विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी परेम-दान

परनाम ! रउवा सब के जोगीरा डॉट कॉम प स्वागत बा, आई पढ़ल जाव विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी परेम-दान , पढ़ीं आ आपन राय जरूर दीं कि रउवा इ भोजपुरी कहानी कइसन लागल आ रउवा सब से निहोरा बा कि एह लघु कथा के शेयर जरूर करी

बिधी सम्पन्न भइल, अब आप ई पिंड नदी हमें प्रवाहित करीं, “श्रीदेव बाबा अपना जजमान दाननाथ जी से कहलें।”

दाननाथ पिंड हाथ मे उठाके नदी के ठेहुन भर पानी मे उतर गइलें आ गंगा माई से गोहार करत कहलें “हे माई ए धरा पर केहू के पुत्र भा पुत्री दिहs त अपना नियन निर्मल मन के दिहs, ना त निस्तानी रख दिहs।” आ पिंड के पानी में छोड़ दिहलें, फिर पाँच डुबकी लगाके बाहर आ गइलें। चारो तरफ बहुत लोग खड़ा रहे। सब केहू एकदम चुपी सधले रहे । चेहरा पर हलुक खुशी रहे सबके लेकिन अखियाँ में एगो कहरत दर्द के पानी भरल रहे।

दाननाथ हाथ जोड़ के सबसे कहलें-“रउवा सब अपना अपना घरे जाईं। हमरा के हेतना समय देहनीं, इहे बहुत बा। दाननाथ अपना पुरोहित के घाट पर ही दान दक्षिना देके बिदा कइलें आ भिजले देह अपना घर की ओर जात पगडंडी पर चल देलें। जस जस कदम आगे बढ़े उनकी आँख से लोर मोती बन टपक जाये। पीछे पीछे पूरा जवार के अदमी रहलें, लेकिन केहू के हिम्मत ना होत रहे कि दाननाथ के समझावे भा उनका के सहानभूति देव।

दाननाथ के कदम अपना घर की ओर जाये से मना करे तबो चलत जास आ उनका भीतरी घुमड़त सवाल उनका के बीतल समय में घिसरावत ले के चल गइल।

दाननाथ नाहीं कवनो मंत्री रहलें, ना ज़मीदार, ना कवनो बड़ अधिकारी। तबो अपना आप में बहुत कुछ रहलें। अस्सी बरिस के पुरनियाँ लेकिन बूढउती तनको ना रहे उनका चेहरा मोहरा पर।छव फुट के जवान अपना जवानी में पहलवान भी रह चुकल रहलें। अपना गाँव के नाँव के झंडा पूरा जिला में फहरा चुकल रहलें। अइसन साइद केहू होइ जे दाननाथ ठाकुर पहलवान के ना जानत होई। उनका समय के केहू अइसन पहलवान ना रहे जे उनकरा से जोड़ ना अजमइले रहे आ पछाड़ ना खइले होखे ।अस्सी साल के होके भी तनको झुकल भा अब्बर ना रहलें।जब माथ पर बड़का गमछा के मुरेठा आ उजर धोती कुर्ता पहिन मोंछ के ताव देत निकलस त सब केहू एक बार जरूर देखे आ सलाम करे।

एगो इहे ले बात ना रहे। अगर केहू दुखी बा त ओकर दुख के आपन दुख समझस आ दोसरा के समस्या के आपन समस्या समझके निदान करस।बड़ त बड़ उनका गाँव के बच्चा सब भी उनकर बहुत इज्जत करसन आ उनका के पहलवान काका कह के बोलावसन।

दाननाथ ठाकुर मध्यम वर्ग के ठाकुर रहलें।पूरा बीस बीघा जमीन रहे,उहे उनकर पूरा जिनगी के कमाई । सब कुछ अपना पुरुसार्थ से कइले रहलें।उनका बस एगो लइका रहे।जवना के बहुत लाड़ दुलार से पालन पोसन भइल। अपना आप खातिर जवन ना कइले तवन उ अपना लड़िका खातिर करस।

