माया शर्मा जी के लिखल भोजपुरी बाल-कहानी गौरइया

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लाली जब बहरा से खेलिके अइली त बहुते गर्मी भइल रहे।अवते पंखा खोलिके सोफा पर पसरि गइली। गौरइया के झुंड जंगला पर फुदुकत-चहचहात रहे। लाली के अबहिन आँखि झपते रहे कि खड़-खड़ के आवाज भइल

माया शर्मा जी
माया शर्मा जी

लाली झटसे उठली।देखतड़ी कि देवालि से सटले एगो गौरइया बिल्कुल अचेत गिरल परल रहे ।तनिको ना सगबगा।

लाली दउरिके “मम्मी”पुकारत गौरइया के हथेली पर उठा लिहली।उनके शंका भइल कि कहीं चिरइया मरि त ना गइलि ।बाकिर ना , धुकधुक्की चलत रहे। लाली के मम्मी बरतन धोवल छोड़िके झड़काहे अइली।गौरइया के अचेत देखिके ओकरे ऊपर पानी के छिटकी मरली।

गौरइया पानी के छीटा परते आँखि मलकावे लगलसि।

“मम्मी देख अब धीरे-धीरे ताकतिया-“लाली विस्मय से चहकत कहली।

“अब ओके एह गत्ता पर धीरे से ध$द।अब्बे ठीक होजाई।कँहीं कटल-फटल नइखे।कहीं मूड़ी में चोट होई”-मम्मी कहली।

गौरइया के न धरत देर कि ढिमिलात अपनी गोड़े पर खड़ा हो गइलि।धीरे-धीरे रहि-रहिके पंखियो फदफदावे लागलि।

लाली दउरी के कटोरी में पानी लियइली । आ ओकरी आगे ध दिहली।तनिए में गौरइया ठोंढ डुबाके पानी पीए लागल।लेकिन आँखि मलकावल ना छोडें।
रहि-रहिके एगो गोड़े से मथवो सुघरावे।

ई देखि के लाली ओकर माथा सुघरावे लगली। लाली के मम्मी कुछ दूरी पर अपने काम में लागि गइली। लाली उठिके नवरतन तेल लियइली आ गौरइया की माथे पर ध$ दिहली।
गौरइया जइसे लागल उगबुगाए।

लाली के मन में इत्मिनान हो गइल रहे।जइसही उनकर धेयान हटल गौरइया जंगला पड़े फुर्र्दे उड़ि गइलि।

लाली चिल्लइली-“मम्मी!गौरइया उड़ि गइल।”

मम्मी कहली-“जाएद ठीक भइल कि बचि गइलि।”

गौरइया उड़िके अपनी झुंड में चलि त गइलि बाकिर लाली देखली कि झुंड के सगरी गौरइया चहचहात ओके अपने साथे राखे के तइयार ना रहली।सब ओके ठोकरियावें।गौरइया एने ओने भागत फिरे।
एइसन तीन -चार दिन ले देखे के मिलल।लाली बहुत चिंता में परली। आ अपनी मम्मी के देखवली। ईहो बतवली कि ओकरी मूड़ी पर नवरत्तन तेल धइले रहली ह।

मम्मी कहली -“हो सके तेलवे के कारन सब चिरइ भगावत होखें सन”।

लाली के अपने पर बड़ी पछताव भइल-“कहाँ से कहाँ तेल धरुवीं”।
अगिला दिने राति में बड़ी जोर के पानी बरिसल।बिहान भइलबाकिर संतोष के बाति ई रहे कि ओहिदिन सब चिरइ बिना झगरा के फुदुकि-फुदुकि के दाना बिन -बिन खात रहली सोन।शायद तेल के असर धोआ गइल रहे।

लाली दउरल घरमें से एक मुठ्ठी चाउर के खुद्दी लियाके छिंटि दिहली ।
गौरइया जइसे होड़ लगाके खाए लगली सोन।

लाली सोंचली-“गौरइया त ओइहीं खतम होत जात बाड़ी सन।एकुल्हिन के बचावल जरूरी बा। “एतरे लाली अब कान ध लिहली कि बिना जनले-सुनले अपना मन से कवनो काम नाहीं करब।

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