हमार बबुनी | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आयीं पढ़ल जाव संजीव कुमार जी के लिखल भोजपुरी कहानी हमार बबुनी , रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं, अगर रउवा संजीव कुमार जी के लिखल भोजपुरी कहानी अच्छा लागल त शेयर जरूर करी।

गीता के माई,गीता के बड़ी लाड़ प्यार से पलले रहली, गीता जब बड़ भइली त उनकर पढ़ाई के चिंता होखे लागल, चुकी उ गरीब रहली त प्राइवेट विद्यालय में पढ़ावे के क्षमता गीता के बाबुजी, रामाज्ञा भगत के लगे ना रहे, त गीता के माई राजमुनी बड़ी परेशान भ गईली। दुनु जाना एक दिन राय कइके प्राइवेट विद्यालय में गइल लो, की तनी पूछ लियाव, केंगान एडमिशन होई। स्कुल में गईल लो त देखल लो कि 10 गो लइका क्लास रूम के बाहरी खड़ा बाड़न, त रामाज्ञा भगत पूछ दिहलन की सर जी ई लोग काहे बहरी खड़ा बालो। सर जी कहनी की ई सब 4 माह से फीस नइखन सन देहले।

“सर जी, त फी ओकरा गार्जियन से नु मंगाई”,रामाज्ञा कहलन।

“सब, लइका, गार्जियन एके है, ई दिन भर बाहर खड़ा रहेगा तब फी लाके देगा”

“सर, जी त एकनि के पढ़ाई त डिस्टर्ब हो जाई”

“होइ त होइ”

ई बात सुन के गीता के बाबुजी अउर उनकर माई के बड़ी अजीब लागल। ऑफिस में गईल लो, प्रिंसिपल साहब, एगो नवयुवक रहलन, उनकरे बगल में एगो मैडम जी बईठल रहली, पुछली की क्या बात है बताइये।

“रउआ दुनु लोग के परनाम करत बानी, हम रामाज्ञा अउर ई हमर मेहरारू राजमुनी, हमनी के एगो लईकी बिया, गीता ओकरे पढावे के बा, त एडमिशन के बारे में पूछे के रहल ह”

हमार बबुनी | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह
हमार बबुनी | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह

“अच्छा, त एगो बात जान ल, ई अंग्रेजी स्कुल ह, इहा तहार भोजपुरी ना चली, आ सुनss.. एडमिशन के फी 5000 रुपया एक बार मे लगी, और किताब अलगे से खरीदे के पड़ी, ड्रेस, टाई बेल्ट खरीदे के पड़ी और हर महीना 500 रुपया के फीस भी लागी, काल लेके अईह..एडमिशन हो जाई”

“अच्छा ठीक बा”

ई सब सुन के रामाज्ञा अउर राजमुनी परेशान हो गईल लो, लइकन के फी खातीर बहरी खड़ा देख के, ई सोच के की तनियो स लस नइखे ई सर अउर मैडम के बोली में , हमनी के बच्ची एतना कोमल बिया उ त डरे डेरा जाइ, ओकरा त बड़ी दिक्कत होइ, हमनी के हेतना प्यार से रखेनिजा, इहवाँ त उ प्यार दुलार ना मिली, सबसे बड़ बात की हमनी भिरी ओतना रुपया भी नइखे, इहे सोचत चल जात रहे लोss…

रास्ता में संजीव सर मिल गइनी। रामाज्ञा आपन सब परेशानी बतवलन। त संजीव सर कहनी की ठीक बा गीता के तू आपन गांव में सरकारी मिडिल स्कूल में पढावss, कौनो दिक्कत ना होइ,लेके काल विद्यालय जा…।

बड़ी सोच विचार के, हिम्मत कइके,राय कइल लो कि बेटी के सरकारी विद्यालय में पढावल जाव, गांव अधिकतर लोग के लइका प्राइवेट में जा सन।गीता के लेके उनकर माई बाबुजी, गांव में सरकारी मिडिल स्कुलिया में ले गईल लो। गांव में एगो सरकारी मिडिल स्कूल रहे, ओहिमे 6 गो शिक्षक रहे लो, एगो मैडम भी रहली, स्कूटी से आवस।
विद्यालय में गईल लो, सब केहुये व्यस्त दिखल, केहु क्लास में बा, त केहु ऑफिस में।

धीरे धीरे हेडमास्टर साहब के रूम कियोर गईल लोss.., गीता भी संगे रहली। हाथ मे स्लेट और पिन्सिल।

सौरभ प्रसाद ओहिजा के प्रधानाध्यापक रहनी।

” सर जी, रउआ के प्रणाम करतबानी” “परनाम, आई बईठी” तीनो जाना आफिस में बईठल लोss.. हेड सर पुछनि की बोली का बात बा।

“सर ई हमर, बेटी गीता बाड़ी, इनके पढावे के बा, इनकर एडमिशन खातिर, आइल बानी”

हेड सर अपना कुर्सी पर से उठ गइनी, बच्ची की ओर मुस्कुरा के देखनी, पुछनि की बाबु तहार का नाम ह।

तोतला आवाज में गीता कहली, “गीता”

बहुत बढ़िया नाम बा, हेड सर बच्ची के एगो बिस्कुट के पैकेट दिहनी, कहनी की ठीक बा इनकर नाम लिखा जाई।

तनी हिम्मत कर के रामाज्ञा पुछलन की सर फीsss…।

हेड सर कहनी की कौनो फी नइखे, इनकरा हर साल किताब मिल जाई, इनकरा हर साल छात्रवृति भी मिली अउर रोज दोपहर में इनका मध्यान भोजन भी मिली, अउर सबसे बड़का बात की प्रशिक्षित शिक्षक से इनकरा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिली। आ एगो अउर बात इहवा आपन मातृभाषा में छोट बच्चन के शिक्षा दिहल जाला की उ बच्चा जल्दी से सब कुछ सिख लेवे, एहिजा छड़ी के प्रयोग ना होखेला।

हेड सर, हेमलता मैडम जी के बुलवनी, कहनी की गीता के पहिला क्लास में ले जाई, आज गीता के पहिलका दिन हवे।

मैडम जी गीता के क्लास में ले गईली, सब बच्चा से गीता के परिचय करवली, और तीन ताली से गीता के स्वागत भइल

रामाज्ञा और राजमुनी ई देख के बड़ी संतोष कईल लो…।

मन ही मन संजीव सर जी के भी धन्यवाद दिहल लो..।

गीता अब बड़ होखत रहली, गीता पढ़े में तेज रहली, हर काम के बारीकी से करे के अनुभव भी होखत रहे, एक दिन गीता के माई के तवियत ज्यादा खराब हो गइल, त सबेरे खाना ना बन पाइल, राजमुनी परेशान रहली, की खाना कईसे बनी, तले देखली की गीता खाना बना रहल बानी, जल्दी से बना के , माई के खिला के अउर दवा देके स्कूले चल गईली। रामाज्ञा खेत से घरे अइलन त सब देख के आंख से आंसू आ गईल,खुशी भी भइल की बिटिया समझदार हो रहल बाड़ी। सोचे लगलन की बगल के घर मे बाड़ू किहा,उनकर मेहरारू बीमार रहली त उनकर लइका,लईकी कौनो उनके खाना बना के ना खियवल सन अउर ना देखरेख कइल सन, काहे से की उ प्राइवेट में पढ़े वाला बच्चा बालो, ई सब सोच के गर्व भी रहे कि उनकर गीता, सरकारी विद्यालय में ही ठीक बाड़ी, हमार बबुनी पढ़ाई के संगे संगे संस्कार भी सिख गईली….।

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