अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा महतारी के दुआ

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प , रउवा सब के सोझा बा अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा महतारी के दुआ ( Bhojpuri Laghu katha Mahtari ke dua) , पढ़ीं आ आपन राय जरूर दीं कि रउवा अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी लिखल भोजपुरी लघुकथा (Bhojpuri laghu katha ) कइसन लागल आ रउवा सब से निहोरा बा कि एह लघुकथा के शेयर जरूर करी।

गाजी मियां एगो छोट किसान बाड़न। गरीबी के चलते उनकर माई बाप उनकरा के पांचवा किलास से आगे ना पढ़ा पावल लोग। बाकिर अपना लईकन के पढ़ावे खातिर हर दुख मुसीबत सहे के तैयार रहलन।

पट्टी पट्टिदार से ले के पास पड़ोस के घर से हर दू चार दिन पर गोश्त के ख़ुशबू आवेला जेकरा के मन मसोस के बर्दाश्त करे के पड़ेला। ग़ाज़ी मियां तरकारी भात खा के अपना लईकन के पढ़ावे के ईरादा पर कायम रह गईलन आ बड़का लईका के मैट्रिक फर्स्ट डिवीज़न से पास करा लिहलन।

अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी
अब्दुल ग़फ़्फ़ार जी

शहसवार बाबू जब मेट्रिक के इम्तिहान पास कर लिहलन त ग़ाज़ी मियां के मन में उनकरा के इंजिनियर बनावे के सपना जागल। शहसवार बाबू बचपने से पढ़े में बड़ी तेज रहलन, ऐह लिए उनकर अब्बा जी के सपना पूरा होखे में कौनो दिक्कत ना भईल।

जब शहसवार बाबू इंजीनियरिंग पढ़ के अईलन त घर भर के लोग बड़ी खुश भईल की शहसवार बाबू इंजीनियर बन गईलन! अब खुबे रुपया कमैहन आ आपन अब्बा जी के सपना पूरा करिहन।

शहसवार बाबू घरे आवते कहलन- अब्बा जी हमरा कलेक्टर बने के शौक बा। हम यूपीएससी के तैयारी खातिर दिल्ली जाए के चाहत बानी।

उनकर अब्बा जी ई बात सुनके ठकुआ गईलन! आ सोच में पड़ लगलन की केतना दुख मुसीबत काट के त इंजीनियर बनौनी, अब ई कलेक्टर बने के कहत बाड़न! अब फेरू एतना रूपया के इंतज़ाम कहां से होई।

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ग़ाज़ी मियां शहसवार बाबू से पुछलन- कलक्टर बने में केतना रूपया लागी हो बबुआ!
शहसवार – लगभग एक लाख सालाना।
ग़ाज़ी मियां – आ केतना साल लागी!
शहसवार – दु से तीन साल।

ग़ाज़ी मियां मन में सोचे लगलगन की अब कौन ऊपाय होई! कहलन -ठीक बा, तु दिल्ली जाए के तैयारी करऽ, रूपया के चिंता हमरा पर छोड़ दऽ। ईरादा नेक बा त अल्लाह के मदद ज़रूर होई!

ग़ाज़ी मियां रात भर करवट बदलत रह गईलन बाकिर नींद ना लागल।
बिहान भईला सीधे बैंक में गईलन आ बैंक मैनेजर से सगरी बात बतऊलन –
बैंक मैनेजर कहलन की लोन त मिल जाई बाकिर घर बंधक राखे के पड़ी।

सर, हमरा लगे चार कोठरी के मकान बा, ओकरा के बंधक राख के केतना पैसा मिल जाई!
बैंक मैनेजर – चार लाख
ग़ाज़ी मियां – चलीं तब त काम डगर जाई। राऊर बहुत बहुत शुक्रिया।

शहसवार बाबू अपना मेहनत आ मालिक के मर्ज़ी से दूसरके साल यूपीएससी के इम्तिहान पास कर लिहलन।
ई खबर सुनके घर से लेके गांव तक ख़ुशी के लहर दौड़ गईल।

कामयाबी में घर भर के लोग आपन आपन भागीदारी जतावे लागल।
लेकिन सबकर दावा शहसवार बाबू के अम्मी के सामने धरल के धरल रह गईल, जब अंचरा के कोना से आंसू पोंछत कहली –

बबुआ के मैट्रिक के इम्तिहान से ले के, ई कलक्टर वाला इम्तिहान तक, कौनो अईसन रात ना गुजरल होई, जब हम तहज्जुद के नमाज में अल्लाह के सामने बबुआ के पास होखे खातिर दुआ ना मंगले होखीं।

एगो महतारी के दुआ—ऊहो रात के तहज्जुद में—अल्लाह कबहूं ना ठुकरैहन।

घर के सगरी लोग ई सुनके अवाक रह गईल!

बाप के सगरी जद्दोजहद महतारी के दुआ के सामने बौना साबित हो गईल!

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