विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा रहमत के रमजान

विवेक सिंह जी
विवेक सिंह जी

ज्येष्ठ के आधा महीना बीतला के बाद रमजान के पहिलका अज़ान भइल।अभी ब्रम्हबेला के सुरुआत होत रहे. सब कोई अपना अपना छत पे सुतल रहे। पुरुआई के सिसक्त मधुर बेयार में एक अजीब सा सिहरन रहे।। उ पुरुआई बेयार के सिहरन सब कोई के केहुनी अउर ठेहुना आपस मे सटा के सुते पे मजबूर कर देले रहे।

लेकिन गांव के बीचों बीच बनल मस्जिद अउर मस्जिद में रहे वाला हाफिज जी (मौलबी,मौलाना) के नींद कहा। मस्जिद में लागल लाऊड इस्पीकर के कुर्कुरात आवाज सुन के हिना के आँख खुल गईल।।

हिना अपना घर के लाडली रहली. उनकर हर ख़्वाईस हर दिलेतमन्ना मुह से निकलत कहि की पुरा हो जावे।। पुरा होखे के कारण भी रहे, घर मे सब से सुंदर, अउर दु भाई के बीच एक लड़की रहली। हिना से बड़ एगो भाई रहे जेकर उम्र महज अठारह बर्ष रहे.जेकर नाम फिरोज शेख रहे। हिना फिरोज से चार बर्ष छोट रहे अउर हिना से तीन साल छोट रहमत शेख रहले ऐहि से हीन के मान ज्यादा होत रहे..

हिना के अब्बा सीबूअब्दुल शेख अपना गांव के पास वाला बाजार में साइकिल रिपेरिंग के दुकान कइले रहले। उहे दुकान से उ अपना घर गृहस्थी के भार ढोअस . हिना के अम्मी रजिया फातिमा परिपूण गृहणी रहली। हिना के अम्मी,अब्बू के एक बात के चिंता बनल रहे. उ चिंता ई रहे कि हिना आपन जिन्दगी के पहिलका रमजान करे वाल रही।।

सायद ई कही उ लोग के धर्म या कोनो नियम होइ जे की लड़का होखो या लड़की चउदह या पन्द्रह वर्ष के भइला पर रोजा रख सकत बा या रख्वावल जात होइ की आवे वाला समय मे दिकत न होखे उपवास करे में।। काहे की मुसलमान धर्म मे रमजान के महीना सबसे पवित्र और पाक मानल जाला।। हिना के अम्मी उनका अब्बू से हमेसा कहस।?

” रजिया :”” हिना दूज के चाँद सही सलामत दीदार कर ली त हम ईद के ही दिन मिलाद (कथा) करायेम। ई ओकर पहिलका रमजान ह जोना में उ रोजा रही…बात काट के सिबु बोल पडले।
“”सीबु”” हु तू ठीक कहत बारू हम एकरा बाड़े में मौलाना साहब से इख्तियार कर लेत बानी।। अउर ई अच्छा भी रही अल्लाह चहियन त हिना के कोनो तखलिफ भी ना होइ।।

एक त रमज़ान में अन्हारे मुह उठ के सेहरी करे के परे ला अउर ठीक शाम चार या पाच बजे ले रोजा खोले के नियम होला ओकरा बाद नमाज अदा कइल जला। सेहरी के भी समय सीमित रहे ला, ओतने समय मे उहो तीन बजे भोर में जे जोन बना लेव या जोन खा लेव।

लेकिन एगो बात बहुत अच्छा लागेला. जब सुबह सुबह मस्जिद से मौलाना साहब हिदायत देवे ले। “”सेहरी का वक्त हो गया है आप सब उठे औऱ सेहरी करे। आज का वक्त तीन बजे से तीन पच्चीस तक है. ओकरा बाद मौलाना साहब के आवाज में नात होला त बहुत निक लागे ला।

नात के पहिलका बोल रहेला,
“या नवी सलाम अलैका या रसूल सलाम अलैका” ?
इहे आवाज सुन के हिना उठल रहे। हिना के साथे साथे घर के सब कोई उठ गईल रहे, सब कोई उठ के फ्रेस भइल अउर सेहरी करे खातिर बईठल साथे साथे रहमत भी बईठल। सब कोई हसे लागल, सब के हस्त देख रहमत पूछलस।।

रहमत”” अम्मी आप सब काहे हस्त बारअ लोग।

रजिया मुस्कुरा के बोल्ली”” अरे रहमत तू काहे हमनी के साथ साथ सेहरी कर तारअ तुहु रोजा रहब का।।

