भोजपुरी का नामकरण

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ऋग्वैदिक काल से लेकर पौराणिक काल तक धार्मिक, ऐतिहासिक, अभिलेखीय एवम् साहित्यिक ग्रन्थों में ‘भोज’ शब्द का अनेक बार उल्लेख मिलता है ‘भोज’ शब्द भारतीय संस्कृति व सभ्यता की अस्मिता में बहुत ही लोकप्रिय तथा गाँव-गाँव में कोटि-कोटि जनों का कण्ठाहार है ऋग्वैदिक काल से ही ‘भोज’ शब्द की परम्परा देखने को मिलती है।

भोज-सुदास का अनुचर : ऋग्वेद 3/53/7
अंगिरस भोज विरूप थे । ऋग्वेद 3/20/7

इसके अलावा ऋग्वेद में 8-6-4.55 तथा 10-107-10 में ‘भोज’ शब्द का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण तथा ऐतरेय ब्राह्मण में ‘भोज’ शब्द का विवरण मिलता है। कुन्ती का पालक पिता कुन्तभोज का उल्लेख मिलता है।

हैहयो की एक शाखा का नाम भोज था जो विदर्भ तथा बरार में जाकर बस गयी थी।

यहां तक कि गुजरात में कृष्णियो और यादव के लिए भोज शब्द का प्रयोग होता है। उग्रसेन तथा उसका पुत्र कंस भोज था। विदर्भ का भीष्मक तथा रूक्मी भी भोज था। विदर्भ का भोजकर रूक्मी ने बसाया था। विदर्भ में भोजों का शासनकाल प्राचीनकाल से रहा है। भोजवंश का राज होने से विदर्भ भोज देश भी कहलाता था तथा वहां के राजा को भोजपति कहा जाता था। रघुवंश के पांचवें से आठवें सर्ग तक इस वंश का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ (1-3) में राण्डक्य नामक भोज का उल्लेख मिलता है । मौर्यवंश के प्रसिद्ध सम्राट अशोक ने अपने 13वें लेख तथा खारवेल के लेख में विदर्भ में बसने व राज्य करने वाले भोज तथा उसके वंश का उल्लेख मिलता है। महाकवि दण्डी द्वारा रचित गद्य ‘दसकुमार चरितम्’ में विदर्भ देश के भोज वंश का उल्लेख मिलता है।

चौदहवीं शती के ‘प्रबन्धक-कोष’ के रचनाकार राजशेखरसूरी का कहना है कि भोज अनेक हुए। इस कारण से एवैदिक, साहित्यिक व ऐतिहासिक भोज के एक दूसरे में मिल जाने की सम्भावना ने ‘भोज’ शब्द को ही संदेश के घेरे में खड़ा कर दिया। सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय में भोज शब्द के कारण विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। विभ्रम की स्थिति को ‘प्रबन्धकोष’ अधिक अस्पष्ट करता है –

न च सातवाहन क्रमिकः सातवाहन इति विरूद्वय
भोजपदे बहूगां भोजत्वेन,
जनकपदे बहूनां जनकत्वेन रूढत्वात् ।
जनकपदे बहूनाँ जनकेत्वेनं रूढ़त्वात् ।

इससे बिल्कुल स्पष्ट होता है कि चौदहवीं शती तक ‘भोज’ शब्द का विभिन्न व्यक्तियों, वंशों, संदर्भो व राजकुलों के लिए प्रयोग होता रहा हैऐतिहासिक दस्तावेज यह स्पष्ट संकेत करते है कि ईसा पूर्व तीसरी शती से ग्यारहवीं शती. तक मध्य भारत के दक्षिण-पश्चिम में भोज बसते थे तथा उनके राज्य भी थे।

भविष्य पुराण (1–117) के अनुसार सूर्य पूजक भी भोज कहलाते थे। भविष्य पुराण आगे यह भी कहता है कि विक्रम संवत् 541 में राजा भोज,मुहम्मद से मिले थे तथा उनके साथ कालिदास भी थे। इसकी पुष्टि ‘आइने अकबरी’ से भी होता है।

