चमचागिरी | भोजपुरी कहानी | महादेव कुमार सिंह

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, रउवा सब के सोझा बा महादेव कुमार सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी चमचागिरी , पढ़ीं आ आपन राय जरूर दीं कि रउवा महादेव कुमार सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी ( Bhojpuri Kahani) कइसन लागल आ रउवा सब से निहोरा बा कि एह कहानी के शेयर जरूर करी।

आज के जमाना मे कुछ लोग वफादारी से जादे चमचागिरी पर भरोसा करेलन। चमचागिरी में जे लोग जेतना महारत हासिल कईले बा, लोग के काम उतना ही आसानी से बन जाला। आपन बॉस के चापलूसी करे मे लोग का, का, न करेलन ई सब देखके हमनी के मुकेशजी के गाना याद आ जाला- “तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे, जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे,, अगर कोई अविवेकी साहेब लोग चमचा लोग के घेरा में पङ जातारन तब त चमचा लोगके दिने फिर जाला, लाहे-लाहे चमचालोग साहेब के सीक्रेट (भीतर के बतिया) के जानके खूब फायदा उठावेलन। समय अईसन होला कि नून-हर्रे से लेके दवा-दारू तक आऊर कर कुटुम से लेके वैध-हकीम तक आपन बॉस के लेन-देन से लेके पूरा कुंडली तक चमचा लोग कंठस रखेलन ताकि उनकर वऱतमान आऊरो भविष दूनो खुशहाल रहे आऊर हरियाईली बनल रहे आऊर खूब फले-फूले। चमचागिरी अपना फैदा तक जईसे-तईसे चल सकेला बाकी दोसराके पेटमे लात मारेवाला चमचागीरि सबसे बङ पाप होला।

चमचागिरी के सीमा पार कईला के बाद व्यक्ति समाज के लेल बङ घातक होला। आजके समय में भी केहु-केहु बॉस अईसन बारन कि चमचा के तुरंत पहचान लेतारन आऊर ओकरा से काम से जादे कोई मतलबो नईखे रखतारन बाकी केहु-केहु बॉस (साहेब) के चमचागिरी करावे में भी खूब मजा आवता।

बाकी ई सब खेल जादे दिन तक नईखे चलेला काहे कि चमचागिरीवाला एक्सन (कार्य) आऊर ओकर रिएक्सन (प्रतिक्रया) इंसान के दीमाग आऊर मन के बहुते चोटिल करेला।

चमचागिरी | भोजपुरी कहानी | महादेव कुमार सिंह
चमचागिरी | भोजपुरी कहानी | महादेव कुमार सिंह

ईहे पर एगो कहानी बा कहानी सुनी आऊर भविष में चापलूस सबसे दूरी बनाके रखी। एगो भेदिया नाम के आदमी रहे। बचपने से खुराफाती रहे। ओकर नाम भेदिया पङे के कारण बा, केहु तरह से केहु के पेट मे घूसके ओकर भेद पता कर लेत रहे आऊर इधर-उधर छीटत रहे। जईसे-तईसे मैटिक कईला के बाद ओकराके एगो दफ्तर में काम मिलल। कुछ दिन काम कईला के बाद न जानी कहँवा से चमचागिरी सीख गईल आऊरो चमचागिरी मे अईसन महारत हासिल कईलस कि जब चाहे जईसे चाहे आपन अँऊरी पर आपन बॉस (साहेब) के नचावे लागल।

दफ्तर में ओकर एतना परभाव रहे कि तनिअक लालच देहला के बाद कइसनों ऊलझल ममला के सुलझावे मे कसर न छोङत रहे बाकि ओकर शैतानी दीमाग सुलझल ममलाके ऊलझावे में भी देर न करत रहे। ई सब करम-कुकरम से ओकराके सबसे अच्छा करमचारी के रूप में पहचान बनल आऊर पुरसकारो मिल गईल।

