अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा लीलार

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प , रउवा सब के सोझा बा अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा लीलार ( Bhojpuri Laghu katha Lilar) , पढ़ीं आ आपन राय जरूर दीं कि रउवा अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी लिखल भोजपुरी लघुकथा (Bhojpuri laghu katha ) कइसन लागल आ रउवा सब से निहोरा बा कि एह लघुकथा के शेयर जरूर करी।

सात बरिस से ई बस स्टैंड में हम होटल चलावेनी बाकिर एहिसन करारा जवाब हमरा कबहूं सुने के ना मिलल रहे।

बुढ़िया के लीलार पर दर्जन भर से बेसी लकीर आ पचकल गाल देख के हम कहनी – रहे दीं चाची, पईसा मत दीं। एतना बात सुनके बुढ़िया चाची भड़क गईली।

अरे बबुआ, तु पिछलो बेर हमसे पईसा ना लिह लऽ। केतनो कहनी,आ फेरू कहऽ ताड़ऽ पईसा ना लेहब। ई तरीका ठीक नईखे। तोहरा पईसा लेवे ही के पड़ी।

अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी
अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी

हम भिखारी थोड़े बानी, जे तोहरा से खैरात खाएब। जबले गोड़ हाथ में जांगर बा, तबले त मेहनत मजूरी कईए के खाएब। जब जांगर पांजर थाक जाई त ओह बेरा देखल जाई।

बुढ़िया चाची के बात सुनके त हम ठकुआ गईनी। अच्छा चाची, मत खिसिया। दऽ पैसा दऽ।

ममोराईल चमोराईल दु गो दस टाकिया अपना अंचरा से खोल के देहली। तीस के जगेह बीसे रुपया देख के हम धीरे से रख लेहनी।

एगो बात पूछीं चाची, खिसिअईबु ना नू! ना बबुआ, काहे खिसियाईब!

ई बतावऽ तु हर अतवार के कहां से आवे लु आ कहां जालू! बबुआ,

बेटी के बियाह गांवे में कैईले बानी। दामाद बाहर कमालन। बेटी के भाग से उनकर बियाह निमन घर में हो गईल रहे।

ऐहिजा सहर में रहके अपना लईकन के पढ़ावे ली। हमार एतने काम बा कि हर अतवार के गांव से सर समान, रासन पानी ले आ के ईहां पहुंचा गईल।

एकर मतलब बा चाची के तु अपना बेटी ईहां रहे लू!

हं बबुआ, रहेनी त बेटी के ईहां बाकिर खानी हम आपन कमाई।

लकड़ी से लेके नून तेल चाउर दाल तियूना तरकारी के जोगाड़ खातिर लोगन के खेत में मजूरी करेनी। जिनगी बड़ा आराम से कट रहल बा।

मतलब, बेटी ना खियावे ली।

नाही ऐसन बात नईखे। तऽ बहुते जोर जबरदस्ती करेली, बाकिर माई बाप खातिर बेटी के अन्न खाईल पाप होला हो । ओहऽ समझनी, आ- बेटा लोग नईखे?

दु जाने बा लोग, राम लक्षुमन खानी, बाकिर एगो बुढ़ महतारी के बोझा ढ़ोवे में लोग के सकान नईखे हो पावत।

दुन्नो जाने आपन आपन मेहरी के बात मान के हमरा के घर से निकाल दिहल लोग। दुन्नो पतोहन के ई सक रहेला कि हम बुढ़ के छोड़ल रूपया पैसा, चोरा लुका के अपना बेटी दामाद के दे देहले बानी।

तू ही बतावऽ बबुआ, दोसरा के खेत बारी में मजूरी करे वाला, मरला के बाद कहीं रूपया पैसा छोड़ के जाला !

बुढ़ त मरे के बेरा ले, सेठ ईहां से हमार छागल ना छोड़ा पऊलनऽ, जौन उनकर बेमारी में बान्हे रखाईल रहे।
आ चल दिहलन हमरा के नरक में छोड़ के अपने सरग में।
हम बेटी दामाद के कहां से रूपया पैसा दे देनी!

रोज रोज पतोहन के गारी सुनला से बढ़िया बा मेहनत मजूरी कई के आपन जिनगी काट लेहल। अपना गट्टा के कमाई खानी आ बेटी के दालान में सुत रहेनी।

एतना कहके बुढ़िया झोरा बोरा ऊठाके चल देहली। आ जबले अलोते ना भइली, हमार आँख उनके गइल निहारत रहे।

अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी के के अउरी रचना पढ़ें क्लिक करीं

Leave a Reply