भोजपुरी साहित्य, सिनेमा व संवैधानिक मान्यता पर हुई चर्चा

दिल्ली विश्वविद्यालय में हंसराज काॅलेज व भोजपुरी जन जागरण अभियान के संयुक्त तत्वावधान में भोजपुरी सिनेमा, साहित्य व संवैधानिक मान्यता पर हंसराज काॅलेज के संगोष्टी कक्ष में परिचर्चा हुई जिसमें भोजपुरी साहित्य व सिनेमा से जुड़े साहित्यकारों ने अपनी बात रखी।

कार्यक्रम के तहत हुए पैनल डिस्कशन में विषय प्रवर्तन करते भोजपुरी जन जागरण अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष पटेल ने कहा कि भोजपुरी भाषा आज विश्वव्यापी भाषा है। जो दुनिया के चौदह देशों में लगभग पच्चीस करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इस भाषा का विस्तार में आज इसके साहित्य व सिनेमा का बहुत अधिक योगदान है।

भारत सरकार में निदेशक व भोजपुरी व हिन्दी भाषा के आलोचक जय प्रकाश फाकि़र ने भोजपुरी भाषा के उपर अपनी बात रखते हुए कहा कि भोजपुरी भाषा अपने आप में आजाद भाषा है। इसको किसी व्याकरण में नहीं‌ बांधा जा सकता। ऐसा नहीं है कि इस भाषा में व्याकरण नहीं है पर यह भाषा उस कसौटी में‌ बंध के नहीं रहना जानती है।

भोजपुरी एक ऐसी भाषा है जिसके एक शब्द किसी दुसरे भाषा के एक पुरे वाक्य को पूर्ण कर देता है।साथ ही भोजपुरी भाषा में‌ कोई एकाधिकार नहीं है। जैसा कि अन्य भाषाओं में महसूस होता है।

भोजपुरी एक ऐसी भाषा है जिसके एक शब्द किसी दुसरे भाषा के एक पुरे वाक्य को पूर्ण कर देता है।साथ ही भोजपुरी भाषा में‌ कोई एकाधिकार नहीं है। जैसा कि अन्य भाषाओं में महसूस होता है।

उदाहरण स्वरुप उन्होंने कहा कि बंगला भाषा की बात जब आती है तो दिमाग में स्वतः रविन्द्र नाथ ठाकुर, मैथिली की बात आती है तो विद्यापति ठाकुर की छवि सामने आ जाती है। जबकि भोजपुरी की जब बात आती है तो कोई एक व्यक्ति का चेहरा सामने नहीं आता। मतलब उसका अधिपत्य नहीं झलकता। क्योंकि यहां भिखारी ठाकुर समेत बहुत से विद्वान हैं।

यहां एक एक भोजपुरी भाषी अपने आप में‌ भोजपुरी है। उन्होने आगे कहा कि चूंकि यह हमेशा से साफ व स्वतंत्र रुप से अपनी बात रखी इसलिए इसको किसी राजा द्वारा या शासक द्वारा प्रश्रय नहीं मिला वरना बहुत पहले यह संविधान की भाषा होती। जबकि अन्य भाषा के लोगों ने अंग्रेजों‌ के समक्ष उनके अनुसार काम करने में‌ लगे रहे जिस कारण उनके भाषा को मान सम्मान का इनाम मिला। वहीं भोजपुरी भाषी उनके खिलाफ रहे तो उन्हें दंड मिला है और यही कारण है कि आज भी भोजपुरी को संविधान में स्थान नहीं मिली है।

भोजपुरी साहित्य, सिनेमा व संवैधानिक मान्यता पर चर्चा
भोजपुरी साहित्य, सिनेमा व संवैधानिक मान्यता पर चर्चा

फिल्म निर्देशक संजय ऋतुराज ने भोजपुरी सिनेमा पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भोजपुरी सिनेमा में जब तक भोजपुरी भाषी पढे लिखे लोग कहानी पटकथा व निर्देशन में नहीं आएंगे तब तक हम अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर की फिल्में नहीं बनाएंगे। क्योंकि अभी जितने भी लोग सिनेमा बना रहे हैं वो सिर्फ पैसा कमाने के लिए। और मेहनत से बचते हुए हिन्दी या न्य फिल्मों की काॅपी बना रहे हैं।

यही कारण है कि भोजपुरी सिनेमा आज अपनी पहचान अलग नहींबना पा रही। देवेश चौबे ने अपनी बात रखते हुए भोजपुरी भाषा के साहित्य व सिनेमा की वर्तमान स्वरुप से लोगों को अवगता कराया। उन्होंने कहा कि भोजपुरी के लोकगीत व शब्दों को लेके हिन्दी सिनेमा समृद्ध हो रही है। जबकि हमारे भोजपुरी सिनेमा वाले हिन्दी की ओर भाग रहे हैं।
भोजपुरी साहित्य पर विचार रखते देवेश कुमार चौबे ने भोजपुरी भाषा की महत्ता व अनेक अनछुए पहलू पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इग्नू के भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के संयोजक प्रो० शत्रुध्न कुमार ने कहा कि भोजपुरिया लोग काफी मेहनती होते हैं। यह जहां जाते हैं वहां अपनी मेहनत से उस प्रदेश को समृद्ध बना देते हैं। जिसका उदाहरण मॉरिशस है।

यह कार्यक्रम हांसराज काॅलेज की प्रचार्या डाॅ० रमा जी के सान्निध्य में हुआ। जिसमें भोजपुरी जन जागरण अभियान की ओर से उन्हें ‘भोजपुरी गौरव सम्मान’ दे कर सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम का संचालन डॉ० महेन्द्र प्रजापति ने किया। आज हुए इस परिचर्चा में अभिषेक भोजपुरिया, प्रेम जी, राकेश कमल, जुली रानी के अलावा बहुत से विद्यार्थी उपस्थित रहे। इस अवसर पर जुली रानी की पुस्तक ‘भोजपुरी इन लिटरेरी स्फीयर’ का लोकापर्ण भी हुआ।

भोजपुरी लोकोक्ति और अर्थ : पहिला भाग

भोजपुरी मुहावरा
पहिला भाग
दुसरका भाग
तिसरका भाग
चउथा भाग

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