भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : चउथा भाग

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भोजपुरी लोकोक्ति गाँव में जनमल । गाँव से धीरे-धीरे शहर में आइल गाँव वाला लोग के बोलचाल में लोकोक्ति एह तरह से घुलल मिलल बा कि ओह लोग के बोलचाल से लोकोक्ति के निकालल सम्भव नइखे ।

भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : चउथा भाग
भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : चउथा भाग

ग्रामीण अधिक भावुक, भावनाप्रिय आ स्पष्ट बोले वाला होलन । मोका मिलला पर कटु व्यंग्यात्मक लोकोक्ति के प्रयोग करे से बाज ना आवेलन । जाने-अनजाने, साधारण से सांधारण ग्रामीण लोकोक्ति के प्रयोग अधिक करेले जेहमें मेहरारू लोग के संख्या ढेर बा ।

लोकोक्ति के प्रयोग से भाषा में सरसता, चमत्कार आ प्रवाह उत्पन्न होला । लोकोक्ति भाषा के समृद्धि आ विकास के मापक होले । पर्यायवाची शब्द में लोकोक्ति नइखे व्यक्त कइल जा सकत ।

हाथ के बहुरी हाथे हाथ

कर्तव्य के फल भोगे के परेला । पतोह सास के साथ बुरा व्यवहार करेले । एक दिन पतोह का भी सास बने के परेला । ओह दिन अपना कर्तव्य के फल पावेले । कहलो गइल बा-“जइसन करनी, वोइसन भरनी” ई उक्ति एक तरह के नैतिक अंकुश ह ।

हाथ-गोड़ सिरकी पेट नदकोला

अइसन आदमी जेकर हाथ-‘गोड़ पातर होखे बाकिर पेट नाद नियर होखे । अक्सर अइसन आकार वाला लोग के आहार के मात्रा अधिक होला । नद कोला माने नाद के आकार के जेमें मवेशी के खियावल जाला ।

हाथ में ना गोड़ में, टकहा लिलार में

हाथ-गोड़ में कवनो आभूषण नइखे बाकिर लिलार पर एक टका के टिकुली सटाइल बा । यानी साधन के कवनो ठेकान नइखे बाकिर सवख अपना सीमा पर बा।

भाव बा कि सिंगार वोही के शोभेला जे सम्पन्न बाटे । मात्र एगो अंग विशेष के सजावला से आकर्षण थोरे बढेला । निश्चित रूप से सिंगार के साथ आर्थिक परिस्थिति के तरजुई पर रख के ओकर महत्त्व आँकल जाला । साधनहीन के सिंगार उपाहासास्पद होला ।

हाथी के चार दाँत दूगो खाये के, दूगो देखावे के

ढोंगी आदमी के कुछ काम दिखावा मात्र होला । हाथी के चार दाँत में से दूइये गो खाये खातिर होला बाकी दूगो देखावे खातिर । एह लोकोक्ति से औपचारिकता के प्रवृत्ति चरितार्थ होता।

हाथी घूमे बाजार, कुकुर भुंके हजार

हाथी अइसन आदमी के प्रतीक बा जे दोसरा के निन्दा चाहे आलोचना के बिना परवाह कइले अपना मन के करेला । कुकर जइसन दोसर-दोसर लोग चाहे ओकर केतनो भर्त्सना करे । एकर ओकरा परवाह ना रहेला ।

हँसुआ के बिआह में खुरपी के गीत

हँसुआ के बिआह होखे आ खुरपी के गीत गवाय । इहाँ अप्रासंगिक बात कइला के अर्थ में प्रयुक्त बा । कवनो काम अवसर के मोताबिक अच्छा लागेला । अन्यथा भइला पर हास्यास्पद लागेला । हँसुआ आ खुरपी खेती के औजार हवे । हँसुआ से कटनी आ खुरपी से सोहनी (निकौनी) कइल जाला ।

हम चराईं डिली, हमके चरावे गाँव के पिल्ली

अपना के ढेर चतुर समझे वाला आदमी कहता हम त दिल्ली रहे वाला लोग के पाठ पढ़ा दी आ हमरा के पढ़ावे चलल बाड़ी गाँव के पिल्ली (कुत्तिया) । जे अपना के बड़ लगावेला ओकरा कबहीं ना बरदास्त होला कि एगो सामान्य आदमी ओके मात दे दे।

