विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी भरम

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भरम के महल जब ढहल तs मन अऊर आत्मा दुनु देह छोड़ के दू राह जाये लागल।आखिर ई भरम में देह के का दोस रहे? ई देह त खाली एगो आकार बा? ई सिरिजनात्मक माटी पर एक दोसरा के जाने-बुझे आ समझे के आधार मात्र बा।
धूनी के लपट से निकलत छोटी-छोटी लुत्ती देखत हम ई सवाल अपना सोझा बइठल देवस्वरूप तपस्वी से पूछनी।तपस्वी के लिलार पर एतना तेज रहे कि उनका मुँह से आँख हटावे के मन ना करे। उनका लिलार के चमक हमरा आँख के जोती देव जवन हम शब्द में नइखी बता सकत। खाली अनुभव कर सकत बानी आ तेज से एगो दिव्य ज्ञान के पूँजी बिटोर सकत बानी।

तपस्वी जी अपना आसन पर एकदम निश्चिंत बइठल अपना अंदर एगो गहिर साँस भरत कहनी-
“”तहर बात सही बा। कवनो क्रिया के जरिया देह बा आ देह के हर एगो अंग क्रिया में हिसेदार होला।
बाकिर भरम का ह.? एक तरह से कुछो ना ह भरम आ ना समझऽ त भरम सब कुछो बा ए मुअल जगत (मृत्युलोक) में।तू ठीक हमरा सोझा बइठल बारऽ, हम तहरा सोझा, ई सिरिष्टी के छोट छोट कर्ण से बनल आकार रूप में हमनी एक दोसरा के सोझा बानी जा। लेकिन इहो भरम में बा.? खाली सोचे के शक्ति पर टिकल बा।तू सबकुछो पा सकत बारऽ आ नाहिंयो पा सकेलs।

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काहे कि सबसे बड़का ब्रामण्ड हर आदमी के मूड़ी में बा? चाहे रचनात्मक, कलात्मक भा दिव्यात्मक होखो।सब कुछो के पावे ख़ातिर खाली सोचे के दरकार होखे के चाही उहो सोच के दरकार जवन खुदे के विचार से ऊपर हो।जवन सोच हम सोची हमरा मिले हम पाइ काहे कि सोच त मूड़ी में होला जवन दिमाग के रूप ह आ जवन सोच हमनी अपना मूड़ी के ब्रम्हांड से निकालेम जा उहे सोच साँच होके हमनी लगे ब्रम्हांड फेरु से भेज दी।

लेकिन ई खाली करम के रेखा पर चलके पावल जा सकत बा बाकिर सोच बदले के ना होई एकदम कठोर रूप देवे के होई अपना आपके, अपना सोच के आ अपना आत्मा के औघड़ बनावे के होई तब ई सिद्धि मिली।'””

एतने कह के तपस्वी जी अपना धूनी में घिउ के साथे कुछ मिलवनी आ धूनी के लहोक अउर उफने लागल।धूनी के कगरी से लुत्ती जइसन तलफत राखी अपना बाँहि अऊर लिलार पर रगड़ लेनी।

हमु आसन मार हाथ जोड़ उहाँ के सोझा बइठल रही। हमरा अंदर उफनत हर घरी बहुत सगरो सवाल बार बार हमर जीभ के कंठ, तारु आ दाँत से टकरावत कुछ ना कुछ शबद मुह से निकाल देव।

विवेक सिंह जी
विवेक सिंह जी

हम फिरू पूछनी-
“” अच्छा तपस्वी जी रउवा मुअल जगत काहे कहनी ह। हमनी सब त एगो जीव के रूप बानी जा आ ई जीव जगत मुअल कइसे हो गइल आ ई जगत मुअल बा त ई जगत में एहर ओहर घुमे वाला जीव ख़ातिर कवन अइसन डोर बा जवन सबके एक दोसरा के बान्ह के रखले बा?’