प्रायः यह माना जाता है कि ‘भोजक’ शब्द प्राचीन काल में जागीरदार के अर्थ में प्रयोग होता था। जागीर का अर्थ होता है जा-गोर, ‘जा का अर्थ है जगह तथा गीर का अर्थ है पकड़ना अर्थात् जागीर उस जगह को कहते है जो सदा के लिए अधिकार में आ जाए। भारत के सम्पूर्ण वाड्मय में ‘भोज’ का उल्लेख विभिन्न स्थलों व क्षेत्रों में देखने को मिलता है। जिसमें कुछ स्थान व क्षेत्र निम्नवत् है

  1. ऋग्वेद, भविष्य पुराण, शतपथ व ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थों में भोज का विवरण मिलता है।
  2. महाकवि दण्डर्डी के ‘दशकुमार चरितम्’ में भोज का उल्लेख।
  3. ‘प्रबन्ध-कोष’ के रचनाकार राजशेखर सूरी के काव्य में भोज का विवरण है।
  4. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भोज।
  5. उड़ीसा के राजाभोज का समय 184 ईसा पूर्व 37 ईसा पूर्व माना जाता है जिसके दरबार में 750 कवि निवास करते थे।
  6. ऐत्पुरी के प्राचीन अभिलेख में भोज का वर्णन।
  7. परिहार वंश के रूद्र वर्मा का पुत्र जिसने ‘भोज राष्ट्र’ बसाया ।
  8. अजयगढ़ दुर्ग से शिलालेख प्राप्त हुए है जिसमें भोज वर्मन का कोषाधिपति तथा भण्डागार पति सुभट्ट को बताया गया है।
  9. अजन्ता के लेख में हस्तिभोज का उल्लेख मिलता है जो वहां के राजा का सचिव था
  10. प्रतिहार राजा मिहिर भोज कार्य काल 836 ई0 से 912 ई0 तक माना जाता है।
  11. धारधीश परमार भोजराज प्रथम का समय 999 ई0 से 1054 तक माना जाता है तथा परमार भोज द्वितीय का समय 1300 ई० माना जाता है।
  12. शिलाहड भोजराज प्रथम का समय 1175 ई० तथा शिलाहड द्वितीय का समय 1182 ई० माना जाता है।
  13. दसवीं सती के आबू पर्वत का जैन भोज हुआ।
  14. नेपाल के राजा भोज का समय 1015 ई0 माना जाता है।
  15. 16वीं शती की भक्त मीराबाई का पति मेवाड़ का सिसोदिया राजा भोज था
  16. मन्दसौर के निकट प्रतापगढ़ का शाह भोजराज जिसने 1857 ई0 के गदर में प्रतापगढ़ की सुरक्षा में सहयोग देने के उपलक्ष्य में उस राज्य से सम्मान प्राप्त किया था।
  17. नेमि चरित का रचयिता भोज सागर।
  18. गोविन्द विलास काव्य का रचयिता भोज।
  19. आयुर्वेद सर्वस्व का रचयिता भोज।
  20. बंगाली प्रेमकथा में भोज तथा भानुमती का उल्लेख मिलता है।
  21. कश्मीर के क्षीरस्वामी (772 ई) ने व्याकरण तथा कोष प्रणेता भोज का विवरण दिया है।
  22. रामचन्द्र वर्मा ने ‘पीताम्बर चरित’ में भोज का विशेष वर्णन किया है।
  23. आइने अकबरी में भोज का वर्णन मिलता है।

उपर्युक्त महत्वपूर्ण स्रोतो के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि ‘भोज’ शब्द ऐतिहासिक, अभिलेखीय, साहित्यिक, राजनीतिक व परम्परागत रूप में आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति सभ्यता व राजसत्ता की राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रतिबिम्बित होता रहा है।