रहमत मासूमियत से कहलस”” हु अम्मी हमू रहम, काहे हम काहे नइखी रह सकत। बुबु(बहन)त आज से रोज करी न त हम भी बुबु के साथ मे करेम।।।

बीच मे ही बात काट के फिरोज कहले “”” अरे रहमत तुहु अपना बुबु जइसन हो जईहअ त कर लिहअ. तहरा से अभी न होई बाबू।।
रहमत केहु के बात माने वाला न रहे ।

“” रहमत,, न हम बुबु के साथ ही अभी से ही रोजा करेम।।

सीबूअब्दुला, रहमत के अपना गोद मे बैठा के समझावत बाड़े।।

सीबू””” अरे बेटा जिद न करे के चाही, तू अभी छोट बाड़अ। बुबु तहार बड बारी।।

लेकिन रहमत कहा मानेवाला रहे. सब कोई के समझावला के बवजूद भी न मानल अउर सब के साथ सेहरी कर के सुत गईल।।

जब सुबह आठ बजे उठल त ओकरा भूख लागल रहे अब करो त करो का, त उ अपना बुबु से धीरे से कहलस। उ हिना से कोनो बात न छिपावत रहे काहे की हिना ओकरा के बहुत मानत रहे।।
रहमत हिना से धीमा आवाज में उहो एकदम कान के पास जाके””” बुबु हमरा भूख लागल बा।

हिना ई सुन के त पहिले मुस्कुराइल लेकि रहमत नाराज हो जाई एह वजह से उ आपन हसि के रोक लेलस। हिना भी रहमत से धीरे से कहलस।

हिना””” अच्छा ठीक बा तू रुक हम खाना देत बानी। रहमत हिना के बात काट के बोल पड़ल।।

रहमत””” अगर अम्मी के मालूम चल जाई त का होइ, उ हमरा के रोजा न रहे दी।।

हिना हल्का सा मुस्कुरा के””” अरे हम बानी न अम्मी के मालूम न चली।।

फिर हिना रहमत खातिर खान लेवे चल गईल। ओह समय रजिया घर मे न रहली कोनो काम से बाहर गईल रहे। फिरोज अपना अब्बू के साथ साइकिल दुकान पर चल गईल रहे।। हिना खाना लिया के रहमत के खिया देहलस.. खाना खाली रहमत खातिर ही बनल रहे काहे की रजिया के मालूम रहे रहमत के भूख जरूर लागी। जब रजिया बाहर से अइली त समझ गइली की रहमत खाना खा लेले बा।

कुछ दिन त एहि तरी बीतल सब कोई जान के भी अनजान बन रहे। सब कोई रहमत के भनक भी न लागे देलस की रहमत के खाना वाला बात सब कोई जान ता।।रहमत हर सुबह सेहरी के बेरा सेहरी करे अउर धीरे से अपना बुबु से मांग के खाना भी खा लेव।।

धीरे धीरे समय बीतत गईल अउर उ भी दिन आइल जहिया दूज के चाँद दीदार करे के रहे।।

सब कोई दूज के चाँद देखलस अउर ओकरा सुबह उठ के नया नया कपड़ा पहन के मस्जिद में दुपह के अजान के वक्त नमाज अदा कइलस उर रस्म सुरु भइल सेवई पिये के।।रहमत आज बहुत खुश रहे काहे की ओकरा देखे से सब के मालूम रहे कि रहमत रमजान में सब नियम पालन कइले बा।

सब से ढेर खुशी के बात त हिना के रहे कि ओकर ई पहिलका रमजान अच्छा से बीत गईल।। सीबू अउर रजिया के खुशी के ठिकाना न रहे।। रहमत अउर फिरोज अपना संघतिया सब के बोला के सेवई पिये के दावत देले रहे लोग और शाम के मिलाद करे के भी बेवस्था रहे।।

जब रहमत अउर फिरोज के संघतिया शाम के सेवई पिये आई लोग त उ लोग के रजिया सेवई देके कहली की बाबू लोग ई रहमत के रमजान ह.काहे की उहो तीनो बेरा खा के रोजा कइले बाड़े।।
सब कोई जोर से हस दिहलस अउर रहमत भी हस दिहलस।। काहे की रहमत के भी समझ आ गईल रहे कि अम्मी अउर अब्बू हमार मन रखे खातिर ई सब कुछ कइले बा ।।।??

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