लड़िया
39. लोधी
40. मगही
41. सोड़वारी
42. सुगाली
43. मैथिली
44. मालवी
45. मांडली
46.मारवाड़ी
47. सरगुजिया
48. सूरजपुरी।

हिंदी निवेदिता मेनन जी जेएनयू में प्रोफेसर बाड़ी. उहाँ के लेख तहलका हिंदी पत्रिका 15मार्च, 2016 क आइल बा – “बहुत नाज़ुक है राष्ट्रवाद” जेकरा में उ लिखत बाड़ी-(हिंदी से भोजपुरी कइल बा)

“हिंदी के मात्र 20 प्रतिशत लोग प्रयोग करेला देश में बाकिर सरकार जनगणना में 50प्रतिशत देखा देलस. कमाल देखि देश के तक़रीबन 50 भाषा सन के हिंदी बना दिहल गइल, बा नू मज़ादार तथ्य।

भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, बुन्देली जइसन भाषा बाड़ी सन ओकर आपन संस्कृति बा।
आपन साहित्य बा बाकिर एह कुल के हिंदी में ले आवल गईल बा. इ बतावे ला कि इ भाषा स्वायत्त नइखी सन आ हिंदी भारत के कुल आबादी के 50 प्रतिशत लोग बेलेला।”

मेनन जी के बात कुछ हद ले सहियो बा काहे कि जब भोजपुरी भाषा मान्यता आनोद्लन सूचना के अधिकार 2005 के तहत भारत सरकार के लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया से जानकारी मंगलस कि 2011 में भइल जनगनाणा में भोजपुरी भाषी के संख्या का बा?
सरकार के ओर से सन 2001 के जानकारी दे दिहल गईल जबकि मांगल रहे 2011 के। फेर लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया के कलकत्ता से एगो चिट्ठी आइल कि अभी भारत के सब प्रान्त से मिलल सूचना के इक्कठा कइल जा रहल बा। बाकिर पुष्ट जानकारी इहे बा कि हिंदी के मजबूती देवे ला भोजपुरी भासियन के संख्या हिंदी में ही राखल बा।

देश के आज़ादी के समय से भोजपुरी क्षेत्र के विद्वान लोगन के हिंदी के राष्ट्रीय भाषा बनावे के सपना देखले रहे लोग, अब ओह के आत्मा के शांति मिलत होई कि ओहलोग के महतारी के भाषा के कब्रगाह में दफ़न कर के हिंदी के फले फुले में पूरा सरकारी अमला लाग गइल बा।

बाकिर का सोचत बानी का इ एतना आसान बा. भाषा के मुआवे के पहिले संस्कृति के मुआवे के पड़ी. भोजपुरी संस्कृति बहुत बरियार बा आ ओकर सोर ज़मीन के भीतरी ले बा. हमनी के इ देखल जाव कि हिंदी केआपन कौन संस्कृति ह? आ उ कहाँ के भाषा ह? मतलब ओकर एगो क्षेत्र?

मेरे साक्षात्कार, जवन किताब घर प्रकाशन दिल्ली से वर्ष 2002 में प्रकाशित भइल रहे ।जवना के पृष्ठ 115-116 पर रजनी श्रीवास्तव जी एगो सवाल के जबाब में साहित्य अकादमी के वर्तमान अध्यक्ष, कुशीनगर निवासी डॉ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी कहले बानी-

” इस समय अंग्रेजी के विराट वातारण में और सूचना क्रांति के इस आश्चर्यजनक माहौल में यह सही है कि भोजपुरी की कोई स्थिति नहीं है पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस भाषा कि उपेक्षा हो। दुसरे बोलने वालों की संख्या करोड़ो में है . इस भाषा में साँस लेने वालों का क्षेत्र बड़ा व्यापक है. जब कोई भाषा मरती है तो उसके साथ पूरी संस्कृति मर जाती है…..”

अब देखे वाला बात इ बा कि तिवारी जी भोजपुरी क्षेत्र के बानी जवन गलती आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कइले बानी उहे त अभियो के अध्यक्ष क रहल बानी. यानि राजस्थानी जब बिना सांविधानिक मान्यता के साहित्य अकादमी के भाषा बिया त फेर हेतना साल से रह के तिवारी जी भोजपुरी के इहे दर्जा काहे ना दिला देनी?

जबकि नामवर सिंह जी के एगो वाकया इहा उल्लेखित करल जरुरी बा-

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के 8वां अधिवेशन सन 1982 में अमनौर(सारण) में भइल रहे, उहाँ के ओहिजा डॉ नामवर सिंह जी इ बात के स्वीकार कइले रही कि राजस्थानी साहित्य अकादमी में भाषा रूप में शामिल बिया, ओकरा से हिंदी के कवनो नोकसान ना भइल त फेर भोजपुरी से हिंदी के कइसन नोकसान? इ समझे वाला बात बा कि मैथिली संविधान के आंठ्वी अनुसूची में आ गईल त हिंदी कहाँ कमजोर भइल?