उनकर लड़िका जब पांच बरिस के रहे तबे उनका जीवनसंगिनी के देहांत हो गइल।लेकिन दाननाथ दोसर बियाह ना कइलें कि हमरा लड़िका के दोसरकी माई मानी कि ना मानी? गाँव के केहू कहे कि अरे “पहलवान जी रउवा दोसर मेहरी ले आईं। लड़िका के साथे साथे आपोके सेवा करी।”त दाननाथ एकदम से मना कर देस”अरे हम बानी नू अपना परेम खातिर। हमरा से अच्छा एकरा के करी? हमी एकर माई आ बाबू बानी।”

दाननाथ अपना लड़िका के नाम बहुत परेम से परेम रखलें। परेम बचपन से ही लाड़ दुलार में पलल अउर अपना हर ख्वाइस के पूरा होत पइलस। जब अगल बगल के केहू दाननाथ के समझावे त दाननाथ ओकरा के ऐके बात कहस”अरे अभी परेम छोट बा, बड़ होई त सब समझ जाई।

पहलवानी के समय में दाननाथ कहीं पहलवानी जीतल रहलें।उनका पुरस्कार के रूप में दूनाली बंदूक मिलल रहे। हप्ता में एक बार अपना बंदूक के साफ करस आ एगो फाइरिंग के टेस्ट लेस।जब परेम थोड़ा बड़ भइल त दाननाथ ओकरा के बंदूख चलावला से लेके पहलवानी के पूरा दाव सीखा देले ।परेम के पालन पोसन ला दूगो भईं रखलें । जवन पुरहिया रहली सन साल में एगो ना एगो लागत रहे।परेम के चेहरा मोहरा देह के बनावट कद के तरकस एकदम दाननाथ के रहे। जब दाननाथ परेम के देखस त उनुके छाती अउर चाकर हो जाये।

दाननाथ के परेम,परेम खातिर एतना बढ़त चल गइल कि दाननाथ के आँख पर अपना लड़िका खातिर धृतराष्ट्र खानी पट्टी बँध गइल। परेम अपना संस्कार, अपना व्यक्तित्व के राह से अतना दूर हटि गइलें कि खुद के अब नबाब समझे लगलें।

समय के साथ साथ सब कुछ बदलल। दाननाथ के पास अब बहुत कुछ हो गइल रहे।अब एगो नवकर्मिया में जानल जास। लेकिन परेम अपना जवानी के मद में मस्त अपना सब ज़िमेदारी से अनजान सब अवगुन के आगर होत चल गइलें ।

अभी भी पूरा गृहस्थी के भार दाननाथ के ही कान्हा पर रहे। अब दाननाथ परेम के केतनो समझावस लेकिन परेम अपना आगे उनका बात के ना चले देव। एक कान से सुन के दोसर कान से निकाल देव।

चारु ओर से अब परेम के नाव के शिकाइत आवे लागल। लेकिन दाननाथ के अपना परेम पर अनघा भरोसा रहे। आ ई भरोसा के नजाइज फायदा परेम बहुत उठावस । एक तरफ परेम के मनमानी रहे त दोसर तरफ दाननाथ के अदब इज्जत।जवन पूरा गाँव जवार करे।

दाननाथ के पास शिकायत के तादात बढे लागल। दाननाथ के ऐके गो उपाय बुझाइल परेम के बियाह कर देले।अब घर में चहल पहल हो गइल। घर में के पूरा जिम्मेवदारी बसुधा के हाथ में आ गइल।बसुधा ई घर परिवार ला नया रहली।

बसुधा के रंग गेहूवा, बदन छरहरा बड़ बड़ आँख आ कमर कमानी जस रहे। जे एक बार बसुधा के देखे सोचे कि एक बार अउर देख लेतीं। बसुधा सुघर के साथ साथ बहुत तेज चतुर आ संस्कारी रहे। उनकरा आपन ज़िमेदारी के पूरा परख रहे।