तपस्वी जी अपनी झोरी से कुछ निकाल के धुनी में डलनी आ तब कहनी-
“”हँ, ई मुअल जगत ह काहे कि इहाँ सब कुछो एक ना एक दिन खतम हो जाई। एजा कुछो ना रही। रही तs बस परेम…।

हँ, परेम जवन ई मुअल जगत पर रहे वाला सगरो जीव के एगो डोरा से जोड़ले बा चाहे कवनो जीव होखो परेम के राहे सब केहू एक दोसरा पर आश्रित बा आ मुअल जगत में सबके जवन सबसे सुनर आ पवितर बरदान मिलल परेम बा। सभे परेम के अधीन बा। कवनो अइसन रिस्ता नइखे जवन परेम से ना बन्हल होखे।

जब परेम सब कुछो से अभिन होके परान में ढुक जाए त समझ लीहS कि अमरत्व के अमरित पा गइल बा।आ ई मुअल जगत से कही ऊपर ओकर पद हो गइल बा।

केहू, केहू से परेम करे बाकिर परेम निस्वार्थ आ त्याग से भरल होखे के चाही।जइसे कि एगो माई के अपना लइका, अपना परिवार से बिना स्वार्थ के परेम होला। एगो सच्चा भगत के अपना प्रभु, अपना रचइया के चरण रूपी धूरि के दर्शन ख़ातिर बिना स्वार्थ के परेम होला।अउर ह एगो परेमी अपना परेमिका से बिना कामना के परेम करेला। उहे परेम परमेश्वर के रूप मानल जाला आ उहे परेम बाद में जाके परम जगत के राह देखावेला फिरो ई मुअल जगत से छुटकारा मिलेला ।
चिमटा से धूनी में जरत लकड़ी के फोरत तपस्वी जी आपन बात पूरा कइनी।

हम एकदम से भकुआ गइल रही परेम आ मुअल जगत के परिभाषा सुनके।काहे कि ई सब हमरा मूड़ी के ऊपरे ऊपर निकल जात रहे।हम त जतरा पर रही। अपना सपना के साँच करे के जतरा पर।लेकिन ई भादो के महीना हमरा जतरा में अकास से बरखा बरखाके हमर आ हमरा सपना दुनु के सउतिन बन गइल रहे।जब जतरा सुरु करी ई करिआ-करिआ बदरी आपन छाव देखावत आ जाव आ भरपूर बिना पइसा के नाच देखा जाये।

हमर सपना रहे अपना आप के जाने के। ए मुअल जगत के पहिचाने के बहुत सब सवाल के जबाब समझे के।लेकिन घर के घरगीजन से कइसे- कइसे कर के हम निकलल रही, ई हमहीं जानत रही।

हम घर-गिरहस्थी से अगुता के आपन करम योग के राह छोड़ एकदम से सन्यासी योग में जाये ख़ातिर उतारु हो गइल रही। घर में मेहरी, लइका, लइकी, बाबू, माई सभे के छोड़ हम ई राह पर चल देले रही, हम फेरु कुछ पूछे वाला रही तब तक तपस्वी जी हमरे से पूछ देनी-

“”बच्चा तू कहाँ जात बारऽ आ कवना चीज के खोज में बारS? तहर घर कहाँ परी, नाव का हs, अइसन अनेको हमरा से सटल प्रश्न रहे जवन तपस्वी जी कइनी।””

बाबा हम बिहार से बानी। हमर नाव अमर हs आ हम ए मुअल जगत के स्वरूप आ आपन जिज्ञासु मन के जानल चाहत बानी। अइसन का ई जगत में बा जवन हमरा के मिली त पूरा अर्थहीन जीवन के अर्थ मिल जाई।””

हम आपन परिवारिक बात ना बता के मन के ऊदवेगन पोथी खोल के रख देनी तपस्वी जी के सोझा।
तपस्वी जी अब चिलम से गाजा के कस लगइनी। चिलम के मुह पर अंगारी चमके लागल आ कुटिया धुँआ धुँआ हो गइल।

फिरो हमरा ओर चिलम बढ़ावत बोलनी-
“”हम तहरा के सब बता देले बानी। ए मुअल जगत में कुछ पावे के इछा रखत बारS त इछा परेम के राखऽ। काहे कि परेम मिली त ई परम जगत से मुअल जगत में बेर बेर आवे जाये से छुटकारा मिल जाई।””

बाबा ई परम जगत का ह..? हम फेरु एगो सवाल कर देनी आ चिलम से दम मारे के मनाही।

हम शहर से पचास कोस दूर एगो जंगली आ पहाड़ी रस्ता में पैदल जतरा पर रही, जवना के नतीजा आज मुसलाधार बरखा में ए एकांत आश्रम के सहारा लेवे के पड़ल। ए आश्रम में अनेको तरह के कुटी बनल रहली सन, जवना में ई कुटी बहुत महीन कारीगरी से बनावल गइल रहे। ए आश्रम के सुनरता कवनो दिव्य जगत से कम ना लागत रहे।

