अमरेन्द्र जी के लिखल व्यंग ए दरसन तोर दरसन दुर्लभ

परनाम ! राउर स्वागत बा जोगीरा डॉट कॉम प, आई पढ़ल जाव अमरेन्द्र जी के लिखल एगो व्यंग ए दरसन तोर दरसन दुर्लभ , पढ़ीं आ आपन राय बताइ कि रउवा इ भोजपुरी व्यंग ए दरसन तोर दरसन दुर्लभ कइसन लागल, रउवा सब से निहोरा बा पढ़ला के बाद शेयर जरूर करीं।

अइसे त सभे आपन-आपन बाति-बिचार कहे सुनावे खातिर फ्री बड़ले नु बा।बाकि जबाना के नुसार बुझात बा कि बिचार,ख्याल भा,दरसन के कमी होत चलल जात बा।एगो जमाना रहे कि जे भी जहवाँ भेंटा, आपन किछु न किछु बिचार भा दरसन भा आइडिया देत रहलनि।आ लोगवो मानत रहलनि।

जइसे मान लीं कि केहू किहाँ गमी भइल होखे त ओह घरी लो कहे लागत रहे कि ई दुनिया का बा? नस्वर बा।दु दिन के मेला बा।सभ माया बा।चाहें मान लीं,रउआ किहाँ किछु बनल बा आ ओहि घरी कोई बिनु नेवता के टपक गईल।त एहिजो एगो दरसन रहे। दाना दाना प लिखल बा खायेवाला के नाम

अमरेन्द्र जी
अमरेन्द्र जी

आने कि जइसन माहौल ओइसन के दरसन।अब देखिना।अलगू के नोकरी छूटि गईल,उनुकर पलिवार उदास बा।त बसरोपन कहत बाड़न, आरे भाई!जे ई मुँहवा चीरले बा नु पेटवो के उपाई करी। आ मुरदाघटिया में चीता बोझि के लास चरावत खानी त बुझाला कि सब गीता के मर्मज्ञ हो गईल बा।आ जसहिं लास जरलि दरसन बदलि गईल।आजु तऽ चिंतक आ दार्सनिक के लोग बउराह भा बेमतलब के बतकही करेवाला इदिमी में गीनत बाड़न।अउरअउर लोग एगो हावा उठा देत बा आरे! के?फलना?बे मतलब के थेसिस झारत रहेलन,खाली फिलाॅस्फी देत रहेलन।

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हँ।त हमरा कहे के मतलब ई रहे कि आजु गाँव सहर समाज में ख्याल,बिचार भा दरसन के देनिहारन के संखेआ घट गईल बा।मानीं कि एकाध इदिमी जीवन-मरन,आचरन-कुआचरन पऽ भा अइसन सभ मैटर प बतिआतो बा,त उनुकर सुनवइया एकदमे से नइखन,चाहें अइसन लो के इदिमी पागल करार दे देत बाड़न।आ कारन भी बा एकर।अब देखीं,एने एक दूइ दसक में बीमा कंपनियन के बहुते एजेंट लोग मृत्यु,अकाल मृत्यु,छनभंगुर जीनिगी,आवेवाला काल्हु अइसन दरसन के अपना धंधा पानी में जमि के इऊज कइलन जा।ई बीमा के एजेंट लोग जीवन-दरसन के मार्केटिंग कइलन।

पेसेवर तरिका से बतिआ-फुसिला के नस्वरता, मृत्यु, दुर्घटना, घाटा अइसन सबदन के जाल में फँसा लिहलन। ठठे ना ह।पहिले जस सतबादी जबाना त बा ना।पहिले सती प्रथा होत रहे।मरद मरलन माने मेहरारुओ साथे जरिहन।देस में समाज सुधारक भइलन, अंगरेज अइलन तब जा के ई कुरीति बंद भईल।सायेद ओकरे बाद जन्म भईल बीमा कंपनियन के।काहें कि अब पति के ई कहि के डेरवावल जा सकत रहे कि तु मरि जईब त तहरा बिधवा मेहरारू के का होई? मृत्यु-बोध के साथे नस्वरता के दरसन बीमा-बोध आ निर्भरता के आचरन में बदलि गईल। समाजिक सुरक्षा बोध,सामुहिक-परिवारिक सुरक्षा बोध के बिचार गते-गते व्यक्तिगत सुरक्षा बोध के दायित्व में बदलि गईल।तऽ,एहिजो एगो दरसन रहे सभ अकेले आइल बा।

आछा,चलीं।तऽ हटाईं ई सभ आज-जाल।अब असली बात प आवल जाव।सच्चाई त इहे बा कि आज भी दरसन के सौखीन लोग बा।आजुओ अइसन लोग बाड़न जवन कि दरसन सास्त्र से एमे पीएचडी करेलन। आ इहे लोग फिरू दरसन सास्त्र के परफेसर बनि जालन।समझिं त बस गुरू-चेला के बीच दरसन के लेन देन लगातार जारी बा।अपना अगल-बगल में तनि रउओ ताक-झाँक कर सकत बानी।एकाधे लोग होइहन जे दरसन सास्त्र पढ़ले होइहन चाहे पढ़त होइहन।चाहे अपना बाल बुतुरू के पढ़े के सलाह देत होइहन।

आ हँ,एगो बात आउर।बहुत लोग त इहो कह रहल बा कि पछिमी सोच भा दरसन कवनो नाया ना ह।पहलहुँ के लोग एकरा के जानत रहलन।त इहो बुझिं आ ई हावा पछिमे से उठल बिया।सबके ई मालूम बा कि पुरूब में सुरूज उगेलन।पह फाटेले।अंजोर होला। पुरबइया बहेले।आ ई पुरबिया एगो हवा ना ह दिव्य दरसन ह। आजुओ दुनिया लेबेल प जब-जब जरूरत परे ला,तऽ हमनिए के दरसनवा के भाव टाएट से काम चलेला।आ आखिर काहे न रहो। अब एहिजो त एगो दरसन बा पुराने चाऊरि नु पंथ परेला।

एगो बाति अउरि।ई बताईं रउआ नोकरी करिना,बिजनेस करिना,एलेक्सन लड़िना।रउआ कार किने के बा,होटल बुक करे के बा।माने कि रउआ पले कवन काम बा।आ काहें?काकेकरा नइखे? तऽ एकरो दरसन बा।ढ़ेर दिमाग मत दउराईं लचर-पचर में। जइसे होखत बा होखे दीं। होनी हो के रही। आ ई कवनो नाया दरसन ना हउवे ई कहिए से चलत आ रहल बा।एह से जादा सोंचे के नइखे।लिखते-लिखते एगो बात इआद परलि कि अधिका सोचला में आ थीसिस देला में आ सुनला में किछु बा ना।तऽ, इहवों एगो दरसन बा। होइहें सोइ जो राम रचि राखा।

दरसन,दरसन, दरसन।
किछु ना भईल दरसन।
त एहिजो बा दरसन।
आपन काम करिसन।
तबे हो सकी दरसन।

ई बस दिल बहलावे के-
ख्याल भर बा-
कि हम दार्सनिक हईं।
जदि बात गलत होखे-
त ए बाति के-
अपनहीं सँवाच लीं।।

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