ताड़ी पऽ कवि ह्रदयानन्द विशाल जी के लिखल एगो भोजपुरी गाना

चाहें होखे हाड़ा
चाहें होखे हाड़ी
लियाव रे पसिया
लबनी मे ताड़ी

ताड़ी मे जनेव डुबल
ताड़िये मे माला
तरकुल के पेंड़ तर
खुलल बा पाठशाला
ताड़ी खातिर साधु लो
मुड़ावता मोछ दाढ़ी
लियाव…..

ता ड़ी गरीब पिये
ताड़ी पिये राजा
ताड़ी के पियाई मे
आवेला बहुते माजा
खेतवा बेचाई चाहें
तन पर के साड़ी
लियाव…..

ह्रदया विशाल जी के
मन भइल बेकल
पुरा सीजन बीत गइल
कहियो नाही ठेकल
अनिरुध के नाप के
पियाव दुई काँड़ी
लियाव…..

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