इहाँ चित शांत त जरूर रहे लेकिन कुछ शांत जगह भयावनो होला। ई बात हमरा करेजा से बेर बेर आवाज देव।
तपस्वी जी जिलम के कस फिरो लगइनी आ बोलनी-
“‘ परम जगत जगत ह जवन सीधे परमपिता परमात्मा से जोड़ेला।सब कुछो उनके से शुरू होला आ उनके में खतम हो जाला। जे केहू ओ जगत खेवइया से परेम कर ली ओकर डेंगी पार लाग जाई आ मुअल जगत में बेर बेर आइल छूट जाई।””

ई सब बात से हमर चित के तनी शांति मिलत रहे, तबे हमर नजर अपना गटई पर बान्हल घड़ी पर पड़ल। साम पाँच बजे के बइठल-बइठल रात के आठ कब बज गइल पते ना चलल।अब बरखा बन्द होगइल रहे तपस्वी जी अपना एगो चेला के बोला के कहनी-
“”जीवट महाराज ए बच्चा के खाना खिया के विश्राम करावे के ले जाईं।””

हम उठनी, आपन खादी के जोड़ा उठइनी आ तपस्वी जी के पाँव छूवनी आ जीवट महराज के साथे दोसरा कुटिया में आ गइनी।

आश्रम में मुस्किल से बीस गो से पचीस गो सन्यासी होइहे आ सबके मेठ तपस्वी जी रही। हम जीवट महराज से तपस्वी जी के बारे में पूछनी।

“”महाराज जीवट जी तपस्वी जी कबसे सन्यासी बानी आ उहाँ के नाँव का ह?””

जीवट महाराज हमरा के पतई से बनल दोना में धूनी में पाकल फुटौरा के साथे मूंग आ अरहर के मेलवनी दाल देत कहनी-
“”गुरु जी महाराज छोटपन से सन्यासी हो गइनी। उहाँ के बहुत सगरो सिध्दि पा गइल बानी। इहाँ के नाँव परेमानन्द महाराज हs।”

एतने कह के जीवट महाराज चल गइनी। हम खाना खइला के बाद सूते ख़ातिर कुश के चटाई भुइयाँ बिछाके सुत गइनी।लेकिन आँखिन में अब नींन कहाँ रहे। बेर-बरे आँख मुदला पर परेमानन्द जी के अलोकिक ज्ञान आ दिव्य तेज मुँह आँखिन के सोझा आ जाये।

मन मे अब बिचार उफने लागल कि काहे ना हम परेमानन्द जी से दीक्षा ले ली आ इहे आश्रम में परमात्मा के परेम में मगन हो जाईं।परेम के परिभाषा आ मुअल जगत के सार जानके हम फेरभरम आ घर-गिरहस्थी के जाल में काहे फँसी। अंतिम बेर में खुदे के बतकुचन से हम इहे फइसला कइनी कि काभोरे महाराज जी से हम दीक्षा लेवे के बात करब।

इहे सब उधेड़बुन मे रात जवान हो गइल रहे। भादो के अन्हरिया रात जवना में परेतो अपना परछाई से डेरा जाये। झिंगुर के एक मेल आवाज कवनो झुनझुना से कम ना आवत रहे, उहे रह-रह के कबो सियार बोले त कबो उरुआ। जंगल आ पहाड़ के बीच बनल ए आश्रम में राति के बेर का सुनाई दी? हँ, तनी दूर पर पहाड़ से गिरत छोट झरना से पानी जवन मधुर आवाज में राग अलापत रहे, जवना से हमर चित्त ओ राग में घुसल चाहत होखे।

हमरा आ प्रकृति के मधुर मेल में हमरा केहू के चिल्लाए के आवाज आइल। हम अपना कुटिया से निकल ओ आवाज के ओरी झटकल गइनी। चिल्लाहट अऊर कहियो से ना बल्की परेमानन्द महाराज के कुटिया से आवत रहे। जब हम ओ कुटिया में बनल एगो छोट मौका से झकनी तs हमर सास रुकल के रुकल रहि गइल आ आँख फाटल के फाटल

