भोजपुरी कविता जब से रोटी बोर खवायल

योगेन्द्र शर्मा
योगेन्द्र शर्मा "योगी"

जब से रोटी बोर खवायल
ओठलाली खूबै महंगायल
अब का आलू खेत बोआई
सबही चोखा से भरुआयल।

रोटी भात न खाये अईली
ओरहन बा मउगी के आयल
का चाहत बा खाये धनिया
पियवा शोच बिया भरमायल।

खूब बनल चुम्मा से जतरा
अरती चन्नन कहाँ लुकायल
भईल सभ्यता तार तार जब
पईसा खातिर गीत गवायल।

सरे आम बबुनी के कोई
चोली वाला हूँक फसावल
कस मज़बूरी में घरावां के
बहारां बाटै बात पठावल।

पियवा चाटे लाली हमरा
माई से कनिया बतलावल
ना जाबै ससुरा घर अबकी
आ के नईहर बिया नगायल।

पियवा मोर गयल गोहाटी
देवरा खोसे लागल चाभी
भईल जुगाड़ू रिश्ता अब त
का देवर अब कइसन भाभी।

ढोढ़ी भी अब लगल मुनाये
खोज लिया के पियरी माटी
मानत नइखे पियवा तब्बो
खोंसत बाटे आपन कांटी।

पत्ती से हव जीन्स फरा ता
लागत बाटै टेढ़ बिधाता
का दिक्कत बा नीमन में जे
अईसन धमकी रोज दिया ता।

कोई बतावे भईया से की
माल तोरे सुरारी में
सुन्दर नाता बदल गईल बा
अब लागत की गारी में।

बड़ी दूर तक बाय कहानी
रहिया चलत भईल नदानी
कब तक छाती मूँग दराई
कहिया ले होई मनमानी।

कब तक पीर सहाई *योगी*
पूछत बा भोजपुरी घायल
लोक गीत कहिया मुसकाई
कब बाजी संगीत के पायल।।

– योगेन्द्र शर्मा *योगी*

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