भोजपुरी लोक कथा बाँट-बखरा

भोजपुरी लोक कथा बाँट-बखरा सुशीला पांडेय जी के लोक कथा संग्रह वेलबन्ती रानी से लिहल गइल बा। एह कथा में एगो बात के सन्देश मिलता कि बेईमानी ढेर दिन ना चले ला। रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं, अगर रउवा भोजपुरी लोक कथा बाँट-बखरा अच्छा लागल त शेयर आ लाइक जरूर करी।

एगो गांव में दू गो भाई रहन स । बड़का बहुत बदमास आ धूर्त रहे । छोटका बहुत सीधा रहे।

जब दूनो भाई अलगा भइलन स त बड़का सब चीज के बाँट-बखरा लगवलस। कहलस कि “गाय के मुँह तोहार रही, पीछा के धड़ हमार रही। कम्मर दिन में तोहार रही, रात में हमार रही। गाछ के जड़ तोहार रही, डाढ़-पात आ पुलुई हमार रही। खेत में जोतल-बोअल तोहार रही आ फसल के जड़ तोहार रही, ओकर पुलुई आ फरल अनाज हमार रही,’

भोजपुरी लोक कथा बाँट-बखरा
भोजपुरी लोक कथा बाँट-बखरा

बेचारा छोटका सब बात मान गइल। भर दिन गाय के खियावे-पियावे; दूध दूह के बड़का लेके चल जाय। छोटका भर दिन कम्मर अपना घर में रखे, रात में बड़का लेके चल जाय, आ छोटका बेचारा जाड़ में छटपटा के रह जाय। छोटका गाँछ के जड़ में पानी डालल करे, बाकिर जब फर लागे त बड़का तूड़ लेव। छोटका भर दिन हर चलावे आ अन्न उपजावे, बाकिर जब फसल पाक के तैयार होखे त सब बाल बड़का काट लेवे, छोटका के खाली डंठल मिले। छोटका के मेहरारू बेचारी कुटिया-पिसिया क के केहूँ ग आपन गुजर चलावे। छोटका बेचारा हरमेसे दिकदारी में परल रहत रहे, आ बड़का मजा मारत रहे।

गांव के लोग ई सब तमाशा देखत-देखत अनसा गइल। सोंचल लोग कि छोटका बेचारा एतना सीधा बा कि बड़का ओकर जान लेवे पर तइयार बा, बाकिर तेहूपर छोटका बेचारा कुछ नइखे पावत।

त एक दिन गांव के लोग छोटका के बोला के कहल कि “तोहार बड़का भाई तोहरा से बैमानी करत बाड़न।’ छोटका कहलस कि ” का करीं। हमरा त कुछ बुझाते नइखे। “त गांव के लोग कहल कि “जब गाय के दूहे लागस त तू जाके गाय के मुँह में मारे लगिह। जब कम्मर दिन में तोहरा मिले तब तू ओकरा के पानी में डूबा के ध दीह। जब गाछ में फर लागे शुरू होखे, हूँ गाछ के जड़ काटे लगिह। जब खेत में फसल लागे के शुरू होखे आ फसल में बाल धरे के शुरू होखे तसहीं हूँ फसल के जड़ काटे लगिह।”

बस छोटका के अकिल खुलल। ओसहीं कइलस । जब गाय दुहाए लागल त छोटका जा के गाय के मुँह में मारे लागल। बस गाय सब दूध गिरा देलस। त बड़का भाई बड़ा जोर खिसिआइल। त छोटका कहलस कि “गाय के मुँह हमरा हिस्सा में बा। हम मारी, चाहे पुचकारी। तोहार का ?”

राती खा जब बड़का कम्मर लेबे गइल त देखलस कि कम्मर त भींजल बा। त छोटका कहलस कि “दिन में कम्मर हमार ह, ओह घड़ी हम जे चाहीं से करब। मन करी त पानी में डालब, मन करी त ओढ़ब ? तोहार का ? रात में त देइए देली।”

जब गाछ में फर लागे के शुरू भइल त छोटका ओकर जड़ काटे लागल। ई देख के बड़का फेर बड़ी जोर से खिसिआइल। त छोटका कहलस कि “जड़ त हमार ह, काटीं चाहे राखीं? तोहार का ?

खेत में फसल लागल आ बाल धरे के शुरू भइल, त छोटका कच्चे में फसल के जड़ काटे लागल। ई देख क बड़का फेर बड़ी जोर खिसिआइल। त छोटका कहलस कि “डाँठ हमार ह। हम कबो काटीं पकला में काटीं, चाहे कच्चे में काटीं, तोहार का?”

तब बड़का के दिमाग ठंढा भइल सोचलस कि अब बैमानी ढेर दिन ना चल सकी। तब सब चीज के ठीक-ठीक बाँट-बखरा आधा-आधा लगा देलस। अब दूनू भाई खुशी से रहे लागल लोग।

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