भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : पहिला भाग

जोगीरा डॉट कॉम के ई सतत प्रयास बा की आपन भोजपुरी भाषा आगे बढ़े आ भोजपुरी के ऑनलाइन के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगन तक पहुचावल जाव, एह कड़ी के आगे बढ़ावत जोगीरा लेके आइल बा भोजपुरी लोकोक्ति , जहा प रउवा भोजपुरी लोकोक्ति के बारे में पढ़ेब और ओकरा बारे में जानेब ओकर अर्थ के साथ ।

भोजपुरी लोकोक्ति गॉव में जनमल । गाँव से धीरे-धीरे शहर में आइल । गाँव वाला लोग के बोलचाल में लोकोक्ति यह तरह से घुलल मिलल बा कि ओह लोगके बोलचाल से लोकोक्ति के निकालल सम्भव नइखे ।

भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : पहिला भाग
भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : पहिला भाग

लोकोक्ति के प्रयोग से भाषा में सरसता, चमत्कार आ प्रवाह उत्पन्न होला । लोकोक्ति भाषा के समृद्धि आ विकास के मापक होते । पर्यायवाची शब्द में लोकोक्ति नइखे व्यक्त कइल जा सकत।

लोकोक्ति के अलग सता होता, लोकोक्ति अपने आप में, सूत्र रूप में की सही, पूर्ण होले । लोकोक्ति से कवनो वात के समर्थन आ खंडनों कइल जाला ।

केकर केकर धरीं नाँव, कमरी ओढ़ले सगरी गाँव

सभे दोषी होखे त केकर केकर नाँव धइल जा | इहाँ त कमरी ओढ़ के घीव पिये वाला [ घात करेवाला ] ढेर लोग बाटे | जहाँ सभे चोर आ छदमवेषी होखे ऊहाँ सज्जन के भेद कइल बड़ा कठिन हो जाला |

केकरा पतोह ले उतिमा कम

सास अपना पतोह के मोल केहू दोसरा के पतोह ले कम नइखी आँकत | भाव ई बा कि आपन चीज चाहे जइसन होखे उहे सबसे प्यारी लागेला |

के पर करीं सिंगार पिया मोर आन्हर

स्त्री के सिंगार देखावे खातिर होला, पति के रिझावे खातिर होला | जदी पति आन्हर होखे त पत्नी के सोलहो सिंगार बेकार हो जाई | कहे के मतलब कि गुण के पारखी के अभाव में गुणवान आदमी के बड़ा निराशा होला | विद्धान आदमी के कदर विद्धाने करेला, मुरुख ना |

केहू इर घाट केहू मीर घाट

आपसी सहजोग खातिर एक दोसरा के नजदीक रहल जरूरी होला | कवनो जलाशय के दूनू किनार पर दू आदमी होखे त उन्हन से सहजोग के उमेद ना कइल जा सके काहे कि कवनो काम संगठित होइये के संपादित होला |

केहू के भंटा बैर केहू के भंटा पथ

एक ही वस्तु केहू खातिर उपयोगी होला, केहू खातिर अनुपयोगी | मतलब कि वस्तु के उपयोगित स्थिति के अनुरूप जानल जा सकेला | इहाँ स्थिति प्रधान बा |

काजर कइला के मोल ना ह मोल ह मटकवला के

काजर सभ औरत लोग लगावेला बाकिर काजर ओकरे फबेला जे आँख मटकावे के जानेला | मतलब ई बा कि कवनो पद के गरिमा निभवले से निबहेला, बस्तु के सार्थकता तबे मानल जाला जब ओकर उचित उपयोग होखें |

काठो के सवत बिराजेले

प्रतिस्र्पधा करे वाला जदी कमजोर होखे त काजर के सिद्धि में सन्देह रहेला | पति जदी काठ के प्रतिभो से बिआह कर लेत पत्नी के चैन ना मिलेला | निर्जीव प्रतियोगियो पत्नी खातिर सह्य ना होला |

कान के पातर

जे सुनल-सुनावल बात पर विश्वास कर लेला आ अपना विवेक के काम में ना ले आवेला अइसन आदमी के कान के पातर कहल जाला | अइसन आदमी केहू के बहकावाला में जल्दी आ जाला |

कानी गइया के अलगे बथान

असामाजिक तत्व के ओर इशारा बा | अइसन लोग समाज के परवाह ना करके आपन-अलग राग अलापेला जइसे कवनो कानी गाय के खाये के-रहे के अलग व्यवस्था होखे | बथान कहला जहाँ मवेशी के खाये आ रहे के व्यवस्था रहेला |

कायथ भुइँहार के इयारी भादों में उजारि

कायथ आ भुइँहार जाति अपना धूर्तता खातिर बदनाम हवे | आम आदमी के धारना बा कि एह लोगन से दोस्ती घातक होला, विपत्ति के दशा में ई लोग सहायक ना होला | भोजपुर क्षेत्र में एह लोगन के चालाकी के बहुत लोक-कथा बाड़ीसन |

कुकुर के पोंछ में केतनो तेल लगावल जाई बाकिर टेढ़ के टेढ़ रही

टेढ़ सुभाव वाला के सीधा ना हो सके जे प्रकृति से दुष्ट बा आहे आदमी पर शिक्षा, उपदेश आदि के प्रभाव ना परेला जइसे कुकुर के पोंछ में केतना तेल मालिस होई सीधा नइखे रह सकत |

कुजगहा बिछी मरलस, भसुर मिलले झरवइया

विपत्ति पर विपत्ति | कवनो भवे के आन्तरिक अंग में बिछी मरलस | ई स्तिथि अपने आप में कष्टकारक रहे | बाकिर मुक्ति के उपाय और कष्टदायक हो गइल | बिछी मरला पर ओकरा से झरवावल जाला | ओझा ओकर भसुर रहले | देवरानी के पीड़ा दूर करे खातिर जदी भसुर तत्पर होखस त देवरानी के मनोदशा और संकट में पर जाई काहे कि सामजिक नियम के अनुसार जेठ के स्पर्श वर्जित बा |

डंक के पीड़ा दूर के खातिर मंत्र द्धारा झाड़-फूंक में अंग के स्पर्श जरुरी होला | इहाँ त स्पर्श जरुरी होला | इहाँ त स्पर्श करे के रहे आन्तरिक अंग के अइसन हालत में ओह औरत के सामने दोहरा संकट बा जेकरा कवनो निवारण नइखे | एगो त पहिलहीं विपत्ति रहे, दोसरा जेठ के लेके आ खड़ा हो गइल |

ध्यान दीं : इ भोजपुरी लोकोक्ति शारदानन्द प्रसाद जी के लिखल किताब नाच ना जाने ऑंगनवे टेढ़ से लीहल बा

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