हिंदी के विषय में इहा लिखल जरुरी बा-
लोकग्रन्थमाला प्रकाशन के एगो किताब बा सत्ता और समाज:
धीरू भाई सेठ एकर प्रस्तुति आ सम्पादन सीएसडीएस के श्री अभय कुमार दूबे जी एगो आलेख में लिखत बाड़े-

” आज लिखी और बोली जानेवाली हिंदी किसी एक स्पष्ट पहचान वाले भौगालिक सांस्कृतिक समुदाय की भाषा नहीं रह गयी है. उसका विकास उपरी भाषा के रूप में हुआ है जिसने कई राज्यों की कई भाषाओं को अपने नीचे दबा लिया है . इन पीड़ित भाषाओँ में अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मारवाड़ी, हरियाणवी, मैथिली, और उर्दू भी शामिल है हालांकि इन पर हिंदी का वर्चस्व अधिकाशत: ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रिया की देन है, दूसरी तरफ हिंदी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की खोज में है. जो उसे अपने क्षेत्र की किसी स्थानीय संस्कृति में नहीं मिल सकती इसलिए हिंदी आज राजनीतिक मुद्दों कि भाषा बन गयी है. ( साभार- भाषा विवाद बनाम लोकतंत्रीकरण / अंग्रेजी का वर्चस्व खत्महोनाचाहिए, पर कैसे? पृष्ठ- 339)

विदित होखे कि चेन्नई में 19-20 सितम्बर, 2015 के लैंग्वेज राईट कांफ्रेंस आयोजित भइल जेकरा में एगो घोषणा पत्र जारी कइल गइल-

We demand that the Union Government address the following demands and accept them immediately:

  • Make all the languages listed in Schedule 8 of the Constitution of India the official languages of the Union Government
  • Include in the Schedule 8 of the Constitution the languages for which the demands were made by their respective language communities and pending with the Union Government for many years
  • Provide urgent support to the ethnic, indigenous and other languages with fewer number of speakers through an exclusive government agency and save them from extinction and assimilation.
  • भोजपुरी भाषी के राष्ट्रीय सोच-

    भोजपुरी भाषा क आंदोलन ओकर अस्मिता क आंदोलन ह। भोजपुरिया लोग राष्ट्रीय भाव के जादे होला। होखल ठीक बा। होखहूँ के चाहीं। ऐही से भोजपुरी भाषा के आंदोलन आज ले साहित्यिक आ सांस्कृतिक आंदोलन ही बनल रहल। कबो राजनीतिक आन्दोलन ना बनल जैसे भाषा तमिल भा मराठा में राजनितिक पहचान ह। हिंदी में भोजपुरिया के प्राण बसेला त भोजपुरिया के आंत्मा भोजपुरिये में बसेला।
    भोजपुरिया कबो हिंदी क विरोध ना कइलस बलुक विकास में लागल रहल बाकिर ह भोजपुरिये के विकास में जादे मुखर ना भइल बादो एकरा” भोजपुरी साहित्य के लेखन हिंदी के समानांतर चलत रहल”- डॉ मेनेजर पाण्डेय जी कहले बा।
    अब बताई बाबा आदम के लिक ध के चलब त काम चले वाला बा?

    एगो सच्चाई-

    देश के आज़ादी के बाद संविधान सभा में लगभग छव सप्ताह ले राजभाषा के चुनाव प बहस भइल। बहुत बहस भइल राजभाषा का होई। संपर्क भाषा का होई। खैर बहस होत रहल। भारत के संप्रभुता के देखावे ला त एगो भाषा के चुनाव जरुरी रहे। बहस बड़ा लमहर चलल। अब चुनाव पर वोट होखे के रहे। वोट भइल। 78 – 78 पहिले बराबर हो गईल। मामिला फंस गइल। फेर ई मामला संविधान सभा के सोझा राखल गइल वोट ला। बड़ा मुश्किल से अबकी बेर 78 आ 77 से मामिला फरियाइल। आ हिंदी मात्र एगो वोट से राजभाषा बनल। मुंशी अयंगर फॉर्मूला से देवनागरी के लिपि स्वीकार कइल गइल। बाकिर संख्या रोमन ही रहल। तब से एक वोट से हिंदी घीव पियत बिया।

    बाबा साहेब आंबेडकर जी के कहनाम बा – there was no article which proved more controverical than article 115 with the (Hindi) question. No article produced more opposition. No article, more heat.

    भोजपुरी भाषा के बढ़त प्रभाव में भोजपुरी सिनेमा के योगदान आ भोजपुरी भाषा के वैश्विक पूंजीवाद से करत प्रतिवाद के प्रशंसा एगो ताज़ा आर्टिकल language में आइल बा। जेकरा Whitney Cox लिखले बाड़न।जे यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में एसोसिएट प्रोफेसर बाडे। .”…..As elsewhere in the world, minority language are rapidly declining in the face of the ascendant registers of media and of global capitalism. There are countervailing tendencies: for instance, the cinema of such subregional languages as Bhojpuri continues to thrive and in the dispora, and the Internet has created new avenues and forums of expression…….”(page 159, Langauge, Key concept of Modern Indian Studies, oxford University Press,2015)

    एह देश के भाषाई विविधता के दबा के का सन्देश देवे चाहत बिया सरकार ? यानि मातृभाषा सन के कब्रगाह पर हिंदी पनकी का ?

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

Please enter your comment!
Please enter your name here

2 × three =