आदित्य राजन जी के लिखल भोजपुरी कहानी करमनासा के जीत

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जिनगी में बिना आस के अन्हरिया रात के मेयाद तनी लमहर होखेला, ओकरा बाद जब बादर फरछीन होखल सुरु होला, त अंजोर होत देरी ना लागेला बाकिरअंजोर कबो कबो ओह बीतल हहरत अन्हरिया रतियो से भूतहूँस लागेला…… ओहिदीन के बिहान कुछु एहि तरे भइल रहे, बुद्धन अपना मेहरारू आ छौ गो गेदा गेदी लइकन के साथे, मोटरा मोटरी कुछु कपार पर धइले, कुछु अपना पड़िया पर लदले, गांव से निकलत रहलें……..।

गांव…..ना…अब उ गांव कहां रह गइल रहे…जइसे सावन के राति में करिया बादर पुर्नवासी के चान के छन भर में ढाँप देला, ओहि तरे, गंडक के पानी बुद्धन के संहुसे गांव के कब तोप दिहलस, पते ना चलल ….बचि गइल रहे त खालकाली माई के उ बड़हन अथान जवन गांव के बहरी तनीं उचास पर रहे। रात के जब उत्तर कावर के बन्हा टूटल त गांव में हल्ला भइल…लोग ओहि राति खा, जवने पावल तवन लेके अथान की ओर भागे लागल, बुद्धन के घर से नदी सव डेग रहल… उनका दुआर पर जोड़ा बैल आ एगो पाड़ी बन्हाइल रहले सन, सोचले रहले जे उ जब बड़हन हो जाई त जवने दू पैसा के अमदनी बढ़ी, घर में खवईया हेतना हो गइल बाड़े आ कमवईया के ठेकाने नइखे।

आदित्य राजन जी
आदित्य राजन जी

दूर से पानी के हड़हड़, गरजल सुनात रहे…बुद्धन बो डरन पगलाइले तरे घर से दुआरा ले धावत रहली, का गठियाईं, का छोड़ीं, सब त जरुरिये बा…केतना जतन से जोगा जोगा के ई बर्तन भड़िया, कपड़ा लाता, दउरा बक्सा एकठीयवले बानीं, कुछु छोड़े लायक बा…? बाकिर के ले जाई, लइका छोटे बाड़न स, केतना ढोइहे सन?? बुद्धन बेर बेर उनका के हाबत रहले की खाली गरज भर के समान ले के चलेके बा….जल्दी करs…पानी हेदे ले आ गइल बा, घर मे ढुकत देरी ना लागी।

कवनियो तरे कुछु समान लेके लइकन के लिहले उ लोग काली अथान पर पँहुचल, ओहिजु मार गांव भर के लोग झोंझ लगवले रहे…मेहरारू रोवत फ़ेंकरत रहली सन, मर्दाना लइका, तरे तरे के बाति बतियावत रहले सन…..बुद्धन एगो कोना अपना खातिर छेंकवले आ बोरा बिछा के लइकन के सुता दिहले…बुद्धन बो ओहिजु लोर चुवावत किकुर के बईठ गइली…।

बुद्धन ओ लोग के बेवस्थित क के अब अपना चउवन के लियावे खातिर अपना घर कावर जाए लगले, रबिन्दर आ परसनो आपन आपन गाई गोरु आ कुछ बचल समान लियावे खातिर साथे हो लिहल लोग।

रास्ता में भरथ के लइका, चिलात आवत रहे….”आ गइल..दहि गइल…गांव दहि गइल…अबकी सगरी गांव लील लीहें गण्डक माई… बुद्धन काका..अब काहाँ जा तारs..सब खतम हो गइल…. ‘

बुद्धन बुझाइल जे कुछु सुनलहीं ना होखस..आपन चाल तेज कइले…गांव में पानी ढुक गइल रहे, अभिन कुछु लोग आपन समान ढोवत रहे, नदी के सबसे लगे बुद्धने के घर रहे, उ डेरात डेरात अपना घर कावर डेग बढ़ावे लगले….नदी आ जमीन अब एक हो गइल रहे, ठेहुना से ऊपर पानी चढ़ी गइल रहे…..बुद्धन जब अपना ठीहा ले चहुँपले त नजारा देखि के उनकर परान सुखि गइल! बंगला आ आगे के छान के कवनो निसानी ना रही गइल रहे….दुनु बैल बंगला में बन्हाइल रहले सन…पड़िया उ घर छोड़ के थोरहे दूर एगो तरकुल में बान्ह दिहले रहलें। जब अपना जर जमीन के ई दसा उ देखले त, उनुकर सबुर टूट गइल….आधा घर के साथे साथ कटान में बैलवो दहि गइले सन….।