हर द हेगा द चूतर खोदे के पैना द

कवनो आदमी हर, हेंगा, बैल आ पैना सब चीज माँग ले त ओकरा खेत जोते खातिर आउर का चाहीं । भाव बा कि बइठल-बइठल सब सुविधा मुहैया करा दिहल जाय । ओकरा खुद कुछ ना करे के परे । ई उक्ति आलसी लोग पर व्यंग्य बा जे आराम से, बिना मेहनत के, सब कुछ पा लेबे के चाहेला ।

हरहठ देवता के भरभठ पूजा

शठे शाठ्यम् समाचरेत् । जे जइसन पात्र होला ओकरा अनुरूप ओके आदर भा अपमान मिलेला । हठी देवता के पूजा भ्रष्ठ एह से होला कि पुजारी के ओर से पूजा में ना आग्रह होला ना श्रद्धा । आदर आ श्रद्धा पावे खातिर ओह लायक होखे के परेला ।

हर हेंगा में जेही सेही पगुरी में रथ

कवनो बैल जे हर आ हेंगा खींचे से कतरात होखे आ पागुर करे में माहिर होखे ।

भाव बा कि खाये में आगे आ काम में पीछे । कहल जाला-“राम भजन में आलसी, भोजन में हुसियार ।”

अइसन कामचोर भोजन भट्ठ लोग के हमरा देस में कभी नइखे । अइसन लोग के काम के चिन्ता ना सतावेला । भोजन के सामग्री ओह लोगन के व्याकुल बनावे ले।

सूप हँसे त हँसे, चलनियो हँसे जेकरा सहतर गो छेद

जे खुद बुरा बा दोसरा के अवगुन पर व्यंग्य करता त ई एगो विडम्बना बा । चलनी में अनगिनत छेद बा जवना से आटा वगैरह चालल जाला । जदी चलनी सूप के छेद पर हँसतिया त शोभा नइखे देत । पहिले त ओकरा अपना कमजोरी पर ध्यान देवे के चाहीं ।

भोजपुरी क्षेत्र में सूप आ चलली गृहस्थी के सामान ह । सूप से अनाज साफ कइल जाला आ चलनी से पीसल वस्तु चालल जाला । चलनी में अनेक छेद भइल ओके अवगुणी भइला के द्योतक बा । अइसन हालत में जदी सूप के एगो छेद (अवगुण) पर चलनी व्यंग्य करे के आपन अधिकार मानतिया त ई बात उचित नइखे ।

सूरदास मनमउजी, मेहरी के कहे भउजी

अल्हड़ व्यक्तित्व के ओर संकेत बा । अइसन आदमी कब का करी, का कही, कवनो ठीक नइखे । अइसने सुभाव के एगो आन्हर रहे जवन अपना पत्नी के भउजी (भाभी) कहल करे । जे अपने मौज में अन्धा बा ओकरा व्यवहार आ वाणी के कवनो भरोसा नइखे । कब केकरा के का कह दी।

सोझे अंगुरी घीव ना निकलेला

कहीं-कहीं बिना ढेढ़ापन के काम ना चलेला, बहुत सीधा-सरल भइला से काम बिगड़ जाला । कवनो कवनो मोका पर आदमी के दृढ़ता आ कूटनीति से काम लेबे के परेला । तवे सफलता मिलेला । एही से कहल बा कि अंगुरी बिना टेढ़ कइले घीव ना निकलेला । घीव जदी जम गइल होखे त सीधे अँगुरी ना निकली।

हँसी में बखेड़ा

एकर अर्थ भइल हँसी, मजाक से प्रारम्भ आ झगड़ा से अंत, मजाक के बात कबो कबो गम्भीर रूप धारण कर लेला । ओकर परिणति कवनो बड़ विवाद में बदल जाला । एकर कारन ई बा कि हँसी-मजाक से जवन सत्य उदघादित होला ओके सहन करे वाला बहुत कम लोग होला । अपना पर आघात परते अइसन लोग तिलमिला जाला । फलसरूप मनमोटाव पैदा हो जाला ।

ध्यान दीं : इ भोजपुरी लोकोक्ति शारदानन्द प्रसाद जी के लिखल किताब नाच ना जाने ऑंगनवे टेढ़ से लीहल बा

भोजपुरी मुहावरा

पहिला भाग
दुसरका भाग
तिसरका भाग
चउथा भाग
पांचवा भाग

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