भोजपुरी लघुकथा बहाना : संगीत सुभाष

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फुलेसर का अपना हरवाह के हाव – भाव देखिके अन्दाजा हो गइल रहे कि ई हमार हरवाही छोड़िके, इहाँ से दूसरा जगह जइहें। खेतिहर मजदूर की कमी का चलते फुलेसर का चिन्ता हो गइल रहे कि जदी हरवाह छुटि जाई त फिनु मिली कि ना? एही से ओहिदिन रोटी में घीव लगाके, अँचार, सब्जी, दही, नीम के दतुअन आ बाल्टी भर पानी पनपिआव खातिर ले के हरवाही में गइलें।

हरवाह हर चलावल रोकिके अइलें आ दतुअन करे लगलें। उनुका भागे के बहाना चाहत रहे, एसे दतुअन कइला का बाद ए तरे थुकसु कि फुलेसर का देहि पर परि जा। फुलेसर कुछ ना बोललें। अब हरवाह जानिबुझि के ए तरे थुकलें कि आधा थूक फुलेसर का देंहि पर आ गइल। फुलेसर का मनहीं रीसि त हड़ाहे बरल लेकिन बरदास क के कहलें-‘ए मरदवा! तहार थूकवा त बड़ा शीतल बा हो?’

हरवाह पैना फेंकत कहलें-‘त लS, जेकर थूक गरम होई ओकरे से हर चलवा लिहS।’
हरवाह चलि गइलें आ फुलेसर टुकुर- टुकुर उनुके जात देखत रहि गइलें।

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