बिहार के बक्सर जिले के पास भोजपुर परगने में ‘पुराना भोजपुर’ नाम का एक गाँव है। यह डुमराँव रेलवे स्टेशन से दो मील उत्तर बक्सर से दस मील पूरब तथा पटना से साठ मील पश्चिम, आरा-बक्सर के दोनों ओर बसा है। अब यह भोजपुर नाम ‘नयका भोजपुर’ और ‘ पुरनका भोजपुर’ नामक आस-पास बसे ग्रामों के लिए व्यवहृत होता है।

जॉन बीम्स ने रॉयल एशियाटिक सोसायटी के जर्नल, भाग-3 सन् 1868 के पृष्ठ 483-585 पर लिखा है – “भोजपुरी का नाम प्राचीन भोजपुर नामक नगर से लिया गया है। यह नगर शाहाबाद जिले में गंगा के दक्षिण कुछ मील पर ही बसा था जिसकी दूरी पटना से 60 मील थी आज तो यह छोटा सा गाँव है, किन्तु किसी समय में शक्तिशाली राजपूतों की राजधानी था।

भोजपुरी का नामकरण
भोजपुरी का नामकरण

शाहाबाद गजेटियर में भोजपुर के सम्बन्ध में लिखा है – “भोजपुर एक गाँव है, जो सब डिविजन में डुमराँव से दो मील उत्तर बसा है। इसकी जनसंख्या (सन् 1921 में) 3605 थी। इसी गांव का नाम मालवा के राजा भोज के नाम पर पड़ा है। कहा जाता है कि राजा भोज ने राजपूतों के एक गिरोह के साथ इस जिले पर आक्रमण किया और यहां के आदिवासी चेरों को हरा कर अपने अधीन किया। आज शाहाबाद का सम्पूर्ण उत्तरी भाग भोजपुर नाम से जाना जाता है।

यहाँ के भाषा के बारे में उक्त गजेटियर के पृष्ठ 40 पर लिखा है – ‘ इस जिले के सम्पूर्ण भाग में जो भाषा वर्तमान समय में बोली जाती है, वह बिहारी हिन्दी का एक रूप है, जो भोजपुरी कहीं जाती है। यह भोजपुरी नाम भोजपुर परगने के नाम पर पड़ा।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन भी उज्जैनी राजपूतों द्वारा भोजपुर नगर बसाए जाने की पुष्टि करते हैं – “शाहाबाद के उज्जैन राजपूत मूल स्थान के कारण उज्जैन और पीछे की राजधानी धार से भी आए, कहे जाते हैं।”

“सरस्वती कण्ठाभरण’ धारेश्वर महाराज भोज के वंश के शान्तन शाह, 14वीं सदी में, धार राजधानी के मुसलमानों के हाथ में चले जाने के कारण जहाँ-तहाँ होते हुए बिहार के इस भाग में पहुंचे। यहां के पुराने शासकों को पराजित करके महाराज शान्तन शाह ने पहले ‘दावा’ (बिहिया स्टेशन के पास छोटा-सा गांव) को अपनी राजधानी बनाया। उनके वंशज ने जगदीशपुर, मठिया और अन्त में डुमरांव में अपनी राजधानी स्थापित की। पुराना भोजपुर गंगा में बह चुका है। नया भोजपुर डुमरांव स्टेशन से दो मील के करीब है।

धीरे-धीरे भोजपुर का विशेषण भोजपुरी,इस प्रान्त के निवासियों तथा उनकी बोली के लिए भी प्रयुक्त होने लगा। चूंकि इस प्रान्त के उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम में भी इस प्रान्त की बोली ही बोली जाती थी। अतएव भौगोलिक दृष्टि से भोजपुरी प्रान्त से बाहर होने पर भी इधर की जनता तथा उसकी भाषा के लिए भोजपुरी शब्द ही प्रचलित हो चला। (शाहाबाद गजेटियर)।

