दीपक तिवारी जी के लिखल भोजपुरी कहानी किस्मत बदल गइल

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कब बुझी लोगवा जाने कब लोगन का समझ में आई कि सभ अपने हँ, मिल के रहे के चाँही।एक दोसरा प कबो भी कवनो भी हाल में हस्तक्षेप ना करे चाँही।

हीन दिन ना समझs केंहूँ के दूबर पातर,
सभके समय आवेंला देई के तनि आतर

ए जिनगी के कवनो भरोशा नइखे कब कहाँ ई धोखा दे दी,ई केंहूँ नइखे जानत, केंहूँ आज ले जान ना पावल ना कबो जान पाई अपना किस्मत के बारे में। एगो छोट गाँव में नंद किशोर रहत रहले अपना परिवार के संघे खुँश रहले, मेहनत मजदूरी क के आपन आ अपना परिवार के दु बेरा के रोटी के जुगाड़ क लेस कइसहुँ।

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केंहूँ तरे नंद किशोर के जिनगी बहुत बढियाँ त ना बाकी ठीके ठाक कटत रहे बाकी गाँव के कुछ लोगन के इहो ना देखल जाव की कइसे ई आपन घर परिवार चलावत बाड़े खैर कवनो बात नइखे सभ गाँव मे कुछ अइसनो लोग होले जे दूसरा के खुँशी देख के जरे ले। “ए बात के नंदकिशोर प कवनो असर ना रहे अपने काम मे व्यस्त रहस”

लोगन के आदत हँ बुराई कइल,
कहाँ सभका फिदरत में बा भलाई कइल

दुगो उनकर लइका रहलसन अजय आ विजय अउरउनुकर धर्मपत्नी सुशीला नाँव जइसन रहे ओइसन उनुकर रहन शोभाव भी रहे, अपना लइकन के पेयार अउरी अपना पत्ति के बहुत सेवा करस,घर के अपना सहेज के राखस,अपना दुनु लइकन के नंदकिशोर पढ़वे प बड़ा जोर देस कहस हम त ना पढिंनि त खेतीवारी करत बानी कम से कम हमार लइका त पढ़ लिख के बड़ आदमी बनsसन।

दीपक तिवारी जी
दीपक तिवारी जी

लइकन के भी पढ़े में बड़ा मन रहे, लगन के साथ अजय अउरी विजय मन लगा के पढ़ाई करे लो,बाप के सपना के पूरा करे खतिरा रात दिन एक क देले रहेलो खाली ओहि प धेयान रहे।

लगन रहे पढ़ाई में पढ़
लिख के कुछो बने के,
कठिन परिश्रम होत रहे
रात दिन दुनु जने के

आ एने नंदकिशोर जिउँ खराब भइला के बादो भी खेत में काम कइल ना छोड्स,उनुकर मेहरारू कहँस की तनि रउवा आराम करि जिउँ नीक नइखे घरवे रही आ लइकान के खेत में जाएँ दी कुल्हँ काम क के चली अइहsसन त माना कर देस लइको कहस की माई ठीक कहsतारी हमनी के क लिहल जाई रउवा कुछ दिन आराम करि, नंदकिशोर बोल उठलन” तहलो खाली पढ़े में मन लगावलो कुछो नइखे करे के हम केंहूँ तरे क लेब।

दिन गुजरल समय आइल जब नंदकिशोर के बड़ लइका के नौकरी रेलवे में क्लर्क पद प लाग गइल।

ना रहे ठेकाना खुँशी के मन में भरल उल्लास,
नंदकिशोर के लइकन प रहे अटूट विश्वाश

नंदकिशोर के खुँशी के ठेकाना ना रहे आज बहुत खुँश रहले नंद किशोर गाँव में बनल दुर्गा मंदिर में प्रसाद भी चढ़वले….

दाँते अंगूरी काँटे लो बोल मारे वाला,
मुँह से कुछ निकले नाही जइसे लाग गइल बा ताला

ओ बेरा से जे भी उनुका के देख के दूर दुरावत रहे हीन दिन बुझत रहे ओकरा त माने कठयाँ मार दिहलस,,, अब केहूँ भी उनुका ओर हीन नजर से ना देखो सभे सन्न रह गइल रहे बदलत समइया के देख के”

कुछ महीना के बाद छोटको लइका के बहाली हो गइल,,,, मलेट्री में अब नंदकिशोर के घर में पइसा के आवाई के अच्छा स्रोत हो गइल दुनु लइका अपना अपना नौकरी प लाग गइल लो और “एने दुनु वेयक्त आराम के जिनगी जिए लागल लो जिनगी में बड़ा तकलीफ उठवले रहे लो”

भगवान के घर में देर बा बाकी अंधेर नइखे,
उनुका आगे ए दुनियाँ में केंहूँ शेर नइखे

यही से केहूँ के दूबर पातर जान के सतावें के ना चाँही, केकरा भाग्य में का बा केंहूँ जानेला ना देखी कइसे नंदकिशोर के किस्मत बदल गइल।

दीपक तिवारी, श्रीकरपुर, सिवान।

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