सोहर

सोहर किसे कहते है

पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को सोहर कहते हैं। किसी-किसी गीत में इस शब्द का प्रयोग भी पाया जाता है जैसे :-
बाजेला अनंद बधाय, महल उठे ‘सोहर’ हो ।

सोहिलो अथवा मंगल शब्द के अभियान से इन्हीं गीतों का संकेत किया गया है। कहीं-कहीं पर सोहर के स्थान पर मंगल शब्द भी व्यवहृत हुपा है ।

गावह ए सखि गावहू, गाइ के सुनावहु हो,
सब सखि मिलिजुलि गावहु, आजु मंगल गीत हो ।

सुनि कलरव सोहर शब्द की उत्पत्ति ‘शोभन’ से ज्ञात होती है । सोहर के गीत सोहिलो के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। संभवतः यही ‘शोभन’ शब्द शोभिलो सोहिलो सोहर के रूप में परिवर्तित होता हुआ इस रूप में आ गया है। भोजपुरी में ‘सोहल’ का अर्थ अच्छा लगना या सुहाना है जो संस्कृत के ‘शोभन’ का अपभ्रंश है।

सोहर कब गाते है

सोहर
सोहर

पुत्र जन्म के अवसर पर जो मंगल गीत गाये जाते हैं वे ‘सोहल’ छन्द में होते हैं । इस सोहर छन्द में निबद्ध होने के कारण ही इन गीतों का नाम भी सोहर पड़ गया है। भोजपुरी गीतों में जो सोहर उपलब्ध होते हैं उनमें तुक नहीं होता और न वे पिंगल शास्त्र के नियमों से जकड़े ही रहते हैं। वे तो पहाड़ी नदी की भाँति स्वच्छन्द रूप से बहते चले जाते हैं। तुलसीदासजी ने ‘रामलाल नहछ’ में जो सोहर लिखे हैं उनमें तुक मिलाया है और प्रत्येक पद में मात्रायें भी बराबर रखी हैं। उन्होंने पिंगल के अनुसार शुद्ध करके सोहर छन्द लिखा है :-

बनि बनि अावति नारि जानि गृह मायन हो ।
बिहंसत आउ लोहारिनि हाथ बरायन हो ।

अहिरिनि हाथ दहेड़ि सगुन लेइ आवइ हो ।
उभरत जोबन देखि नृपति मन भावइ हो ।

रूप सलोनितंबोलिनी वीरा हाथहि हो ।
जाकी ओर विलोकहिं मन उनसाथहि हो ।

दरजिनी गोरे गात लिहे कर जोरा हो ।
केसरि परम लगाइ सुगन्धन बोरा हो ।

नैन विसाल नउनियाँ भौं चमकावइ हो ।
देइ गारी रनिवासह प्रमुदित गावइ हो ।

पुत्र जन्म भारतीय ललनाओं की ललित कामनाओं की चरम परिणति है । मानी हुई मनौतियों का मनोरम परिणाम है। इस शुभ अवसर पर पास-पड़ोस की स्त्रियाँ ( विशेषतः ग्राम गीतों की पंडिता वृद्धायें ) एकत्र होकर नव प्रसूता स्त्री के ‘सूतिकागृह’ के दरवाजे पर बैठ जाती हैं और रमणीय गीतों को सुना सुनाकर घर भर की स्त्रियों का विशेषतः जच्चा का मनोरंजन किया करती हैं।

यह गीत बारह दिन तक गाया जाता है और जब बालक का बरही संस्कार समाप्त हो जाता है तभी इन गीतों की भी समाप्ति होती है।

सोहरों का प्रधान वर्ण्य विषय प्रेम है। इसमें स्त्री पुरुप की रतिक्रिया, गर्भाधान, गर्भिणी की शरीर-यष्टि, प्रसव पीड़ा, दोहद, उसकी पूर्ति, धाय का बुलाना और पुत्र जन्म का वर्णन पाया जाता है।

भवभूति ने पुत्र या सन्तति को नी और पुरुप दोनों के अभिन्न प्रेम की गाँठ कहा है। वास्तव में जब दोनों का प्रेम मूर्त रूप ग्रहण करता है तब उसे सन्तति कहते हैं । जिस समय इन दोनों के प्रेम में गाँठ पड़ती हैउसका वर्णन कितनी संयत भाषा में किया गया है। स्त्री कहती है :

“ए सजइत बुझि जाहु आपन अवगुनवा,
मुसुकि जनि बोलह हो ।
ए सजइत मिलि जुलि बन्हली मोटरिया,
खोलत बेरियां अकसर हो ।”