आरा पुरातत्व में लिखा है – “इस प्रान्त के नाम से ही भोजपुरी बोली प्रसिद्ध है।” इस मत का समर्थन करते हुए सर जार्ज ग्रियर्सन कहते हैं – भोजपुरी उस शक्तिशाली, स्फूर्तिपूर्ण और उत्साही जाति की व्यावहारिक भाषा है, जो परिस्थिति और समय के अनुकूल अपने को बनाने के लिए सदा प्रस्तुत रहती है और जिसका प्रभाव हिन्दुस्तान के हर भाग पर पड़ा है। हिन्दुस्तान में सभ्यता फैलाने का श्रेय बंगालियों और भोजपुरियों को ही प्राप्त है। इस काम में बंगालियों ने अपनी कलम से काम लिया और भोजपुरियों ने अपनी लाठी से।

डा0 उदयनरायण तिवारी ने काशी नागरी प्रचारिणी की पत्रिका में प्रकाशित “भोजपुरी का नामकरण’ लेख में लिखा है – “लिखित रूप में भोजपुरी भाषा का सर्वप्रथम प्रमाणिक प्रयोग हमें सन् 1789 में मिलता है। ग्रियर्सन साहब ने अपनी पुस्तक लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया के प्रथम भाग के पूरक अंश पृष्ठ 22 में एक उद्धहरण दिया है। यह रेमण्ड कृत ‘शेर मुतारीन के अनुवाद’ से लिया गया है। वह इस प्रकार है – 1789, दो दिन बाद सिपाहियों का एक रेजिमेण्ट जब दिन निकलने पर शहर से होता हुआ चुनारगढ़ की ओर जा रहा था, तब मैं वहां गया और उन्हें जाते हुए देखने के लिए खड़ा हो गया। इतने में रेजीमेण्ट के सिपाही रूके और उनके बीच से कुछ लोग अन्धी गली की ओर दौड़ पड़े। उन्होंने एक मुर्गी पकड़ ली। तब सिपाहियों में से एक ने अपनी भोजपुरी बोली में कहा इतना अधिक शोर न मचाओ ।

इसके बाद भाषा के रूप में भोजपुरी शब्द का प्रयोग सन 1868 में जान बीम्स ने ‘रायल एशियाटिक सोसायटी’ के जर्नल में प्रकाशित अपनी भोजपुरी सम्बन्धी लेख में किया है। यह लेख प्रकाशित होने के एक वर्ष पूर्व (17 फरवरी सन् 1867 को) एशियाटिक सोसायटी में पढ़ा गया था। गुजराती, उडिया, बंगाली, पंजाबी, नेपाली, गोरखाली, राजस्थानी आदि सभ्यता, संस्कृति व इतिहास में देखने को मिलता है। अतः भोजपुरी अस्मिता का संघर्ष देश की अस्मिता का संघर्ष से नामिनाल बद्ध है। जब जब भोजपुरी अस्मिता पर संकट उत्पन्न हुआ है तो देश की राजनीतिक मानचित्र धुंधला व अस्पष्ट होने लगा है। भारत के राष्ट्रीय अस्मिता की आत्मा हमेशा से ही भोजपुरी अस्मिता रही है। इसी ने हमेशा भारतीय राष्ट्रीयता को उजागर किया है।”

भोजपुरी पूर्वी अथवा मागधी परिवार की सबसे पश्चिमी बोली है। ग्रियर्सन ने पश्चिमी मागधी को ‘बिहारी’ के नाम से अभिहित किया है। बिहारी से ग्रियर्सन का उस एक भाषा से तात्पर्य है, जिसकी मगही, मैथिली तथा भोजपुरी तीन बोलियां है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से ग्रियर्सन का कथन सत्य है किन्तु इन तीनों बोलियों में पारस्परिक अन्तर भी हे। मैथिली ‘अछ’ या ‘ठ’ धातु का प्रयोग भोजपुरी तथा मगही में नहीं है। इसी प्रकार भोजपुरी क्रियाओं के रूप में मैथिली तथा मगहीं क्रियाओं के रूप में की जटिलता का सापेक्षिक दृष्टि से अभाव है। उधर मैथिली में प्राचीनकाल से साहित्य रचना होती आ रही है और भोजपुरी तथा मगही में भी लोकगीतों तथा लोकगाथाओं का बाहुल्य है।

