गुल्ली-डंडा

गुल्ली-डंडा लडको की सबसे प्रसिद्ध, प्रचलित तथा लोकप्रिय खेल है। खेलते है। इस खेल के खिलाडी दो दलो मे बँट जाते है। खेल का प्रारम्भ किस दल की ओर पहिले किया जायेगा इसका निश्चय पैसे को आकाश में उछालकर ‘चित्त और पट’ अर्थात् ‘टासिंग के अनुसार किया जाता हैइस खेल में एक या डेढ हाथ लम्बा लकडी का डण्डा और एक छोटी सी गुल्ली आवश्यक होती है। गुल्ली के दोनो अन्तो को छोलकर कुछ पतला (चासल) बना दिया जाता है जिससे गुल्ली आसानी से ऊपर उछल सके। फिर जमीन मे चार अगुल गहरा गड्ढा बना दिया जाता है जिसे ‘गुडुपी’ कहा जाता है। कुछ लोग इसे ‘कुपी’ भी कहते है।

प्रथम दल का एक खिलाड़ी खेल को आरम्म करता है। यह अपने देता है। फिर उसे डण्डे से गुल्ली को दूर फेकता है। दूसरे दल के खिलाड़ी उस गुल्ली को ‘लोकने का प्रयास करते है अर्थात् गुल्ली के जमीन पर गिरने के पहले अपने हाथो से पकड़ लेते है। यदि ऐसा करने में वे समथ हो गये तो खेलने वाले लडके का दाँव चला जाता है अर्थात् वह ‘आउट’ हो जाता है। यदि गुल्ली जमीन पर गिर गयी तो दूसरे दल वाले उसे उठाकर इस हिसाब से फेकते है कि गुल्ली गडपी मे गिर जाय। ऐसा होने पर भी खिलाड़ी ‘आउट’ माना जाता है। गुडुपी की ओर फेकी गयी गुल्ली को खिलाडी डण्डे से मारता है जिसे दूसरे दल वाले पुन ‘लोकने’ का प्रयास करते हे। गुल्ली जितनी दूर जाकर हे उस दूरी को खिलाडी अपने डण्डे की लम्बाई से नापता है। सात डण्ग नापने पर उसकी एव पाइन्ट बनता है जिसे कहा जाता है। फिर वह उस गुल्ली को दूसरे बार भी मारता है और जब तक आउट’ नही हो जाता तब तक खेलना है। जब खिलाड़ी का डण्डा गुल्ली को मारते समय जमीन से स्पर्श कर जाता है तब भी उसे ‘आउट’ ही जाना पड़ता हैकरने पर दूसरे दल वाले चिल्लाने लगते है कि

खुरकुच्ची मरले पियले सही।

अर्थात् चूकि तुम्हारा डण्डा जमीन छू गया अत तुम ‘आउट’ हो गये । गुल्ली को दम अन्दाज मे फेका जाता है जिससे वह गुडुपी मे गिर जाय। इस प्रक्रिया को ‘पियाना’ कहते है। इम प्रकार एक के आउट हो जाने के बाद दूसरा खिलाडी खेल खेलता है। जब दल के सभी खिलाड़ी खेल चुकते है तब वे अपने दल के प्रत्येक विवाडी के द्वारा बनाये गये को जोड लेने है। यदि दूसरे दल के खिलाडियो की समष्टि के द्वारा बनाये कम हुए तो प्रथम दल की जीत और अधिक हुए तो द्वितीय दल की विजय मानी जाती है।

गुल्ली को डण्डे से मारने के सात प्रकार है-जिनके नाम निम्नाकित है।

    1. एडी
    2. दोडी
    3. तिलिया
    4. चौरी
    5. चम्पा
    6. सेख
    7. सुनेख

बाये हाथ की तजनी और कनिष्ठिका अँगुलियो के ऊपर गुल्ली को रख कर इसे मारने की प्रक्रिया ‘दोडी’ कहलाती है। गुल्ली को ‘तिलतिला कर मारना ‘तिलिया’ के नाम से प्रसिद्ध है। बायें हाथ की मुट्ठी पर गुल्ली को रख कर मारना ‘चौरी’ और बाये हाथ मे रखकर मारना चम्पा कहलाता है। दाहिने हाथ के ऊपरी भाग में गल्ली को अबकर उसे ऊपर उछालकर मारना सेख और जमीन पर उसे रखकर डण्डे से दूर फेकना ‘सुतेख’ की संज्ञा प्राप्त करता है। इस प्रकार सात प्रकार से गुल्ली को डण्डे से मार कर यह खेल खेला जाता है। कुछ लोग ‘एडी, दोडी, जैसे निरर्थक शब्दों के भीतर में अर्थ खोजने का व्यर्थ का प्रयास करते है।

गुल्ली-डंडा
गुल्ली-डंडा

जिस दल की जीत होती है उस दल के खिलाडी दूसरे पराजित दल वालो को अब ‘पदाना’ प्रारम्भ करते हैंप्रत्येक खिलाडी गुल्ली को मारता है। गुल्ली जहाँ गिरती है वहाँ से दूसरा खिलाडी फिर उसे डण्डे मे मारता है। प्रत्येक खिलाडी बारी बारी से ऐसा ही करता है। इस प्रकार खिलाड़ी अपने मूल स्थान से गुडुपी-से दो अथवा तीन फलाँग दूर तक निकल जाते हैं। इसके पश्चात् विजेता पराजित दल वालो को ‘पदाना’ प्रारम्भ करते हैं। दूसरे दल को मिलाडी ‘बी’ ‘बडी’ कहता हुआ जहाँ से खेल प्रारम्भ हुआ था उस दिशा मे दौड़ता है। जहाँ उसकी साँस टूट जाती है वहाँसे दूमरा बेलाडी दौडना शुरू करता है। इसके बाद तीसरा और चौथा खिलाडी दौड़ लगाते हैं। जब ये खिलाडी ‘बड्डी’ ‘बडी’ कहते हुए क्रम से गुडुपी तक पहुँच जाते है तब खेल समाप्त समझा जाता है। परन्तु पराजित खिलाडी यदि अपने निर्दिष्ट स्थान तक नहीं पहुँच सके तब विजयी दल के खिलाडी डण्डे से गुल्ली को मारते हुए फिर उन्हें ‘पदाना शुरू करते हैं। इस प्रकार यह खेल घटो तक चलत रहता है।

गुल्ली-डंडा के खेल मे हाथ, पैर तथा शरीर के अन्य अगों की भी व्यायाम होता है अत यह मनोरंजक होने के साथ ही परिश्रमजन्य खेल है। इसमे प्रयुक्त होने वाली सामग्री सर्वत्र सुर्लभ होने के कारण भनी तथा निर्धन सभी वर्ग के बालक इसे समान रूप से खेल सकते है।

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