जहाँ इन गीतों में पुत्र के पैदा होने पर महान उत्सव मनाया जाता है वहाँ पुत्री के जन्म के कारण विषाद की गहरी रेखा माता के मुंह पर दिखाई पड़ती है। वह कहती है कि जैसे पुरैने का पत्ता हवा के कारण काँपता है वैसे ही मेरा हृदय पुत्री के जन्म होने से भावी दु:ख के कारण थरथर काँप रहा है।

पहिले पुत्र पैदा होने पर सुझे शाल ओढ़ने और बिछाने को मिलता था, मैं मेवा खाती और मुख पूर्वक सोती थी । परन्तु अब पुत्र जनने के कारण कुश ओढ़ने के लिये और कुश ही बिछाने के लिये मुझे दिया गया है। जंगली फल भोजन में मिलता है और खुखुड़ी मक्का की सूखी बाल या हल्की लकड़ी जो जल्दी जल जाती है –‘पासंग’ जलाने को मिली है। वस्त्र न मिलने के कारण रात को नींद भी नहीं आती ।

यह सोहर गीत सुनिये :–

‘साल ओढन साल डासन मेवा फल भोजन रे ।
ए ललना चनन के जरेला पसंगिया, निनरि भल ग्रावे ला रे ।
जइसन दह में के पुरन दहे बिके कांपेले रे ।
ए ललना ओइसन कांपेले हमरो हियरा धिया कारे जनम रे ।
कुस ओढ़न, कुस डासन, बन फल भोजन रे ।
ए ललना खुखुड़ी के जरेला पमंगिया, निनरियो ना आवेला रे ।

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मन के दुःखित नन्द रानी त दुर्दै ब्याकुल हो ।
ललना खन रे बाहर खन भीतर खन गोज ओवर ए॥
दुअरा से अइले कौन बाबू, धनिया मुंहवा चितवेले ए।
सुन्दरी के मुंहवाचित वेले ए, ऐ सुन्दर काहे राउर ओठवा सुखइले
.. त काहे मन बेदील ए।
लाज शर्म केरी बतिया, कहत लाज लागेला ए।
ऐ प्रभुजी उठत में देहिया चुरुमेला, होरीला के लक्षण ए ।

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कहवां ही के तुहूं ग्वालिन कहंवाही दही वेचे हो।
ए ग्वालिन गले गज मुक्ता के हार त ओढ़ेलू पीताम्बर हो ।

मथुरा के हई हम ग्वालिन गोखुला में दधी धेचे हो।
ए ग्वालिन गले गज मुक्ता के हार त ओढली पीताम्बर हो ।

दुधी जे दीहली कन्हैया घरे अवरु कन्हैया घरे हो ।
हे ललना बरबस बही मोर ममोरे भटुकी सीर फोड़े हो ।

वोरहन देबे गइलों यशोदा घरे अवरु से यशोदा धरे हो ।
ए यशोदा वरज ना अपना कन्हैया मटुकी सिर फोरेला हो ।

केतनो वरजलों धरज नाही माने कहली नाहीं मानेला हो ।
ए ग्वालिन सेनुरा के बन्हल सनेही छोड़ित मोह लागेला हो ।

छोड़ देहु सिरवा के सेन्दुरवा नएनवा के काजल हो।
ए छोड़ि देहु दांतवा के बीरी कन्हैया मोरा नाहीं जैहे हो ।

नाहीं छोड़वो दांतवा के मोशी नएनवा के काजल हो।
ए यशोदा नाहीं छोड़वो सिरवा के सेन्दुरवा मोइवो तोरे |
कान्धर हो ।

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अंगना बहरत चेरिया औरी लौंड़िया हो,
ए चेरिया झारी के जाजीम बिछाव सभे लोग बैठसु हो।

केहु के उठवले नाही उठबी बैठवले नाहीं बैठबी हो,
बहिनी तनी एक राम के देखाव, देखवी घरे जाइवी हो ।

अइसन बोली जनि बोलहु बहिनी सुमित्रा रानी हो,
बहिनी बर्ष के राम होइहें त अंगना निकालबी हो ।
सब लोग देखीन हो॥

अइसन बोली जन बोलहु बहिनी कौशिल्या रानी हो,
बहिनी बारह बर्ष राम होइ त बन के सिधारी जैइहें हो।

इतना बचन जब सुनली कौशिल्या रानी हो,
ललना गोड़े मुड़ी ताने ली चदरिया सुतेली दुख निंदरी हो।