बियाह कर के आवत कहीं कि कुछे दिन में घर के बहुत बेवस्थित कइ देलस। सब कुछ के समय बन्हा गइल। सब जगह बसुधा के बड़ाई होखे लागल। गांव के कुल्हिये मेहरारुन के जबान पर ऐके नाव रहे। दाननाथ के पतोहू बहुत नेक बिया। जे भी जाव ओकरा पास ओकर अदब बहुत सलिका से करेले। अरे एकदम गाय बिया, गाय। ओइसन पतोह हमरा मिल जाइत त हम हरिद्वार जाके गंगा नहा लेतीं।

बियाह के बहुत दिन गुजर गइल, लेकिन परेम में तनको बदलाव ना रहे। पहिले से ज्यादा अउर हाथ से बेहाथ होखत जास। उनकर ई रवइया से बसुधा के बहुत दुख होखे लेकिन अपन दुख केहू से ना कहे। केतना बार परेम के साथ बसुधा के झड़प हो गइल।

एक दिन देर रात परेम चुवाठी मार के घरे लड़खडात अइलें। उनका जुबान से कवनो शब्द पूरा ना निकले, शब्द निकले से पहिले आपन दम तोड़ देव।चाहे जवन कहस पूरा ना होखे।बसुधा उनका के ध के कमरा में ले गइली। उनकर कपड़ा बदल के बिस्तर पर सुता देली आ अपना भाग्य के दोस देके रोवे लगली।

जीवन चक्र में केहू अइसन होई जे अपना मन मुताबिक आपन काम भा जीवन जिअत होई। अगर जीवन पुरहर, सुघर होइत त केहू रंक ना रहित। अब ई बसुधा के भाग्य रहे या होनी, ई कहल मुश्किल बा । जवन होखे के रहे हो चुकल, अब आगे देखल जरूरी रहे।

बसुधा आपन पूरा अथाह प्रयास कर लेली लेकिन परेम पे तनकियो असर ना भइल। अब बसुधा परेम से दूरी बनावे लगली आ दुनु बेकत में खटपट चले लागल।ई बात के खबर अभी तक दाननाथ के ना रहे। तब तक बसुधा भी पेट से हो गइल रहली।

परेम के घर परिवार बस एगो ठहराव रहे। रात के रेन बसेरा, देर रात घरे आवास आ होत फजीरे अपना अइयास संघतियन के साथ निकल जास। बसुधा के आपन काम के बस्तु बराबर समझस।लेकिन बसुधा जब से उनकर रवैया से अवगत भइली तब से दूरी बन गइल आ अब त पेट से रहे।

परेम के संसर्ग बहुत गलत लोग से हो गइल रहे। अब दाननाथ भी धीरे धीरे समझ लेले रहलें कि परेम गलत राह पर चल गइल बा। परेम के बियाह ओकर जिम्मेदारी बढ़ावे खातिर कइले रहलें। ताकि परेम आपन जिम्मेदारी समझी आ सुमार्ग पर आ जाई आ सब कुछ ठीक हो जाई।

परेम के करनामा अब अखबार में छपे लागल अब परेम पहिले वाला परेम ना रहलें। अब लूट, चोरी, छिनैती, डकैती, बहुत कुछ रहे जवन गिरोह में सामिल हो गइल रहलें। देर सबेर कबो कबो उनकर गिरोह के बसेरा अब उनका घरे होखे लागल। ई बात उनका बाबू जी के पता ना रहे।

गांव,जवार, पूरा जिला अब परेम के नाम से डेरात रहे। केहू अब सिकाइत ना करे जाव दाननाथ के लगे। सरकार परेम के माथ पर इनाम भी रखले रहे। लेकिन परेम के डर अइसन समाइल रहे सब के देह में, कि सब केहू नाम तक ना लेव।
परेम आ उनकर गिरोह के लोग लूट के साथ साथ अब्बर के बहू बेटी के आबरू लूट लेव लोग।