भोजपुरी बोली का नामकरण शाहाबाद जिले के भोजपुर परगने के नाम पर हुआ है। शाहाबाद जिले में भ्रमण करते हुए डॉ बुकनन सन् 1882 ईसवीं में भोजपुर आये थे। उन्होंने मालवा के भोजवंशी उज्जैन राजपूतों के ‘चेरो’ जाति को पराजित करने के सम्बन्ध में उल्लेख किया है।

बंगाल की एशियाटिक सोसायटी के 1871 के जर्नल में छोटा नागपुर पचेत तथा पलामू के सम्बन्ध में मुसलमान इतिहास लेखकों के विवरणों की चर्चा करते हुए ब्लॉचमैन ने भोजपुर का भी उल्लेख किया है। वे लिखते है – बंगाल के पश्चिमी प्रान्त तथा दक्षिणी बिहार के राजा, दिल्ली के सम्राट से पराजित होकर बन्दी किये गये और अन्त में जब बहुत आर्थिक दण्ड के पश्चात् वे बन्धनमुक्त हुए तो, उन्होंने पुनः सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति की। जहांगीर के राजत्वकाल में भी उनकी क्रान्ति चलती रही, जिसके परिणामस्वरूप भोजपुर लूटा गया तथा उनके उत्तराधिकारी प्रताप को शाहजहाँ ने फांसी का दण्ड दिया।

उज्जैन के भोजों के नाम पर ही भोजपुर नाम पड़ा, क्योंकि प्राचीनकाल में इन्हीं लोगों ने इस क्षेत्र पर अधिकार करके यहां शासन करना आरम्भ किया था। डुमरांव के निकट भोजपुर नगर ही इनकी राजधानी था। यद्यपि इस प्राचीन नगर का वैमव विनष्ट हो चुका है तथापि अब भी डुमरांव के निकट ‘छोटका’ तथा ‘बड़का’ भोजपुर नाम के दो गाँव वर्तमान है। ‘नवरत्न दुर्ग’ का ध्वंसाशेष अब भी यहां वर्तमान है। इसके स्थापत्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मध्ययुग की कृति है।

भोजपुर के प्राचीन नगर के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम भी ‘भोजपुर’ पड़ गया, जो आगे चलकर इस नाम के परगने तथा जिले के नाम का कारण हुआ। प्राचीन काल में भोजपुर नगर के दक्षिण तथा वर्तमान आरा जिले के उत्तर का अर्द्धभाग ही इस प्रान्त की सीमा थी।

सन् 1781 के जेम्स रेनेल के ऐटलस में आरा के उत्तरी भाग का नाम ‘रोतास’ (रोहतास) प्राप्त मिलता है। इस प्रकार 18वीं शताब्दी में भोजपुर एक प्रान्त था। धीरे-धीरे, इसका विशेषण भोजपुरी, इस प्रान्त के निवासियों तथा उसकी बोली के लिए भी प्रयुक्त होने लगा। चूंकि इस प्रान्त की बोली ही इसके उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम में भी बोली जाती थी, इसलिए भौगोलिक दृष्टि से मोजपुर प्रान्त से बाहर होने पर भी इधर की जनता तथा उसकी भाषा के लिए भी ‘भोजपुरी’ शब्द ही प्रचलित हो चला।

