परदेसिया

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धनंजय तिवारी
धनंजय तिवारी

परदेसिया

“ट्रेन के का पोजीशन बा” बलराम व्यग्रता से पूछले.
“बाबूजी ट्रेन त एक घंटा लेट बिया.” बलराम के बेटा रमेश जबाब देहले.
“एहिजा एक घंटा लेट बिया त वोइजा पहुचत पहुचत त और अबेर हो जाई. बच्चा कुल राह देखत होईह सन”
“रउवा परेशान मत होई.” रमेश मुस्कुरा के कहले “इ समय से ही पहुची. देर से भी पहुची त कवन रउवा ऑफिस जायेके बा. बच्चा लोग के भी छुट्टी ही बा”
बलराम के थोडा राहत भईल.
“सुरेश और संदीप, तह लोग घरे चल जा लोग.” बलराम पट्टीदारी के नाती कुल जवन की उनके चढ़ावे आईल रहल सन, ओकनी से कहले “फालतू में बईठ के परेशान होखब लोग. हमनी के चढ़ जाएब जा.”
“ना बाबा. अब हमनी के रउवा के चढ़ा के ही जाएब जा.” सुरेश कहले और संदीप भी उनका हा में हां मिलवले.
बलराम आगे कुछ न कहले. दिमाग शून्य में भटके लागल और एही क्रम में बरसो पीछे चल गईले. बरसो पूरान बात जेहन में ताजा हो गईल.
“केतना दिन के छुट्टी में आईल बाड़ बाबू.” बलराम के बाबूजी पूछनी.
बलराम अभी कुछ ही देर पहिले ही बाहर से आईल रहले और मीठा पानी के नाश्ता करत रहले.
बाबूजी के का जबाब दी एही संकोच में रहले. जबाब सुनके उहाके का प्रतिक्रिया होई एके लेके उनका डर रहे.
“एक महिना त रहबे करिहे कम से कम” बलराम के बजाय उनकर माई जबाब देहली “देखत नईखी इनकर शरीर केतना टूट गईल बा. लागता दिन भर भूखे प्यासे रहेले”
“अब हम कबो वापस न जाएब.” बलराम गंभीर होके कहले’
“काहे ? “ बाबूजी चौक के पूछनी “नौकरी छूट गईल का ?”
“छूट नाही गईल. हम खुद ही छोड़ देनी ह”
“का बात करतार? तहार दिमाग त नईखे नु ख़राब हो गईल?”
“अब हमसे परदेस नईखे रहल जात, आपन माटी छोडके. परिवार छोड़ के.” बलिराम कहले.
“परिवार बिना अच्छा नईखे लागत त परिवार के साथे लेजयित. हमनी के दुनु प्रानी के काम चल जाईत पर एकरा खातिर अपना जिंदगी से खिलवाड़”
“हम एहिजा कुछ करेब.”
“अयिजा का बा करे लायक. माटी कोड़ब और धूर फकब. गाई भईस चरियब अतना पढ़ लिखके. बाकी भाई कुल ठाट से रहीय सन और तू और तहार परिवार भीख मंगब लोग ?”
“छोड़ी न काहे के डाट तानी.” बलराम के माई कहनी “नसीब में होई त एहिजा काम मिल जाई. एगो लईका के त लगे रहे के ही चाही.”
बलराम कुछ जबाब न देहले और उनकर बाबूजी भी चुप हो गईनी. कुछ देर बाद उ अन्दर चल गईले.

बलराम चार भाई में सबसे छोट रहले और सबके दुलारा. बाकी भाई लोग जहा कम पढ़ल लिखल रहे, लोग बलराम बारहवी कईले रहले. आज से पचास साल पाहिले १२वि पास कईल एगो बढहन बात रहे. तीनो भाई के रेलवे में नौकरी हो गईल रहे. १२वि पास करते ही बड भाई लोग बलराम के भी नौकरी के पीछे पड़ गईल लोग. उनका बाबूजी के भी इहे इच्छा रहे की इनकर नौकरी लाग जाऊ. शादी पहिले ही हो गईल रहे. सबसे बढ़ भाई कलकत्ता में रहले और वोहिजा एगो फैक्ट्री में सुपरवाईजर के नौकरी के बात कईले रहले. सरकारी नौकरी मिलल अब ओतना आसन न रह गईल रहे. बलराम और उनकर माई के तनिको इच्छा न रहे पर बाकि लोग के दबाव में उ नौकरी करे चल गईले.