अब फागुन चढ़े वाला रहे।चहूँ ओर फागुन अपन रंग बिखेरत रहे।सब कोई होरी के तैयारी में लागल । लेकिन बसुधा के मन के रंग कहीं अउर हेराइल रहे। उ अपना आप में हेराइल रहली कि दाननाथ अंगना में आके खोखलें। बसुधा के धेयान भंग हो गइल। हड़बड़ा के उठली, अपना माथ पर लूगा सरिहा के कहली-“अरे बाबूजी का बात बा, कुछो चाही का?”
दाननाथ अपना अंदर गम्भीर साँस खींच के कहलें- ”बेटी हमरा कुछो ना चाहीं, हम बस तहरा से कुछ कहे अइनीं हँ। हम तहरा के परेम के बारे में पहिले ना बतइनीं । हमरा विस्वास रहे परिवारिक सुख पाके आपन सही राह पकड़ ली। लेकिन हमार सोच गलत साबित भइलहम तोहार गुनेहगार बानीं, माफ कर दिहअ।”

एतना कह के दाननाथ आपन दुनू हाथ बसुधा के सामने जोड़ दिहलें। बसुधा दउड़ के दाननाथ के गोड़ पकड़ लेली अउर लोर के धार फूट परल।रोअत रोअत कहली- ” ना बाबूजी ना, ई पाप हमरा पर जिन चढ़ाईं। ई हमर पिछला जनम के पाप ह जवन ए जनम में पूरा होता।आप हमरा सामने हाथ मत जोड़ीं, ना त हम ई भार ना सह पाइंम।हमरा के आशीर्वाद दीं कि हम अपना आवेवाला के ऐजा से कहीं दूर ले जाके पालन पोषण करीं। हम ई नवजीवन के उनका परछाई के छाया तक ना पड़े दीं।””

दाननाथ बसुधा के उठा के लोर पोछत कहलें-”ठीक बा बेटी। जब तहार इहे इक्षा बा त हम तहरा के ना रोकम। हमके ई मौका देके बहुत उपकार कइलू। हम तहरा के काल इस्टेसन पर छोडवा देम।तू जहाँ जाए के चाहत बारु ओजा चल जइहs। लेकिन हँ, ए बूढ़के खबर करत रहिया कि हमरा अपना कुलदीपक के पता लागत रही।एतना कहके दाननाथ दुअरा चल गइलें।

बसुधा इहे उधेड़ बुन में रहले रह गइली कि उनकर ई फैसला सही बा कि गलत। का अपना आपसे हार चुकल रहली भा परेम के दुराचार से।इहे सोचत में पता ना चलल कि कब साझलवका हो गइल आ घर में दिया बारे के बेरा।

हर दिन से अलग आज ई साँझ लागत रहे। बसुधा रह रह के सहम जास,उनका लागे कि केहू उनका के जबरन पकड़त बा, कहीं खींचत बा। साँझ के दिया जरल, अँजोर भइल।खाना के तैयारी में बसुधा लाग गइली।अभी बसुधा चार माह के पेट से रहली।

रोज के समय पर बसुधा खाना बना के तैयार कर देली आ दाननाथ के खियाके अपने खा लेली। सब कोई सुते ला अपना अपना कमरा में चल गइल। बसुधा भी अपना कमरा में जाके डिबिया के अचरा से बुता देली आ पलंग पर लेट गइली। अब चारु ओर सन्नाटा के पहर शुरू भइल। हर केहू अपना अपना घर में बन्द बा।

अचानक बसुधा के कुछ आवाज सुनाई देलस, भौचका सा उठ बइठली आ डिबरी के दियासलाई से जला देली। डिबरी हाथ में लेके जब आंगन में अइली त सामने परेम आ उनकर गिरोह के दुगो आदमी साथ में खड़ा रहे। आंगन में डिबरी के प्रकाश पूरा आंगन के अपना सीतल परकास से भर देलस। बसुधा परेम से बोलली-” आज ई रस्ता कइसे इयाद आ गइल ह। बोलीं, आपके हम का सेवा कर सकत बानीं?”