यह एक विशेष बात है कि भोजपुर के चारों ओर की ढाई करोड़ से अधिक जनता की बोली का नाम भोजपुरी हो गया। प्राचीनकाल में भोजपुरी का यह क्षेत्र, ‘काशी’ ‘मल्ल’ तथा ‘पश्चिमी मगध’ एवं ‘झारखण्ड’ (छोटा नागपुर) के अन्तर्गत था। मुगलों के राजत्वकाल में जब भोजपुर के राजपूतों ने अपनी वीरता तथा सामरिक शक्ति का विशेष परिचय दिया तब एक ओर जहाँ भोजपुरी शब्द जनता तथा भाषा दोनों का वाचक बनकर गौरव का द्योतन करने लगा, वहाँ दूसरी ओर, वह एक भाषा के नाम पर प्राचीन काल के तीन प्रान्तों को एक प्रान्त में गूंथने में भी समर्थ हुआ।

इस प्रकार सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में मागधी भाषा के इस रूप के बोलने वाले भोजपुरी कहलाये। भोजपुरी स्वभावतः युद्ध प्रिय होते हैं, अतएव मुगल सेना तथा उसके बाद 1857 के भारतीय विद्रोह तक ब्रिटिश सेना में उनका बड़ा सम्मान रहा।

बिहार में प्रचलित निम्नलिखित पद में भोजपुरियों के युद्धप्रिय स्वभाव की चर्चा है। इस पद में भोजपुरिया शब्द से भोजपुरी लोगों से तात्पर्य है। पद इस प्रकार है –

भागलपुर के भगोलिया
कहलगांव के ठग,
पटना के देवालिया,
तीन नामजद,
सुनि पावे भोजपुरिया,
व तीनू के तुरे रग ।

मुगलों के राजत्वकाल में दिल्ली तथा पश्चिमी में, भोजपुरियों विशेषतः भोजपुरी क्षेत्र के तिलंगों को बक्सरिया कहा जाता था।

17ीं तथा 18वीं शताब्दी में भोजपुर तथा उसके पास में ही स्थित बक्सर, फौजी सिपाहियों की भर्ती के दो मुख्य केन्द्र थे। 18वीं शती में जब अंग्रेजों के हाथ में देश का शासन सूत्र आया तब उन्होंने भी मुगलों की परम्परा जारी रखी और वे भी भोजपुर तथा बक्सर से तिलंगों की भर्ती करते रहे।

श्री राहुल सांकृत्यायन ने बलिया जिले के तेरहवें वार्सिकोत्सव के अपने अभिभाषण में भोजपुरी भाषा के स्थान पर ‘मल्ली’ नाम का प्रयोग किया है। ‘मल्ल’ जनपद बुद्ध के समय के सोलह महाजनपदों में से एक था। इसकी निचित सीमा क्या थी, यह आज निश्चित रूप से नहीं बतलाया जा सकता। जैन कल्पसूत्रों में नव मल्लों की चर्चा है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों में केवल तीन स्थानों – कुशिनारा, पावा तथा अनुप्रिया तथा ‘उरूबेलकप्प’। कुशिनारा तथा पावा विद्वानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित वर्तमान कसया तथा पड़रौना ही है। इस सम्बन्ध में एक बात और विचारणीय है। ‘मल्ल’ की भांति ‘काशी’ का उल्लेख भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है । काशी में भी भोजपुरी ही बोली जाती है, अतएव मल्ल के साथ काशी का होना भी आवश्यक है। राहुलजी ने इस क्षेत्र की भोजपुरी का ‘काशिका’ नाम दिया है, किन्तु भोजपुरी को ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त करना अनावश्यक तथा अनुपयुक्त हैआज भोजपुरी एक विस्तृत क्षेत्र की भाषा है। यही कारण है कि प्राचीन जनपदीय नामों को पुनः प्रचलित करने की अपेक्षा इसी का प्रयोग वांछनीय है। इस नाम के साथ-साथ भी कम से कम तीन सौ वर्षों की परम्परा है।

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