रामचन्द्र कृश्नन जी के लिखल भोजपुरी कहानी बिआह

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पांच जनि काका के बिच्चे में हम अपने घर के अकेले लइका रहलि,५०_६० बिगहा खेती हाथिन अस चर चर ठे बैल, दु दु तीन तीन ठे मजुरहा नितानेम हमरे दुआरे पर लगल रहें।धन दउलत के कवनो कमी ना रहें, हमरे घर के मेहरारू खेती बारी के मुंह नाई देखें, अकेले हम दुधें के कुल्ला करत रही। जीवन चीज़ मागिं देई अइले बिना ना रहें,। हमरे खानदान क दीया गुल होते रहें पांच जनि काका आ काकी के रहतें केहूं के वंश बरखा नाई रहें ,हमारे कुलि माई सोखा ओझा आ पर पंडित के दान पुन्य में केतना पइसा बर्बाद कइली,जोग टोट क केतना नाम लेई,लेकिन तब्बो मनसा पूरा नाइ भइल

लेकिन भगवान के अइसन लमहर बाहिं की उ हमार जन्म दे के पथरें पर दुबि जमा दिहलें एहिसे पांचों काका आ काकी हमके बहुत मानें।

जब हमार जन्म भइल ते केहूं कहें एंकर नाव अंगरू, मंगरू कतवारू धर , लेकिन हमार

रामचन्द्र कृश्नन जी
रामचन्द्र कृश्नन जी

माई कहलहम अपने अइसन नीक लइका के नाव अंगरू,मंगरू नाई धरब जीए के होई तो ओइसही जीहें नाई तो अंगरू मंगरू नाव धइले़ नाई जीहें, आखिर हमार नाव परकास धराइल

जब हम कुछ अउर सयान हो गइली,त के हूं कहें हमार लइका बरिस्टर होई के हूं कहें ई जज होई, के हूं कहें एंकर बिंआह खूब निक के दुलहिनि से कइल जाई , लेकिन हमरे बाबा त इहें कहें की एकरे बिआहें में खूब ढेर के दहेज लेब।काकियो लोगन के कम अरमान नाई रहें,।केहू कहें हाली पतोह आ जाई त पैर त दबाई,केहू कहे पतोह आ जाई त हमरे धन दउलत से का मतलब सगरों ताला कुंजी ओहि के दे देब।

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अब हम कुछ अउर सयान हो गइली।दस क इम्तहान दे भइल रहली की हमरे दुआरे पर बिआहे खातिर बरदेखुआ जुटे लगलें एको दिन अइसन बाव नाई जा की सर सिफारिश लें के केहूं बरदेखुआ हमरे दुआरी पर न जुटल रहें, लेकिन दहेज़ के अइसन भारी बोझ उनके सामने लटका दिहल जा की उ निराश हो के राहि पकडि लें।गोड़ मुड़ धइले के अलावा बरदेखुअन लग कवनो चारा नाई रहें,ई लोग इहें कहें ए पहुंना रउरा के हमरा दिहले से कुछ नाई होई ,रउरा का कमी बा अगर लइका के तकदीर में होई त लीक क लाख हो जाई,रउरा पुरइनि क पात हई,अगर रउरा लग हम अइली त हमके छांह जरूर देई, रूपया पइसा त हम नाई दे पाइब लेकिन कन्या हीरा क कनी देत बाटी शादी जरूर करी। लेकिन बाबा माने वाला मनई नाई रहें,उते पइसा क भुखाइल रहलें।आ काकियो लोग कहें की जब कुछ नाई देत बा त ओकरे किहा बिआह नाई होई,एह तरह से केतना बरदेखुआ अइलें आ केतना चलिए गइलें।

लोचन बाबा एक दिन हमरे बाबा से कहलें ,ए भइया बेटा क आइल बिंआह फेरल नाई जाला जवन भाग में होई उ मिली बिआह काहें नाई करत हव। बाबा कहलें ए लोचना तोरे लेखा हम टुटपुजिहा नाई बांटी की सेतिए बिआह क लेई।

आखिरकार एकठो बरदेखुआ एक दिन आइल बोला के हमके देखलस बात चीत होवे लगल बाबा बिआहें के नाही नूही करें लगलें लेकिन उते इनकर मरम जानि गइल,कहलस ए पहुना नाही नूही न करी,रउरे पइसवे न लेबें जीउ नाई न लेंबें हम पइसा से नाई भइल हइ पइसा हमसे भइल ह लेई दस हजार देत बाटी करें के होखें तब करी।
बाबा के मन में इ शादी बइठि गइल, दिन मोकाधराइल, नाच बाजा बर बरात मारे धूम धड़ाका से हमरे बिआहे के तैयारी होवे लगल कुली सर सपराई क के मोकर्र दिन के बड़ी धूमधाम से बरात गइल आ बिआह भइल

होत भिनहिए बिअहवें दुलहिन बिदा भइल आ डोला घरे पहुचलदुआरी पर डोला ज्यो हमार कुली माई देखली की उनके खुशी क ठेकाना नाई रहल।केहू झट दे नहा धो के धार चढावे लगल ,केहू गांव में दुलहिन उतारे खातिर मेहरारु बोलावें लगल ,तमाम मेहरारू जुटली ,मंगल गान के साथें दुलहिन उतारि के घर में आइल,।

अगंना में दुलहिन देखें खातिर मारे मेहरारून क ठकाचा लगि गइल।हमार महतारी मारे खुशी के दुलहिन देखावें खातिर अइलि आ ज्यो दुलहिन के धूधट उठवलि त का देखति बाटी की बेटा से दस साल जेठ मुहे पर झुर्री उड़त बूढ पतोह पवली। मालूम होखे दूं तीन लइका के महतारी है, मेहरारू कुलि अपने में कान फूसी करें लगली। के हूं कहता बेटा अब पतोह नाई मिलल ,के हूं कहता दहेज के ललचि में बाबा लइका बोरि दिहलें,तमाम तमाम बाति मनइन में चलें लगल एतनें नाई दसों दिन नाई बितल की घर में कच्चाइन मचि गइल।हमार दुलहिन खाइल बर्तन धोवें के के कहें न आला तिरून तुरे न उसुकि के पानी पीए, केहूं तनिको बोलें त कटकटा के चढिं बइठें,झगरा में एक नंम्बर क माहिर मिलि गइली।

जो तनिको केहूं कुछ कहि दे त पट्टे इहे जबाब दे।हे हमके केहूं बोलें मत हम कवनो उढार छिनारि के नाई आइल बाटी की केहूं के हुसा सहब,हमार बाप दस हजार रूपया गनलें बा।अउर केहूं के पानी दिहलें के के चलावे महतारी हमार उनकर नोकरानी बनि गइल बा,बाबा दुआरी पर पानी खातिर टर्र टर्र चिल्लाइल करेंलें।दहेजे के ललचि में अइसन मेहरारू मिल गईल की रिन्हल दाना नाई खाएं देति बा।पइसा के लालच में बाबा हमार जीवन बिगडबें कइलें अपनो जान आफति में डारि लिहलें बांटें।

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