परेम अपना मुँह पर लपेटल करिया कपड़ा हटा के कहलें-” अरे कम से कम आज त कटाछ ना बोलs साथ में कुछ साथी बारे।ई राह से गुजरत रहीं त सोचनीं मिलत चलीं त आ गइनीं आ तू ताना मारत बारू।”

बसुधा अपना बात में थोड़ा भाउकता लिया के कहली-” जब एतने लाज बा त ई काम, ई गिरोह छोड़ काहे नइखीं देत? ऐसे का आपके चाहे आपके बाबू जी के नाव ँच होता। बाबू जी कवना दौर से गुजरत बानीं, ई रउवा पता बा?””

अपना कमरबन्द से एगो बिलाइती ठर्रा निकाल के दू घूँट से गला के तर कइला के बाद परेम बसुधा के पास जाके कहलें-“” तहरा मालूम बा ई अइसन राह ह जवना पर पीछे हटे ला कवनो राहे नइखे। ई खाली आगे जाला पीछे अइला पर यमराज खड़ा रहेलें। जवन की सीधे ऊपर ले जइहें।”परेम फिर दू घूँट मारत बा,तब बोलत बा।”ई कुल बात छोड़अ, हमनी खातिर कुछ खाये के बना द, तब तक हनी बइठत बानीं जा।अच्छा ह तनी कुछ तियना भा नमकीन देदs ना तब तक गला तर कर लीं जा।”

बसुधा अपना पल्लू से आपन नाक दाब के बोलल-“ठीक बा ठीक बा, हम नमकीन देत बानीं, आप बइठीं। आपके सामने साँस नइखे लेहल जात। हम कुछ खाये के बना देम आप लोग खा के जाएम।

बसुधा नमकीन लावे अंदर चल गइल। आंगन के बीचों बीच परेम अपना गिरोह के दुनू आदमी के साथ बइठ के मदिरा सेवन करे लागल।जब बसुधा नमकीन ला के देली त परेम के एगो साथी बसुधा के हाथ पकड़ लेलस। आ अपना तरफ खींच के कहलस।”ऐ नयन कटारी अपना हाथ से दू घूँट पिया देतू।त ई रात हमरा ला अमर रात हो जाइत।तोहर ई चंचल नयन के वार हमरा करेज में बहुत पहिले से लाग चुकल बा।आज अपना हाथ से तू हमर मरहमपट्टी कर द।”

जब बसुधा के हाथ परेम के साथी पकड़लस। त बसुधा के ठकुवा लाग गइल। निशब्द चेहरा पर भय के पसीना।शरीर में एगो अजीब सा कम्पन होत रहे।फिर भी बसुधा हिम्मत जुटा के बोलल- “अरे तोहर ई मजाल जे तू हमर हाथ पकड़ लेले।” परेम के धिधकार के कहलस-“वाह रे वाह, तहरा सामने तोहर मेहरी से केहू बदसलूकी करत बा आ तू अपना मदिरा पान में मस्त बारअ। तहरा नीयन कुलकलंक के सुहागिन कहइला से अच्छा बा कि हम मुसमाति कहइतीं।”

परेम ई शबद सुनके सह ना पावल जोड़ के एगो तमाचा बसुधा के गाल पर जड़ देलस आ बिदेशी हलब के दू घूँट अपना गला के नीचे उतार के कहलस-“का कहत बारे तू? अरे तोर हर दिन के काँव- काँव? हमर माई बनल चाहत बारू? जवन कहबू हम ना करब? जब अपना बाप के हम ना सुनीं त ते कवन हइस? अरे तनी हमरा साथी के मनोरंजन कर देबे त तोर का घट जाइ? ओकर नजर में हमर इज्जत अउर बढ़ जाई।चुप चाप जवन कहे, कर ना त आज तोर रोज के काँव काँव कइल छोड़ा देम।” बसुधा के जबान पर कवनो शबद ना रहे। अब खाली आँख आपन जोड़ अजमावत रहे उहो, अपना अनमोल मोती से।

