भिखारी ठाकुर के परिवार तऽ आजो भिखारी बा : राणा परमार

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हिंदी- भोजपुरी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, नाटककार, गीतकार के ‘हरसिंगार’ से लिहल ई श्रद्धा के कविताई फूल साँचो लोक कवि भोजपुरी के शेक्सपियर राय बहादुर भिखारी ठाकुर 49 वां सुरधाम गमन के बादो उहे हालत बा। छपरा सदर ब्लाॅक के कोटवां रामपुर पंचायत भोजपुर जिला के सिवाना दयालचक से सटले कुतुबपुर गांव में रायबहादुर के गिलावा सिमेंट से टिपकारी वाला आधे आध ईंटा माटी के दलान मकान, खपरइल चुअत छत्त दम घिंचत मलिक जी विरासत के जोगवले बा।

18 दिसम्बर आऽ 10 जुलाई जयंती आ पुण्यतिथि पर जलसा होला, जरूर बाकी राय बहादुर के नांव के फायदा केहु राय जी, सिंह, पांडे जी के होला, भिखारी ठाकुर के परिवार तऽ आजो भिखारी बा । अंतर इहे बा कि अब नाच के गिरोह आ नर्तक सजिंदा ना हउअन । हँ ठाकुर जी पोता राजेन्द्र ठाकुर के आपन दादा पर नाज जरूर बा-

केहु कहत बा रायबहादुर, केहु कहत शेक्सपिअर।
केहु कहत बा कवि भिखारी घर कुतुबपुर दिअर।

भक्तिकालीन कविअन के भाव भूमि पर कैथी लिपि में कलम चलावे वाला भिखारी ठाकुर लोक भाषा भोजपुरी में नौटंकी विधा आ बिआ के खेती भोजपुरिया जमीन पर कइलन ।नाचमंडली के गरोहियादार, नर्तक विदूषक, बैतालिक कुल्ही रहलन । आ साफ साफ कहलन-

कहत भिखारी हम हईं ना नचनिया ।
नचवे में रहिके बाकी कहिले कहानियां ।

भिखारी ठाकुर
भिखारी ठाकुर

पुस महीना के अंजोरिया पंचमी, घनिष्ठा निछतर के दूसरिका चरण सोमवार अंगरेजी तारीख 18 दिसम्बर 1887 ईस्वी में दलसिंगार ठाकुर के पुतर रूप में संसार में आँखि खोलनन। माई शिवकली देवी के अंचरा जुराइल। गंगा- सोन के कटाव से आरा जिला छोड़ छपरा जिला के सिवाना पर ई नाई ( हजाम) परिवार आपन खानदानी पेशा में रम आ गम गइल। ठाकुर जी चउदी लिखले बारन

उत्तर खलपुरा महराजगंज दरियागंज,डोरीगंज चिरानगढ़ मोरधज के जनावेला।
गंगा- सरजुग पार के अरार पर गुलटेनगंज, मउजे मखदूमगंज डेढ दू कोस पावेला।
सेरपुर ,घेघटा,रउजा,धारूटोला तेलपा तक, दिअरा के बसिंदा टोला नयका कहावेला ।
कहत’ भिखारी ‘ खाख सहर छपरा हऽ, सटले नेवाजी टोला पद होई जावेला।

भिखारी ठाकुर के पढ़ाई में इचिको मन ना लागत रहल

लड़िकाईं में भिखारी ठाकुर के पढ़ाई में इचिको मन ना लागत रहल । गाय चरावे, हजामत सिखल इहे उनकर काम रहे ।आपन गांव के भगवान साह से रामऽ गति देहु सुमति आ एक से दस ले पहाड़ा सीखलन ।

रोजी रोटी कमाए बदे कोलकाता, जगरनाथ जी गइलन ।सतसंग उनका भीतरा के कवि, रंगकर्मी आ नकल के छिपल प्रतिभा के जगा दिहल। गाँवे लवटला के बाद रामलीला मंडली बवलन आ नाच मंडली के चर्चा भोजपुरिया लोगिन में फाइल गइल । बसंत, (गड़खा) के रामवृक्ष ठाकुर, मटिहान (दरियापुर ) के शिवनाथ सिंह उनका गिरोह में रहस। आपन बादक कलाकारन के परिचय में कहले बावें-