वोइदीन से लेके कवनो अईसन दिन न बीतल जब बलराम के घर, परिवार और गाव के याद ना आईल होखे. उनका लागे जैसन की उ जेल में बंद होखस. रातिदीन बस गाव के याद आवे और मन करे की कब नौकरी छोड़ के गावे भाग जास. कईसे क के उ पाच साल निकलले पर ओकरा बाद उनकर गाव के याद, अपना माटी के मोह उनका नौकरी पर भारी पड़ गईल और उ नौकरी छोड़े के फैसला क लेहले. अभी तक उ चार बच्चन के बाप बन गईल रहले. तीन लड़की और एक लड़का.

बलराम के निर्णय पर घर में काफी बवाल भईल. बाबूजी और बलराम के मलिकायिन उनसे बात कईल छोड़ देहल लोग. उनका माई के सहारा रहे. पर उहो अपना निर्णय पर अडिग रहले और वापस ना गईले नौकरी पर. बाद में उनकर बाबूजी और मेहरारू के नाराजगी दूर हो गईल. कुछ दिन बाद उनके पास के ही चीनी मिल के किरानी के नौकरी मिल गईल. जिदगी आगे बढे लागल.

धीरे धीरे समय बीतल और पहले माई बाबूजी के साथ छूटल और फिर ओकरा बाद भाई लोग के. चारू भाई अलग हो गईल लोग. चारू भाई में इन्ही के सबसे आर्थिक स्थिति ख़राब रहे. मिल के तनख्वाह बहुत मामूली रहे और ओइपर से चारगो बच्चा के खर्चा और मेहरारू के बीमारी. भाई लोग खेत बाट के बटहिया दे देल रहे और अब इनका हिस्सा के खेती भी कम रह गईल रहे. पर बलराम हिम्मत न हरले और जवन बलराम मा बाप के रहते कभी खेत में पैर न कड़ले रहले. खुद सारा खेती करे लगले. होत फजीरे कुदारी लेके खेत में चाल जास और जब मिल जाए के टाइम होखे त वापस आके जास. गाव के लोग उनका मेहनत के देखके दंग रहे और ओकर सब तारीफ करे।

अपना मिटटी के लगाव ही बलराम के इ दिन देखे पर मजबूर कईले रहे, पर उ नमक रोटी खाके भी खुश रहले. उनका सबसे ज्यादा ख़ुशी इ रहे की उ अपना धरती पर रहले, अपना लोग के बिच में रहले।

जिदगी कठिनाई से मगर खुशहाली में बीत गईल और मिल से रिटायर होत होत उ अपना सारा जिम्मेदारी से निवृत्त हो गईल रहले. तीनो लड़की के शादी क देले रहले और लड़का के भी शादी हो गईल रहे. अब उ दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करत रहे.
लड़का के शादी के साल भर भीतरे ही उनकर पत्नी उनकर साथ छोड़ देहली. बहू साल भर उनका पास ही रहली पर लड़का के तकलीफ देखके उ जबरजस्ती उनके बाहर भेज देहले. अभी उ आपन खाना बनावे लायक रहले और खुद ही आपन खाना बनावस.
चार साल बाद उ अचानक बीमार हो गईले और तब रमेश, जबरजस्ती उनकी इच्छा के विरुद्ध अपना परिवार के गावे पंहुचा देहले.
उ साफ़ क देले रहले की उनकर परिवार अब गावे ही रही’. उनका अकेले न छोडल जाई.