दाननाथ बाहर के दलान में सुतल रहलें। सोर गुल सुनके उनकर आँख खुल गइल रहे। आपन दूनाली लेके बाहर के दरवाजा पर कबे से ई सब कांड के देखत अउर सुनत रहलें। अब उनका केहू के प्रमाण के जरूरत ना रहे।अब गवाह उहे रहलें आ जज उहे।बंदूख तान के खड़ा हो गइलें आ परेम से कहलें- “परेम, खबरदार तू अपना साथी से बोल कि हमरा पतोहू के हाथ छोड़े।ना त ठीक ना होई।”

अचके में दाननाथ के अपना सामने खड़ा देख परेम के कटले देही में खून ना रहे।उनका मुँह से एक शब्द ना निकलल।उनका दूसरा साथी परेम के हिम्मत बढ़इलस।”अरे परेम, आज बुढ़ऊ के मार दे रोज रोज के झंझट तोहर छूट जाइ,आ तू आजाद हो जइब।”

जब परेम अपना साथी के साथ घर में दाखिल भइल त सामने के दरवाजा खुलल ही छोड़ देले रहे।एहीसे दाननाथ के आवे के हरकत सब के ना मिल पावल।आज दाननाथ के सामने पूरा सचाई आपन आँख खोल के खाड़ रहे।

परेम अपना साथी के हिम्मत पाके उठ खड़ा भइल आ अपना साथी से कहलस-” तू सही कहत बारे। आज ई दुनू के खेल खतम कर देत बानीं कि केहू रोके टोके वाला ना रही।आउ ते हमर हाथ बटाव तब देखत बानीं ई हमर बाबू हमरा पर कइसे तमंचा चलावत बाड़ें?”

दाननाथ परेम के फिर सावधान कइलें, लेकिन परेम ना मानल आ परेम के दुसरका साथी बहुत तेजी से दाननाथ की ओर बढ़ल। दाननाथ के कब अंगूरी घोड़ा पर दबल ना समझ पवलें।ठाँय-ठाँय के दू बार आवाज उठल आ सब जगह गहिरा सन्नाटा छा गइल।परेम के पहिला साथी बसुधा के हाथ छोड़ बेसुध होके भाग निकलल।

अब रात जवान हो गइल रहे। चारो तरफ के अन्हार दाननाथ के घूर के देखे। झिंगुरन के आवाज़ में संखनाद होखे लागल।गाँव में सब के दू बार ठाँय ठाँय के आवाज़ से नीन्द टूट गइल। सब केहू आपन आपन लालटेन लेके आवाज के ओर भागल। जब सब केहू दाननाथ के आंगन में आइल त कुछ कहे जोग ना रहे।

बाबूजी ई लीं गमछा, धोती।आपन धोती बदल ली ना त तबियत खराब हो जाई। अचानक ई आवाज दाननाथ के कान में पड़ल।त उनकर चेतना लउटल आ अपना आपके दुआर पर बसुधा के सामने पवलें। आज बसुधा के चेहरा पर गर्व के चमक रहे।मांग सुन रहे लेकिन ओकर मुख चमकत रहे। दाननाथ ई देख के मन ही मन खुश भइलन आ जब पीछे मुरले त पूरा गाँव जवार उनकर जय जयकार करत लउकल ।।

विवेक सिंह, पंजवार, सिवान

ध्यान दीं : इ भोजपुरी कहानी पाहिले सिरिजन तिमाही भोजपुरी ई-पत्रिका के तीसरका अंक में प्रकाशित हो चुकल बा

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