बाबू लाल छाँटस बाल भेदहुँ के जानत हाल,
ओसहीं महेनदर कुछ ध्रुपद के गवैया हवें।
अजब रंगढंग बा घिनावन के ढोलक में,
तरह तरह ताल के तफजूल बजवैया हवें।
सारंगी सरगम अलीजान के लागत नीक,
हर हरमुनिया के जगदेव बजवैया हवें।
रामलछन, जूठन के ‘भिखारी’ बताए देत ,
खास खास हासरस नकल के करवैया हवें।

ठाकुर जी के गीति नाट्य कीर्ति में 29 गो प्रकाशित बा , जवना में 12 गो लोक नाटक बा-

  1. बिदेशिया
  2. भाई विरोध
  3. बेटी बियोग
  4. बिधवा विलाप
  5. कलियुग प्रेम
  6. राधेश्याम बहार
  7. गंगा स्नान
  8. पुत्र बध
  9. गबर घिचोर
  10. बिरहा बहार
  11. नकल भाड़ नेटुआ के
  12. ननद भउजाई

दुसराका कीर्ति (1) शिव विवाह(2) भजन कीर्तन:राम (3)रामलीला (4)भजन कीर्तन :कृष्ण (5)माता भक्ति (6)आरती (7) बूढ़शाला(8) चौवर्ण पदवी(9) नाई बहार(10) शंका समाधान (11) विविध (12) कवि परिचय

ई कहे के जरूरत ना बा कि भिखारी ठाकुर आपन अक्षर गुरु आ कविताई गुरु के याद ना कइलन? आपन परिचय में कहले बारन ‘ गाँवां गाईं जाईं खाईं चिट्ठी नेवतनिया, लिखेके सिखवलन भगवान साह बनिया ।’ आपन काव्य गुरु फकूली (दिघवारा) के रामलीला रामायण के रचयिता बाल ब्रह्मचारी हनुमान भक्त बाबू बसुनायक सिंह के भोग एह गीत में लगवलें –

‘रामनाम शबद में रहऽ लवलीन हरे राम राम ।
आएल कलजुगवा कठीन हरे राम राम ।
कहे बसुनायक बानी बिदेआ के हीन हरे राम ।
ढोलक बजाके तकधीन हरे राम राम ।’

10 जुलाई 1971 को ठाकुर जी बैकुंठ सिधारलें । बाकिर उनककर साहित्यिक सेवा के दाम अबले केहु ना लगवलस ।भोजपुरी मासिक ‘अंजोर’ में महेश्वराचार्य जी’ जनकवि भिखारी ठाकुर ‘ लिखेके भोजपुरी संसार के जगवलन। 1974 में ‘ भिखारी ठाकुर आश्रम, कुतुबपुर (सारण) स्थापित भइलबाकिर भिखारी ठाकुर के रचनन के संपादन फीका रहल । राष्ट्रभाषा परिषद के ओर से डाक्टर वीरेन्द्र नारायण यादव के संपादन में ‘ भिखारी ठाकुर रचनावली ‘ छपल।

राणा परमार अखिलेश
राणा परमार अखिलेश

भिखारी ठाकुर के कीर्ति मरई से महल ले चमक रहल बा। डाक्टर राजेश्वर सिंह राजेश के कहनाब बा” भिखारी ठाकुर के कृति के असल त्रासदी बा इहे बा कि कबीर दास मतिन केहु धरमदास नाहीं मिललऽ। भिखारी ठाकुर ग्रंथावली आ रचनावली के संपादन आ संशोधन करेवाला विद्वानन में ना लय बा, ना सुर सम आ ना कवनो भेट बतकही बा। जबकि हम 1953 में पूर्णाडीह(दरियापुर) आ 1957-58 में बसंत मलिक जी नाच देखले बानी, चरचा कइनी। 1964-65 में डाकतार विभाग में किरानी रहनी ओही घड़ी ‘बिदेशिया ‘ फिलिम बनल रहे ।

मुम्बईया प्रोड्यूसर ठाकुर जी से पांच हजार रुपये तय कइले रहे आ पांच सौ रूपिया में ठग लिहल। ठाकुर जी कैथी में दस्तखत करके बे कैथी के ‘ र’ छोड़ देहलन तऽ हम रोमन के 7 से सही कराके रजिस्टरी खइनी आ रसीद दिहनी ।


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