एगो मर्द कबो अपना पलुआर अपना लइकन के सामने आपन आँसु ना देखावल चाहेला, चाहे केतनो बड़हनगहिर काट ओकरा करेजा पर लागल होखे, बाकिर अकेल में ओकर काठ के करेजा पघिल जाला,जइसे आजु ई पानी ओह जमीन के पघिला दिहलस जवन का जनि कहिया से केतने लोग के भार ढोवत आइल रहे, केतने नेंव ओकरा भीतर बरियारी से खड़ा रहले सन।

ई कुल्हि बिनास देखि के बुद्धन भोकार पार के रोवे लगलें, ओह रात में पानी के गड़गड़ाहट बुद्धन के रोवाई के सामना अब्बर परि गइल रहे…उनका कुछु बुझात ना रहे कि अब केने जासु….तले पीछे से रबिन्दर उनुका के हाँक लगवले…..”काका, अब चल आवs, पानी के कटान तेज हो गइल बा, एहिजु रुकल अब ठीक नइखे।”
बुद्धन बिना कवनो चेतना के ओहिजु से आपन पाड़ी खोल के निकल गइलें, पीछे घूम के देखले के उनुकर चित ना कइलस….।

अथान पर अइलें, उनुकर मेहरारू उनकर चुप्पी आ साथे खाली पड़िया के देख के बुझ गइली..आ उनुके ध के रोवे लगली… छोटकी लईकी ई कुल्हि देख के फ़ेंकरे लागल… बड़का आंखि मींसत अपना माई बाप के रोवत पहिली बेर देखत रहे।

उ राति बड़ी बड़हन हो गइल रहे, बिद्धन सब कुछु सोचत रहलें.. कइसे उनुकर बाप पटीदारन के बेईमानी से आजिज आ के बीच गांव के जमीन छोड़ के ओहिजु, नदी के अलंगे आपन घर छवले रहलें, नदी के किनारहिं आपन थोर बहुत खेत रहे, जेकरा के खूब जोगवले रहले बुद्धन..।

एगो गंवई आदमी के सबसे ढेर केहु से प्रेम होला त ओकर आपन जमीन आ जनमभूमि से, उ अपना जमीन के अपना संतान से बेसी आ अपना जनमभूमि के अपना महतारी तरे जानेला। ओकरा खातिर इहे दू चीझु ओकर अस्तित्व ह आ इहे दू चीझु ओकर सोरि..!

कइसो कइसो राति के करिया चादर कपार से हटल, बिहान के उजरौटा आंखि में गड़त रहे, जहां ले देखs तहाँ ले मटियाईल पानी के खेती पसरल लउकत रहे, लोग के गाय गोरु, बकरी आ लइका बांय बांय चिलात रहलन स… चिरई चुरूंग के बोली न जाने कहाँ गायब रहल…।

सब लोग फजीर होते, आपन पलुआर आ मोटरी गठरी लेके, नाया जगहि, नाया गांव बसावे चल दिहले रहे…ओहिजु से चार पांच कोस पर एगो परती में बसेके बात होत रहे….।

बुद्धन बो लइकन के उठावे लगली, आपन मोटरी सरियावल सुरु कइली…बुद्धन तनी दूर पर सबका से फरके पड़िया के एगो नीब के गाछ से बान्ह के ओहिजु ओह अथाह पानी के ओर मुंह कइले बइठल रहलें, जेने उनुकर बाप के छावल छान आ बंगला दहि गइल रहे, उनुकर साथे हरमेसा चले वाला उ दू गो बैल दहि गइले सन, उनुकर मेहरारू के जोगावल घर के सगरी समान दहि गइल…साथे साथे, उनकर कई गो सपना, कई गो उमेद गण्डक के पानी घोंट घरले रहे। उनकर एतना दिन के करम के नास क दिहलस ई पानी…गण्डक आजु करमनासा के रूप ध के आइल रहे।

बुद्धन बो उनके हाँक लगा के बोलवली…उनका सुनाइल ना…उ बड़का लइका के उनके बोलावेके भेजली….लइका जाके उनका के चले के कहलस। बुद्धन एकदम भावशून्य होके पड़िया पर कुछ समान लाद के आ कुछ अपना साथे लेके सबके साथे आपन माई आ सन्तान अइसन धरती छोड़के जाए लगले, एक बेर अउरी घूम के ओह ओरी देखले, उनका आंखि से दू ठोप लोर चू के नीचे गिर गइल… ओह लोर के बाढ़ में बुद्धन के सगरो संवेदना, सगरो उछाह, सगरो जांगर दहि के बहत जात रहे।

बुद्धन के एक बेर फेर भोकार छूटल…आंखि से हरहर लोर गिरे लागल, उ चिला के रोवल चहले, पूरा जांगर लगा के कोसिस कइलें…. बाकिर उनकर बोली ना निकलल……फेर कब्बो उनकर बोली ना निकलल!!
गण्डक के रूप ध के आइल करमनासा आजु जीत गइल रहे।

रउवा खातिर:
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