सच बात त इ रहे की अतना दिन अकेले रहिके बलराम भी टूट गईल रहले और परिवार पाके उ फिर से खड़ा हो गईले. नाती नातिन के साथै खेल के उनकर बचपन वापस आ गईल रहे. कभी खुद घोडा बन जास त कभी मुर्गा. बच्चा कुल जेतना करे काराव सन ओतना करे होखस. जिदगी की असली सुख त इहे नु रहे. जेतना प्यार उनका नाती नातिन से भईल रहे ओतना प्यार त उनका अपना बच्चा लोग से भी न भईल रहे कभी. कहल जाला की सूद, मूरह से ज्यादा पयारा होला और उहे बात रहे।

गर्मी के दू महिना के छुट्टी भईल त उ बच्चा और पतोह के लड़का के पास भजे देहले. उनका लगे लड़की कुल आ गयिल रहली सन.
जैसे जैसे पतोह और बच्चा लोग के आवे के दिन नियरात गईल, बलराम चिंता में रहे लगले. दिमाग में कई तरह के बात चले. दिन भर उधेड़बुन में रहस की कही गाव पे रखके ओकनी के भविष्य के साथै खिलवाड़ त नईखी करत.
फिर पक्ष और विपक्ष के बात के तर्क पर तौलस. उहो त सब छोडके गावे आ गईल रहले अपना जन्म धरती पर फिर बच्चा कुल के अयिजा रहल कईसे गलत हो सकत रहे।

फिर उ गाव के समाज के देखस. पर समाज त एकदम बदल गईल रहे. गाव पहिले स्वर्ग रहे. गाव में केहू एक्का दुक्का ही नशेडी रहे और नशा के नाम पर खैनी खा लेउ. जेकरा लगे ढेर पईसा रहे उ जर्दा पान खा लेउ. पर आजकल के लईका कुल के मुह त दिनभर गुटखा पान से भरल रहता. पहिले दू चार कोस पर दारू के एगो दुकान रहे और पिए वाला भी एकाध ही लोग जबकि अब त पूरा गाव ही सूरा के सेवन करता और ओ लोग के सुविधा खातिर गाव के बीचो बिच दारू के दुकान खुल गईल बा. गाव के एकमात्र स्कूल के इट भले उजाड़ गईल बा पर दारू के पक्का दुकान बा.
पहिले अपना से बढ़ के लोग सम्मान करे और देखते ही खटिया से उठ जाऊ. बड के सामने छोट के बैठे के हिम्मत न रहे. जबकि आज के नव्छेडीया त सामने ही अपना बाप के उमिर के आदमी के भी गरियाव तार सन.

उनका समय में गाव में कुश्ती होखे, कबड्डी होखे, ओल्हापाती, चिकाबाणी होखे जबकि आजकल के लईका त दिन भर मोबाइल से छिपकल रह्तर सन.
गीत संगीत के त बात ही निराला बा. उनका समय में लोग भिखारी और महेंदर मिसिर के गीत पर झूम उठे जबकी आजकल के गीत पर त लजा के मुह तोप लेबे के पड़ता या फिर खुदे लुका जाए के पड़ता.

राजनीती के माहौल भी बहुत गन्दा हो गईल बा और बात बात पे जान लिहल आम बात बा. पाहिले केनेता कुल के प्रति लोग के श्रधा रहे पर अबके नेता कुल के त लोग खायिची भर भर के गरियावता. गुंडा बदमाश नेता बन गईल बाद सन।

ऐसन समाज में बच्चन के पालल का उचित होई, हमार त जिदगी बीत गईल पर का ओकनी के भविष्य बनावल हमार जिमेवारी नईखे? बिलकुल बा, उ अपन जिंदगी भरपूर जियले और अपना माटी पर जियले, पर उ अपना दू चार साल खातिर बच्चन के भविष्य न बिगड़ीहे, उनकर लड़का उनका के अकेले भी न रहे दिहे. त एकर हल का बा. इहे की उहो दिल्ली चल जास और पूरा परिवार साथै रहे।
बलराम तय क लेहले और आपन विचार फ़ोन क के अपना बेटा के बता देहले।

रमेश आज उनके लिया जाए आईल रहले. बेटी लोग भी ससुरा वापस चल गईल रहे।
इहे कुल सोचत एक घंटा बीत गईल और ट्रेन आ गईल. दुनु जाना ठीक से चढ़ गईल लोग।
“चली बाबा, अब त रौवा परदेशिया हो गईनी” सुरेश कहले।

“सही कहतार बाबू. सब लोग जवानी में परदेशिया होला और हम बुढ़ापा में भईनी ह.” बलराम मुस्कुरा के कहले. उनका आवाज में अपना माटी के छोडला के कसक साफ़ साफ़ महसूस कईल जा सकत रहे।

– धनंजय तिवारी (आखर के फेसबुक पेज से)

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