परेमानन्द महाराज एगो हाथ मे अंग्रेजी ठर्रा के बोतल आ एगो हाथ से कमसिन ऊमिर के लइकी के बाँहि पकड़ले रही। लइकी आपन इज्जत बचावे ला चिल्लात रही आ परेमानन्द जी ठर्रा के निशा में ए भदावरी के करिआ रात में ओ मासूम के जिनगी करिआ कइल चाहत रहले।

परेमानन्द पूरा निशा में बोलले-
“”अरे कहाँ भागत बारू? हम तहरा के एगो जोग सिखावल चाहत बानी आ तू हमरा से डेरात बारू? बस एक बेर तू हमर बात मान जा आ हमरा के अपना में खो जाए दs।हम तहरा के बहुत बड़की जोगन बना देम। तहरा एगो सन्देस पर हमर आश्रम के चेला सब तहरा आगे पीछे डोले लगिहें।””

लइकी आपन बाँहि छोरावत आ रोअत गिलगिलात बोललि-

“”अरे छोड़ दs हमरा के छोड़ दs। हम तहर का बिगडले बानी? तू त हमरा बाबू जी जइसन बारS। हमरा के इहाँ से जाये दs, छोड़ दs हमरा के।””‘

लेकिन परेमानन्द निशा में धुत रहले। अब लइकी के साथे बलबस्ती पर उतारू हो गइले।लइकी रोअत गिलगिलात रहे लेकिन परेमानन्द के काकामना के उतेज में बहिर आ आँखि अन्हरिया गइल रहे।हमरा से अब रहल ना गइल। हम ओ टाटी के चिरत अंदर आ गइनी। जब परेमानन्द हमरा के देखले त उनकर रंग उड़ गइल आ लइकी के परान में परान आइल।

अब लइकी आपन बाँहि छोड़ा के हमरा पीठ के पीछे आ गइल आ हम परेमानन्द से बोलनी-

हम त आपके आपन गुरु बनावे के सोचत रही। लेकिन, आप त बहुत नीच अउर घटिया बानी। ए धरम आ ज्ञान के नाव पर आप जवन ई कांड करत बानी एकदम से धरम आ इंसानियत के विश्वास के तार तार करत बा।आपके ज्ञान से आपके चरितर एकदम अलगे बा अउर एक बात अब ई लइकी के आप का आपके ए आश्रम के चेला सबो ना छू पइहे।”

परेमानन्द ठर्रा के बोतल फोड़ ओकर चोख आकार लेके हमरा ओरी बढ़त बोलले-
‘”‘ अब त तहरो खेला खतम करे के पड़ी बाबू, काहे कि तू हमर भेद जान गइल बार।””
एतने कह के परेमानन्द हमरा पर झपटले। हम उनकर गटई पकड़ लेनी आ बोतल के टुकी के छीना-छिनी में टुकी परेमानन्द के पेट मे धस गइल आ कहँरत जमीनी पर गिर गइले।

हम ओही बकत ओ लइकी के हाथ पकडले आश्रम से भाग निकलनी। तकरीबन तीन घन्टा लगतार चलला के बाद भोर के लाली देखाई दिलस आ शहर के ओर जात रस्ता मिलल। हम ओ लइकी के शहर के ओर जात एगो गाड़ी पर बिइठा देनी।
अब हमरा आँखिन में खाली आपन परिवार, आपन बच्चा, आपन माईं-बाबू आ घर-गिरहथी लउकत रहे। करमयोगी से हम कहाँ जोगी बने चलल रही। ए बात के बोध अब हमरा होत रहे।

आज फिरो एक बेर भरम के महल ढहल रहे। भरम का ह ई हमरा बुझात ना रहे। काहे कि परेमानन्द के ज्ञान में भरम रहे कि उनका कामरूप चरितर में भा हमरा अपना करम के योग से जोगी बने के बिचार में भा परेम के ओ डोर में, जवन परम जगत में परमात्मा से मिलावत ए मुअल जगत से छुटकारा देत रहे।

हम इहे सोचत अपना घरे के ओर चल दिहनी।।

(धयान दी~ इ कहानी भोजपुरी तिमाही ई पत्रिका सिरिजन के अंक-५ में छप चुकल बा ।इ कहानी लिखाईल १६-०६-२०१९ के आ प्रकाशित भइल ०१-०७-२०१९ के।)

✍विवेक सिंह, सिवान।

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