अपने देसवा नीक बा : संतोष पटेल जी

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सन्तोष पटेल जी

ए भाई ! ए भाई !
शमीम भाई के घर कवन ह? – डाकपिउन चिकटोली चौक खड़ा हारून से पुछले।
केकर घर के पता पूछत बाड़ हो डाक बाबू ? – हारून पूछलें।
शमीम भाई के घर के – डाकपिउन कहले।
कवनो चिठ्ठी पाती आईल बा का ? -हारून पूछलें।
हाँ, साईट सउदिया से आयिल बा – डाकपिउन कहलें।
हारुन हाथ से इशारा करत बतवलें – हउवे नू घर ह शमीम के, टूटलका जफडी के गेट वाला।

शमीम के दुआरी पर डाकपिउन उनकर नाम के हांक लगावे लगलन। शमीम झप से घर से बहरी आ के चिठ्ठी लेत डाकपिउन से पुछले। कहवाँ से आइल बा चिठ्ठी डाक बाबू। शमीम के हांफी दूफी धई लिहलस कि कइसे जानी कि केकर ह?

रेयाज नाव लिखल बा आ सऊदी लिखल बा।

हं, हं, डाक बाबू, हमार जेठ बेटा के नाव ह। बबुआ चिठ्ठी लिखले बा। दू महीना पहिले रेयाज सउदिया गइल रहले। दू साल लागल रहे उनका पासपोर्ट बनवावे आ वीसा लेवे में। दिल्ली आ बंबई के दलालन के चक्कर लगावत लगावत गोड खिया गइल रहे। एतने ना दस परसेंट पर साठ हज़ार कर्ज काढ़ के रेयाज के सऊदी के फ्लाइट भइल रहे।

सन्तोष पटेल जी

चिठ्ठी हाथ में लिहले शमीम सोचते रहलें कि एतने में शमीम के जानना नसीम आपन मड़ई से बहरली। सभ कुछ देखला के बादो उनका कुछु समझ में ना आवत रहे। दरअसल दुनु पारानी पढल लिखल ना रहे लो। चिट्ठी देख के दुनु जाना रेयाज के हाल चाल जाने ला बेहाल हो गइलें। चिट्ठी बचावावे खातिर दुनु जाने बेयाकुल हो गइल लो । हार पाछ के दुने बेकत आपन मोहल्ला के नुरैन वकील भीरी गइल लोग चिट्ठी बचावावे ला।

शमीम कहले – सलामलेकुम वकील साहेब। तनी हई हमार बेटा के चिठ्ठी बांच दी ना।
वकील साहेब चिट्ठी पड़े लागले। चिठ्ठी के मजमून बा –
अब्बा आ अम्मी, सलाम, हम त बड़ा दिकदारी से इहाँ बानी। उमेद बा तू लो खैरियत से होखब लो। हमरा मालूम बा कि बड़ा तपीसवा से हमरा के भेजले बाड़ लो। इ हमरे जिद रहे। कइसे कइसे पैसा के इंतजाम भईल। बहिन सन के विआह आगे टार के हमरा के इहा भेजे ला सब दुःख उठवले बाड़ लो।

अब्बा, हमरा संगे गलत भइल बा। उहाँ एजेंट कहलस निमन काम करे के मिली बाकिर एहिजा मुकर गइल आ हमारा से दोसर काम लिहल जाता। हमरा एजेंट कहले रहे कि प्लांट के काम करे के बा। इहाँ तेल पाईप लाइन पर काम करे के पडत बा। इहाँ हम लोहा के पाइप कान्हा पर ढोवत बानी। एक सबेरे से रात ले पाईप कान्हा पर ध के तीन तीन मंझिला पर चढ़े उतरे के पडत बा।

इहाँ जवन काम बा उ हमरे करे के बा। ना काम करब त दूर दूर तक कुछ नइखे खाली बालू बालू बा। केहु तरेह दिन काटत बानी। रहे के इंजताम इहे बा कि गाय गोरु, भेड़ बकरी खानी रहे के पडत बा। अब दू महीना हो गइल बा। खाना पीनो घर लेखा नइखे। अब्बा अम्मा के मत बतइह कि हमार एक दिन गोड बिछला गइला पर कमर के चोट आ गइल बा। अभी कमजोरी बुझाता आ उठे बैठे में दिक्कत बा। हमार मन एक तिल भर नइखे लागत। अब्बा हो !हमरा माफ़ कर दिह।

हमरा से लमहर गलती हो गइल बा। हमरा माफ़ कर द लोग। हमरा के केहू तरह बोला ल लो। हम जानत बानी हमरा चलते तू लो ढ़े खा करजा में डूब जइब$ बाकिर हम वादा करत बानी घरे आ के खूब मेहनत कर के करजा उतार देम। तोहरा लोग के काम के हाथ बताएब। कान्हा आ हाथ में के ठेला पड़ गइल बा, कमर के दर्द आ कमजोरी अब नइखे सहात। अब्बा हो, अब बुझा गइल, कुल्ह मिला के अपने देसवा निमन बा।
एने वकील साहेब चिठ्ठी बाँचत रहले आ ओने शमीम के गमछा आ नसीम के आँचर लोर से ओद भइल जात रहे।

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