सीवान के बुढ़िया माई

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हिमांशु भूषण पाण्डेय
हिमांशु भूषण पाण्डेय

सीवान के बुढ़िया माई – सबकर मनोकामना पूरन करे वाली माई

सीवान के ऐतिहासिक गांधी मैदान के उत्तर-पुरुब की ओर जाये वाला रास्ता में स्थापित बुढ़िया माई के महत्ता बहुत पुरान बा. कबो जंगली माई के नाम से प्रसिद्ध बुढ़िया माई दुर्गा माई के वृद्ध रूप के रूप में पूरा बिहार में मसहूर बानी। कहल जाला की बहुत पहिले जब सीवान-छपरा रोड के उत्तर एक-आध गो खपरैल माकन छोड़ के सब जंगल रहे – एक आध माकन के छोड़ के सब ओर जंगल झाड़ी रहे जहाँ लोग दिनों में जाये से डेराव – ओहि जंगल झाड़ी के बीच से हो के ईगो पगडण्डी जंगली माई के छोट मंदिर तक जात रहे. हर सोमार आ शुक के कसेरा टोली सीवान से मेहरारू लोग गीत गावत जंगली माई के मंदिर तक जॉव आ पूजा कर के वापस आवे लोग.

जब सीवान सादर अस्पताल बनल त ओकरा संगे ‘चिराई घर’ (पोस्टमार्टम हाउस) भि बनल तब ओकरा अगल बगल दलित आ महादलित समाज के लोग जंगल झाड़ी के काट के आपन घर बनावे लागल लोग. जब केहु के मरला पर लोग दुखी मन से चिराई घर तक आवे लोग तब ओ लोग के जंगली माई के मंदिर जवान बगल में ही रहे में जा के अपना दुःख के शांति के प्राथना करे लोग– आ तब जंगली माई के ईगो नया नाम मिलल – चिरई घर वाली माई।

ई करीब ८०-९० साल पाहिले के बात ह.
धीरे धीरे लोग के सरधा ए मई में बढे लागल आ तब माई के अस्थान पर माटी के ईगो कमरा भी लोग बना दिहल. आ लोग बराबर पूजा पथ करे लागल। लोग पूजा पथ त बराबर करे बाकिर ओजुगा पानी के बड़ा दिक्कत रहे. तब माई के महिमा भइल आ तब सन १९१९ में रामहित राम कसेरा ओजुगा ईगो कुँवा खोदवा दिहनि – जवन की आजो मौजूद बा. सन १९२६-२७ में मंदिर के पक्का निर्माण सीताराम साह जी द्वारा करावल गइल आ उन्हें के सहयोग से रामजी प्रसाद मूर्तिकार द्वारा माई के पिंड के जगह पर ईगो माटी की मूर्ति के निर्माण भइल जवना के आजो पूजा होला।

धीरे धीरे सीवान जवान की ओ घरी एगो छोट मोट बाजार खानी रहे उ शहर के रूप में विकसित होखे लागल आ धीरे धीरे सब जंगल झाड़ी के काट के लोग घर बना के रहे लागल आ धीरे धीरे हर सावन आ दसहरा में माई के दरबार में लोग के भीड़ होखे लागल। तबले माई के मंदिर के दीवाल त इंट के हो गइल रहे बाकिर छत खपड़ा के रहे. तब मंदिर के बगल के निवासी जय गोविन्द सिंह मोख्तार लोग के संगे मिल के मंदिर के छत के पक्का बनवा दिहले.

बुढ़िया माई के मंदिर खातिर मोहन प्रसाद मास्टर साहेब के योगदान अतुलनीय बा, इन्हा के लोग गुरूजी के नाम जाने ला – १९६८ से मोहन प्रसाद जी रोज बिना बुढ़िया माई के दर्शन के कही न जाइ आ उन्हे के हर सनीचर के दिन भर उपवास रह के माई के विशेष पूजा कर के नया कपडा चढ़ा के नारियल चढ़ा के पूजा करे के सुरु कइनी।

धीरे धीरे समय बितत गइल – लोग बढ़त गइल बाकिर बरखा बुनी के समय लोग के पूजा करे में दिक्कत होखे काहे से की मंदिर निचे रहे आ बरखा के पानी मंदिर में घुस जाव। तब १९९२ में गुरु जी आ सीवान शहर के दोसर लोग सब मिल के मंदिर के ऊँचा उठा के नया सीरा से बनवावे के सोचल लोग आ जून १९९२ में मंदिर के निर्माण सुरु भइल आ २५ अगस्त १९९२ में बन के तैयार भइल आ तब ईगो बहुत बढान पूजा के आयोजन भइल जवना में आचार्य बननी श्री लाल बाबा आ पंडित त्रिलोकी नाथ पाण्डेय। एही यज्ञ में पहिला हाली ”बुढ़िया माई ” के नाम से निमंत्रण पत्र बंटाइल आ पूजा पाठ भइला के बाद आरती भइल आ हजारों लोग एक साथ बुढ़िया माई के जयकारा लगावे लगले आ तबसे कबो के जंगली माई अब बुढ़िया माई के नाम से प्रसिद्ध हो गइली।

वइसे त माई के पूजा कहियो हो सकेला बाकिर जब बात बुढ़िया माई के पूजा के होखे टी शनिचर के साम के ५ बजे के बाद भक्त लोग अपना हाँथ में नारियल लेहले अपना अपना घर से बुढ़िया माई के मंदिर में चल देला। । सबसे पाहिले गुरु जी माई के चरण में नारियल अर्पित करेनी आ ओकरा बाद भक्त लोग. इंहा पूजा करे वाला भक्त लोग माने ले के बुढ़िया माई के मंदिर में आ के पूजा कर के जवन भी माँगल जाला ओ के माई जरूर पूरा करेनि.

त प्रेम से बोलीं – बुढ़िया माई की जय
भोजपुरी में माई के कहानी के लेखक – हिमांशु भूषण पाण्डेय, प्रोफेशनल्स डेन कम्प्यूटर्स न साइबर डेन, उज्जैन मार्किट, सीवान (आखर के फेसबुक पेज से)

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