हंसि हंसि बोले राजा दशरथ सुनहु कौशिल्या रानी हो,
रानी छुटेला बझीनीया के नाम बलइ राम बने जइहें हो।

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माघ के बहु असोबती, मर्म नांही जानेली हो।
हे ललना जब रे कातिक निअरइले, बहु अलसाइली हो ।
आवहु धनिया सुलक्षणी, मोर जड़ रोपनी हो ।
हे धनियाकौन बरण केरा साध, से होरे कुछ मांगहु हो।
पांच पदार्थ मोरा घरे, एकहु ना मन भावे हो ।
हे राजा मोरा रे हुबसधा के साध, हबस लेइ आवहु हो।
ना मोरा बाबा के जोतल, नांही जे वोअल हो ।
हे ललना अइसन, नारी गवांर त हाबुस मांगेली हो।
अगिला ही घोड़वा कौन भैया, पछीला कौन भैया हो ।
हे ललना अलर बछेड़वा कौन लाल होवुस चोरावले हो।
एक मुठा काटेले दूसर भूठा, औरी तीसर मूठा हो।
ललना आई परेला रखवारवा हावुस लागी बांधेला हो।
केकर हउवे तुहु नाती, त केकर बेटा हउव हो ।
हे ललना कौनी रनिअवा के कंत त हावुस चोरवेले हो।
हावूस लेइ के अइले, आंगन बीच ठाढ़ भइले हो ।
रानी झारी लेइय मुंह धोवत हाबूस भोजनियां कर हो।

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सुतल राजा उठ बैठले मने मने झंखेले हो ।
ललना हमरो समय व्यतीत भइले संतती नहीं भइनन हो।

मोरा पिछुअरवा तू विप्र बेगही चली बहु हो ।
हे बिप्र सोची देहु दिन सुदिनवां संतती कहिया होखीहन हो।

पूर्व के चन्दवा पछीम जैहे आदित छपित होखीहें हो।
राजा रकटी रकटो जिअरा जइहें संतत नही होखीहन हो।

मोरा पिछुअरवा साइस भैया बेगही चली श्रावहु हो।
हे भैया घोड़ा पीठी कस ना लहसिया त गुरू जी द्वारे जइबों हो।

एक बने गइलों दूसर बने, और तीसरे वने हो ।
हे ललना जाइ परेले ओही नगर जहां रे बसे गुरुजी हो ।

अंगना बहरइत चेरिया त हे चेरिया गुरुजी को देहुना बुलायी
त गुरुजी से भेंट करीबो हो ।

क्या तोरा अन्न धन थोड़ भइले लक्ष्मी बिमुख भइली हो ।
हे राजा कौन संकट पड़ेला सुतल जगाइला हो ।

नांहीं मोरा अन्न धन थोड़ भइले लक्ष्मी बिमुख भइली हो ।
हे गुरूजी हमरो त समय व्यतीत भइले संतती नांही पाइला हो।

झोरी में से कढ़लन जड़िया राजा ही हाथे दिहलन हो ।
हे राजा जे तोहरी प्रान प्यारी सेकरा के पिआवहु हो

थोड़े थोड़े पीअली कौशिल्या रानी थोड़े थोड़े सुमित्रा रानी हो ।
हे राजा सिलिया धोइ पीथेली कैकई रानी तिनों रानी गर्भसेनी हो।

कौशिल्या के भइले राजा रामचन्द्र सुमित्रा के लक्ष्मण हो।
हे ललना कैकई के भरत भुआल तीनों घरे सोहर हो ।

सउरी से बोलेली कौशिल्या रानी सुनीं रा॥ दशरथ हो।
हे राजा सेर जोखि सोनवा लुटाव पसेरी जोखि मोतिया हो।

हे राजा सउसे अयोध्या लुटाइयो त राम जन्म ले ले हो।
सउरी से बोलेली कैकई रानी सुनहु राजा दशरथ हो ।

हे राजा जानि बुझी अवध लुटाइवी आखीर राम बने जइहें हो।
इतना बचन राजा सुनले सुनहीं नहीं पावेले हो गोड़े मुड़े तानेले
चदरिया सोवेले दुख निद्रा हो ।

हंसी २ बोलेली कौशिल्या रानी सुनीं राजा दशरथ हो।
हे राजा छुटेला बझीनी के नाम बलइया राम बने जइहें हो।

इ आलेख डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय जी के लिखल किताब भोजपुरी ग्राम गीत से लिहल बा

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