उलटा सीधा हरकत कईके भेदिया खूब ऐश- मौज करत रहे एहु जानत रहे कि ओकर कुकरम के केहु नईखे जानत बाकी ओकर घरवाली सबकुछ जानत रहे पर जईसहीं घरवाली के खोंईछा में महीना के वेतन पङत रहे तब ऊहो मऊन वरत धारण कई लेत रहे। एही बीच भेदिया के सामनेवाला औफिस में एगो नया आदमी बहाल भईल। एक दिन दूनो जब आमने-सामने भईल तब खूब हथमिलोअल भईल, गलबहियाँ भईल ओकरा बाद दूनो खूब एक दोसरा के घर आवे-जाये लागल। समय अईसन लागत रहे कि जईसे दूनो राम-लखनके जोङी बनल बा।

महादेव कुमार सिंह जी
महादेव कुमार सिंह जी

दूनो जहाँ भी जात रहे संगे जात रहे खूब घूमे फिरे आऊर केहु-केहु के गिला-शिकवा बतियात फिरत रहे। एक दिन भेदिया के बॉस (साहेब) से भेदिया के दोस्त के कुछ जरूरी काम पङल। भेदिया के दोस्त सँझिया मे ओकर घर पहुँचल आऊर आपन दुखङा बतवलस। एही बीचे भेदिया के मेहरारू आ टपकल आऊर कहलस- साँझिया के बेरा में कहीं जायके जरूरी नईखे, एतना कहके अंदर चल गईल। दोसर दिन भेदिया आपन दोस्त के आपन बॉस के इहाँ ले गईले ऊहाँ पहुँचके खूब परिचे-पाति भईल।

भेदिया बॉस से कहले- “साहबजी जानतानी ईहो अपने साईड के बारन कबो कोई काम होखे पर तनिक देख लेब”। एतना कहलाके बाद चाह-पानी भईल ई सब देखके भेदिया के दोस्त के खुशी के ठिकाना न रहल, ओकराके लागल कि भेदिया जइसन दोस्त बङ भाग से मिलेला। एही बीचे भेदिया के मन में पाप घूस गईल सोचलस कि साहेब से आपन दोस्त के जान-पहचान कराके अच्छा नईखे भईल। तुरंते आपन दोस्त से कहलस -“तनिक बाहर जा, अबे आवतानी,, एतना सुनला पर भेदिया के दोस्त के माथा ठनकल सोचलस कि कुछ त गङबङ बा! तब धीरे से बाहर निकल गईल आऊर कोना मे खङा होके भेदिया के दोमुहाँपन के समझे के परयास कईलस।

भेदिया के दोस्त के अईसन महसूस भईल कि भेदिया आपन साहेब के कहता कि- “साहेब जी हम त अईसही आ गईनी ह, अभी जौना आदमी आईल रहे बङ उदंड टाईप के बा, अईसन के मदत कईला से कऊनो फायदा नईखे, बङ परशान कईले रहे एही खतिरा आ गईल रही।

भेदिया के दोस्त जब भेदिया के बात सुनलस तब ओकर तरबक लहर कपार पर चढ गईल। धीरे से ऊहाँ से निकल गईल आज ओकराके अपने आप पर बङ शरमिंदगी महसूस भईल आऊर तबे से लऊटके फेर कबो भेदिया के पास नईखे गईल। कबो आमना-सामना भईला पर भी अईसन लागत रहे जईसे कि दूनो के बीच दूर-दूर तक के कोई जान-पहचान नईखे। ई बात सौ आना सच बा कि चमचागिरी से भी जादा खतरनाक दोमुँहापन होला, बाकी जेकरा में दूनो अवगुण होई महा- शातिर आदमी होला। आज भेदिया के पाँचो अँऊरी घी में बा, पढल-लिखल आदमी ओकरा से दूरी बनवले बा लेकिन कुछ लोग अईसन बारन जे भेदिया के खूब गुणगान करेलन।

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